सोमवार, अगस्त 03, 2009

रामकुमार तिवारी की कविता

युवा कवि रामकुमार तिवारी नवें दशक के महत्वपूर्ण कवि है .
उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं.
नवीन सागर पर केन्द्रित "कथादेश" के विशेषांक के वे अतिथि सम्पादक रहे हैं.
जीवन के सौन्दर्य और मनुष्य की जिजीविषा में उनकी आस्था है .
उनकी कविताओं के चाक्षुस दृष्य शब्दों के अर्थ को नया विस्तार देते हैं.
प्रस्तुत है उनकी कविता..


ठीक ठीक कितने वर्ष का था




धरती की आयु के बारे में सोचता
सडक पर जा रहा था



सडक से हटकर कुछ ही दूरी पर
सत्तर
की आयु का एक बूढा
बही-कटी धरती को देखता
चल रहा था



पेड
काटते आदमी से आयु पूछी
पेड की आयु पता नहीं चली



चहकती फुदकती चिडिया की आयु का प्रश्न उठे
इससे पहले वह उड गई




भुतहे कुओं में
डरते-डरते झाँका और
उसकी आयु के बारे में सोचता-सोचता
दूर निकल गया



नदी से उसकी आयु पूछना भूल
रेत से भरे ट्रक में बैठकर
शहर गया




शहर की आयु पूछी तो
कारखाने की आयु पता चली



सुस्ताने के लिये बाग में गया
बाग़
में प्रेम करते स्त्री-पुरुष ने
गुलाब के दो फूल तोडे



प्रेम
और फूल की आयु के बारे में सोचता हुआ
बाग से निकल गया ...



- रामकुमार तिवारी




(कविता वसुधा अक्तू.1996 से तथा दृष्य गूगल से साभार - शरद कोकास )

रविवार, जुलाई 26, 2009

पानी का पता पूछ रही थी मछली



कमलेश्वर साहू युवा कवि है .उनका एक संग्रह " यदि लिखने को कहा जाये " चर्चित हो चुका है . विश्वव्यापी जल संकट पर उन्हे भी चिंता है .मछली के प्रतीक के माध्यम से वे अपनी चिंता व्यक्त कर रहे है जिसमे इस संकट के उत्तरदायी लोगों की ओर स्पष्ट संकेत है " पानी का पता पूछ्र रही थी मछली" शीर्षक से उनका अगला संग्रह शीघ्र आ रहा है -शरद कोकास

पानी का पता पूछ रही थी मछली

ताल तलैया
पोखर नदिया
सागर धरती
सबके चेहरे पर थी उदासी
सबके जीवन में था सूखा
पानी का पता पूछ रही थी मछली

पता लेकर पहुंची थी
पानी बोतल में बन्द था

मछली के जीवन में
ऐसा पहली बार हो रहा था

बोतल खोलने का
रहस्य नहीं जानती थी मछली
मगर जानने को बेचैन थी
उसकी बेचैनी
तडप में बदल चुकी थी

मछली का तडपना
मनुष्यों के तडपने जैसा था

मछली इतना जान पायी
पानी को बोतल में बन्द करने वालों के
रचे गये तिलिस्म में बन्द है कहीं
पानी को आज़ाद कराने का रहस्य

मछली महज इतना ही जान पायी
तिलिस्म को तोडने का राज़
जिन्हे मालूम है
वे तिलिस्म की
पहरेदारी कर रहे हैं.

कमलेश्वर साहू

(कविता "परस्पर "से तथा चित्र गूगल से साभार)

मंगलवार, जुलाई 21, 2009

इस सूर्य ग्रहण पर शर्म तो आ रही है


यह बताते हुए कि उन दिनो जब मै कविता का क ख ग नहीं जानता था मैने यह कविता लिखी थी सूर्यग्रहण पर और 16 फरवरी 1980 को सूर्यग्रहण के दिन यह प्रकाशित भी हुई थी नागपुर के नवभारत दैनिक में . उन दिनो आज जैसे डराने वाले टी.वी.चैनल नहीं थे ,अखबारों में पढा कि ग्रहण को नंगी आंखों से नहीं देखना है वरना दृष्टि चली जायेगी लेकिन मेरा कवि तो इसका उलटा ही सोच रहा था ऐसा भी तो हो सकता है कि सूर्य की ओर देखने से अन्धे को दिखाई देने लगे .बस इसी विचार पर कविता लिख मारी .कविता क्या, बस थोडी सी तुकबन्दी..कॉलेज के दोस्तों को सुनाई और वाह वाह भी खूब हुई .इतने सूर्यग्रहण आये और चले गये पर इसकी याद नहीं आई .कल एक पुराने मित्र ने इसकी याद दिलाई तो कागजों में ढूंढ निकाली .चलिये उन मौज-मस्ती के दिनों की याद करते हुए आपको भी सुना देता हूँ यह कहते हुए कि "प्लीज..बीयर विद मी.."

सूर्य ग्रहण 16 फरवरी 1980


सूर्य ग्रहण के दिन अजब हादसा हुआ
अन्धे की आँख में कुछ प्रकाश सा हुआ
कानों सुनी थी बातें जो कभी उसने
आँखो से लगा उनको वो परखने

आवारा नौनिहालों को देख वो गश सा खा गया
वे भाषण ,वे रैलियाँ बालवर्ष का क्या हुआ
बहुत सुना था शोर सरकार है बदली
बदले हैं सिर्फ बैनर नेता वही नकली

सुना था कि आया है प्रजातंत्र
मगर दिखा नहीं कहीं
पूछने पर वही जवाब आगे देखो तो सही

वही महंगाई,खाल उतरवाई
विकल्पहीनता की स्थितियाँ हैं
वही वादे हैं वही नारे हैं
हर कोई यहाँ दुखिया है

आँख वाले अन्धों के जहाँ में
कैसे वो रह पायेगा

अब वो बाट है जोह रहा
अगला सूर्यग्रहण कब आयेगा ??

शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, जून 30, 2009

नरेश चंद्रकर के पाँवों में चक्के लगे है













बचे घर तक पहुँचने का रास्ता,जल और युवती

नरेश चंद्रकर घुमक्कड़ किस्म के कवि हैं. गोआ,आसाम,,हैदराबाद,हिमाचल प्रदेश,जाने कहाँ कहाँ रह चुके हैं. वर्तमान में बड़ॊदा में हैं. वे भटकते हुए भी कविता खोज लाते हैंउनके दो कविता संग्रह हैं“ बातचीत की उड़ती धूल में ” और“बहुत नर्म चादर थी जल से बुनी “ यह कविता उनके इस दूसरे संग्रह से. जल,स्त्री और पृक्रति के प्रति चिंता को एक जाने पहचाने बिम्ब के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे है नरेश चंद्रकर

जल


जल से भरी प्लास्टिक की गगरी छलकती थी बार बार
पर वह जो माथे पर सम्भाले थी उसे
न सुन्दर गुंथी वेणी थी उसकी

न घने काले केश
पर जल से भरी पूरी गगरी सम्भाले वह पृथ्वी का एक मिथक बिम्ब थी
जल से भरी पूरी गगरी सहित वह सड़क पर चलती थी

नग्न नर्म पैर
गरदन की मुलायम नसों में भार उठा सकने का हुनर साफ झलकता था
बार बार छलकते जल को नष्ट होने से बचाती
सरकारी नल से घर का दसवाँ फेरा पूरा करती वह युवती दिखी

दिखी वाहनों की भीड़ भी सड़क पर
ब्रेक की गूंजती आवाजें

बचे रहें युवती के पैर मोच लगने से
बचे रहें टकराने से वे वाहनों की गति से
बचा रहे स्वच्छ जल गगरी में

बचा रहे सूर्य के उगते रक्तिम नर्म घेरे में
उड़ते पंछी का दृश्य

बचे घर तक पहुँचने का रास्ता,जल और युवती !!

शुक्रवार, जून 19, 2009

किसी गरीब की केटली से भाफ बनकर निकलो


मै प्रेम पर कविता लिखना चाहता था
..पानी पर भी... और स्त्री पर भी ॥ग्रीष्म की रातों में नींद अक्सर उचट जाती है.. हलक सूख जाता है प्यास के मारे ..लेकिन स्वप्न तो हर स्थिति में आते हैं पानी के स्वप्न औ स्त्री के स्वप्न .. स्वप्न में पानी और पानी मे स्त्री और स्त्री में प्रेम सब गडमड हो जाता है ॥ शायद इसीका विस्तार है

शरद कोकास की यह कविता

पानी हो तुम

यह प्यास का आतंक है या निजता का विस्तार

दिवास्वप्नों में तुम्हारा स्त्री से पानी बन जाना

नदी बनकर बहना अपनी तरलता में

दुनिया भर की प्यास बुझाते हुए

अंतत: समा जाना सागर में


जरुरी नहीं जो रुपक स्वप्न में संभव दिखाई दें

सच अपनी सफेदी में उन्हे धब्बे की तरह न देखे


इसलिए प्रकृति में सब कुछ जहाँ अपने विकल्प में मौजूद है

एक बेहूदा खयाल होगा तुम्हारा स्त्री से नदी हो जाना


पानी होने की इच्छा को शक्ल देना इतना ज़रुरी हो

तो बेहतर है तुम झरना बन जाओ

अपने खिलंदड़पन में पहाड़ों से कूदो

बरसात में पूर्णता के अहसास से भ जाओ लबालब

निरुपाय होकर सूख जाओ ग्रीष्म में


इसके बाद भी तुम्हारा उत्साह कम न हो

और यथार्थ के इन नैसगिक चित्रों से तुम भयभीत न हो

तो निश्चिंत होकर कल्पना के समंदर में गोते लगाओ

मन के गीलेपन में फिर पानी का स्वप्न बुनो

और आवारा बादल बन जाओ

प्रेमियों के इस विशेषण को चुनौती दो

अपनी आवारगी में मुक्ति के गीत रचो

फिर न बरस पाने का दुख लिए

थक हार कर बैठ जाओ










बेहतर है मिट्टी की गंध लिए वाष्प बन जाओ

बहो बहो हवाओं में फैलों आँखों में नमी बनकर

घुटन में जीती दुनिया की साँसों में बस जाओ

ठंड में ठिठुरते लोगों के मुँह से निकलो

निकलो किसी गरीब की चाय की केटली से


या फिर शबनम बन जाओ

मुकुट सी सजो किसी पत्ती के माथे पर

किसी शहीद की लाश पर चढाए जाने तक

फूल की पंखुडियों में बस कर उसे ताज़ा रखो


चाहो तो काँटों पर सज जाओ

पगडंडी पर चलते पाँव सहलाओ


इससे तो अच्छा है बर्फ ही बन जाओ तुम

पड़ी रहो हिमालय की गोद में

गोलियों से टकराकर चूर हो जाओ

अपने स्नेह की उष्णता में पिघलो

धोती रहो अपनी देह पर लगा रक्त


या फिर बर्फ की रंगबिरंगी मीठी चुस्की बन जाओ

बच्चों के मुँह चूमो और खिलखिलाओ

अपनी लाल लाल जीभ दिखाकर उन्हे हँसाओ



यह सब न बन सको यदि तुम

तो अच्छा है आँसू बन जाओ

बहो पारो की आँखों से जीवन भर

देवदास की शराब में घुलकर उसे बचाओ

सुख से अघाई आँखों से अपनी व्यर्थता में फिसलो

या फिर उस माँ की पथराई आँखों से निकलो

पिछले दिनो जिसका जवान बेटा मारा गया था दंगो में


बेहतर है पानी बनने की जिद छोड़ो

वैसे भी तुम पानी ही तो हो

पानी से घिरी पृथ्वी की आँख का पानी

जो अभी मरा नहीं है

मानवता की देह में उपस्थित पानी

जो मनुष्य के दया भाव में छलकता है


पानी हो तुम समाज के चेहरे का

जिसके बल पर जीवित है सामाजिकता

तुम पानी हो और ज़रुरी है तुम्हे बचाना

इससे पहले कि यह पानीदार दुनिया

तुम्हारे बगैर रुखी- सूखी और बेरौनक हो जाए ।


शरद कोकास

रविवार, मई 31, 2009

तम्बाखू-एक नज़रिया यह भी


विश्व तम्बाखू निषेध दिवस पर कवि नसिर अहमद सिकन्द की कविता
"चुटकी भर" उनके कविता संग्रह "इस वक़्त मेरा कहा "से


तमाम वैधानिक चेतावनी के बावजूद
वह मुंह में
ओंठों के बीच दबी है
वह चुटकी भर है
पर मिर्च नहीं
हल्दी नहीं
नमक नहीं

पर नमक सा स्वाद है उसमें
इसके निर्माण की कला में
निपुण होता है इसका बनाने वाला

हर किसी को नहीं आता यह हुनर
हर कोई नहीं जानता
हथेली और अंगूठे का श्रम
वो देखो!
ठेका श्रमिकों की पूरी टोली
और एक साथी बना रहा इसे
अंगूठे से रगड़ता
हथेलियों की ताल से चूना झराता
अब बारी-बारी सब उठायेंगे
कोई नहीं लेगा ज्यादा
कोई नहीं मारेगा किसी का हक़
बस चुटकी भर
मुंह में
ओंठों के बीच दबायेंगे।

रविवार, मई 24, 2009

बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है




इन दिनो शादियों का मौसम है.आप भी शादियों में जाते होंगे और बैंड वालों को अपनी पसन्द की धुन बजाने का आदेश देकर उस पर नृत्य भी करते होंगे.उन बैंड वालों पर कभी ध्यान दिया है आपने? उनकी ज़िन्दगी के बारे में सोचा है? आइये साथ मिलकर सोचते हैं शरद कोकास की इस कविता में..

बैंड बाजे वाले

बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है
लगभग आखरी धुन होती है
दुलहन के द्वार पर जिसे बजाते है बैण्ड्वाले
वे खामोश उदासी में प्राण फूंकते हैं
हवा उनके संगीत पर नृत्य करती है
उनके चेहरे पर इकठ्ठा रक्त
शर्माती दुलहन के चेहरे को मात देता है
तानसेन की आलाप से ऊंचे स्वरों में
उनका क्लेरेनेट अलापता है राग दीपक
तभी हर शाम उनके घर चराग जलते हैं

पृथ्वी की छाती में धड़कता है उनका बैण्ड
मरे हुए चमडे़ से निकलती है आवाज़
जीवन का स्पन्दन बन जाती है

पांवों में थिरकन पैदा करती है
उनके पसीने की महक से सराबोर धुनें
सभ्यता की खोल से बाहर आते हैं आदिम राग
पीढियों का अंतर खत्म हो जाता है

उनकी परम्परा में शामिल है सबकी भूख
उनके पेशे में उनकी अपनी जाति
जन्म से लेकर मृत्यु तक हर उत्सव में
पीटा जाता है उनकी अहमियत का ढिन्डोरा
उनके संगीत से देवता जागते हैं
उनके संगीत से देवता प्रसन्नहोते है
अपनी कला मे सिध्द हस्त होने के बावजूद
कलाकार के उतरे हुए विशेषण में वे बाजेवाले कहलाते हैं

सदियों से मिली उपेक्षा और अपमान
फटे ढोल की तरह गले में लटकाये
प्लेट और पेट के तयशुदा
अनुपात वाली दावतो में
जूठन की तरह बचे रहते हैं वे
एक सुरीली तूती की तरह बजते हैं बैण्ड्वाले
इस बेसुरी दुनिया के नक्कारखाने में.


शरद कोकास