Saturday, November 28, 2009
रेल के डिब्बे में रात होते ही गठरी हो जाता है आदमी
हमारा समाज भी एक रेल के डिब्बे की तरह ही है । आपने सोचा है कभी कि क्लास या वर्ग की अवधारणा सर्वप्रथम आम आदमी ने रेल के डिब्बे से ही जानी । यह भी अनायास नहीं हुआ कि एक ज़माने में थर्ड क्लास कहलाने वाला डिब्बा अपग्रेड कर सेकंड क्लास कर दिया गया लेकिन उसमें सफर करने वाले का क्लास वही रहा । आज भी आम आदमी उसी क्लास में सफर करता है जिसे जनरल क्लास कहा जाता है ,इसलिये कि इससे ज़्यादा खर्च करने की उसकी क्षमता नहीं है । लेकिन इस आम आदमी का भी यह ख्वाब होता है कि वह कभी न कभी खास कहलाये .. वह धीरे धीरे पैर पसारता है और .. फिर कहीं न कहीं अपनी जड़े जमाने की कोशिश करता है .. रेल में जगह छिन जाने का डर और शहर में हमेशा उजड़ जाने का डर लिये वह अपनी अस्थायी बस्ती बसाता है .. इस क्षणिक उपलब्धि को भी वह उत्सव की तरह मनाता है .. हँसता है ,गाता है, मुस्कुराता है..और इस उत्सव के साथ ज़िन्दगी की रेल चलती रहती है ।
हाँ इन दिनों यह आम आदमी किसी और कारण से भी मुस्कुरा रहा है.. बता सकते हैं आप क्यों ? चलिये इस कविता को पढ़कर कुछ अन्दाज़ लगाइये ...
लोहे का घर-चार
रेल के डिब्बे में
रात होते ही
गठरी हो जाता है आदमी
भीतर मैले कुचैले विचार समेटे हुए
किसी की टांगों पर
या सर पर टांगे हों
तब भी
कोई बुरा नहीं मानता
टांग पसारने की
उपलब्धि हासिल होते ही
मुस्कुराता है आदमी
चलती है रेल ।
शरद कोकास
शीर्षक
आरक्षण. avilable . p.n.r.,
रेल जगह
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
12:10 PM
Thursday, November 26, 2009
मुम्बई 26 /11 की याद में...शहीदों को श्रद्धांजलि सहित
मेरी 1986 की डायरी से आतंकवाद के खिलाफ़ लिखी एक कविता
नोंच कर फेंक दी मैने अपनी आँखें
मैने फिर सुनी नींद में
एक दो तीन चार
पाँच छह सात आठ
मुझे लगा मेरा बच्चा
गुनगुनी धूप में बैठकर
गिनती याद कर रहा है
मैने देखा सपने में
बिखरा हुआ खून
पाँवों में महावर लगाते हुए
शायद पत्नी के हाथ से
कटोरी लुढक गई है
बम फटने की आवाज़ें
धुएँ का उठता बवंडर
शायद मोहल्ले के बच्चे
दीवाली की आतिशबाज़ी में व्यस्त हैं
फिर ढेर सारी आवाज़ें
भारी भरकम बूटों की
कल मेरा जवान भाई कह रहा था
परेड की तैयारी में
शायद उसके दोस्त
उसे लेने आये हैं
फिर कुछ औरतें
आँखों में लिये आँसू
पिछले दिनो ही तो मैने
अपनी लाड़ली बहन को विदा किया है
डोली में बिठाकर
मैने चाहा बारबार
खोलकर देखूँ अपनी आँखें
निकल आऊँ बाहर
चेतन अचेतन के बीच की स्थिति से
लेकिन नींद में
सुख महसूसने की लालसा में
सच्चाइयाँ खड़ी रहीं पीछे
यकायक संगीन की तेज़ नोक
सीने से चीरते हुए
पेट तक चली आई
मेरी खुली आँखों के सामने थी
खून के सैलाब में डूबी हुई
मेरी पत्नी की लाश
पहाड़ों की किताब पर
मासूम खून के छींटे
एन सी सी की वर्दी व बूटों से दबी
जवान भाई की देह
फटी अंगिया से झाँकता
इकलौती बहन का मुर्दा शरीर
चीखने चिल्लाने की कोशिश में
मैने एक बार चाहा
बन्द कर लूँ फिर से अपनी आँखें
और पहुंच जाऊँ कल्पना की दुनिया में
लेकिन मेरा पुरुषत्व
नपुंसकता की हत्या कर चुका था
अन्धे कुएँ में ले जाने वाली अपनी आँखें
सपनो की दुनिया में भटकाने वाली
अपनी आंखें
सब कुछ देख कर भी
शर्म से झुक जाने वाली
अपने आंखें
संगीन की नोक
मेरे पेट तक आकर रुक गई है
और मै नई आँखों से देख रहा हूँ
मेरी कमीज़ का रंग
अब लाल हो चला है ।
शरद कोकास
शीर्षक
आतंकवाद,
बम विस्फोट,
मुम्बई
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
1:51 PM
Sunday, November 22, 2009
हम सभी खानाबदोश है...
हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी जड़ों से उखड़कर नई जगहों पर जमने की कोशिश कर रहे हैं ..। खानाबदोशों की तरह हमारे पूर्वज जाने कहाँ से भटकते हुए आये और कहीं किसी जगह पर स्थायी हो गये । फिर उस पीढ़ी से कुछ लोग निकले रोजी-रोटी की तलाश में और नई जगह स्थापित हो गये । फिर अगली पीढ़ी में भी ऐसा ही हुआ । यह सिलसिला अभी भी चल रहा है और जाने कब तक चलता रहेगा !
मेरे परदादा स्व. विश्वेश्वर प्रसाद रायबरेली ज़िले के एक गाँव लाऊपाठक का पुरवा से निकले और फतेहपुर आ गये ,तीस वर्ष वहाँ रहने के बाद सन 1900 के आसपास मध्यप्रांत में बैतूल आ गये जहाँ उनके पाँच पुत्र हुए बाबूलाल बृजलाल,कुन्दनलाल,सुन्दरलाल व चन्दनलाल । फिर मेरे पिता श्री जगमोहन रोजी –रोटी के लिये बैतूल से निकले और महाराष्ट्र के भंडारा नामक स्थान पर आ गये । वीरेन्द्र चाचा मुम्बई में, रमेश चाचा नागपुर में और मनोहर चाचा भिलाई आ गये । और मै अपना घर छोड़कर निकला तो छत्तीसगढ़ के इस शहर दुर्ग में आ गया । मेरे और भी कई दादाओं,चाचाओं और भाइयों की यही कहानी है ।
हम में से बहुत से लोग हैं जो विस्थापन का यह दर्द भोग रहे हैं । इस देश के हर शहर में ऐसे लोग हैं जिनकी जड़े कहीं और थी और वे अब नई जगहों पर जमने की कोशिश कर रहे हैं । हाँलाकि समय के साथ वे उस नई जगह की संस्कृति में रच-बस गये हैं लेकिन उनके मन की व्यथा कौन समझ सकता है ..उस स्थिति में तो और भी नहीं जब 3-4 पीढ़ियाँ गुजर जाने के बाद भी उन्हे बाहरी समझा जाता है ।उन्हे बार- बार यह अहसास दिलाया जाता है कि उनके कारण स्थानीय लोगों की उपेक्षा हो रही है । उनका अपमान किया जाता है । और ऐसा कहने वाले यह भी नहीं सोचते कि बरसों पहले उनके पूर्वज भी कहीं बाहर से ही आये होंगे ।
हर साल देखता हूँ मैं .. छत्तीसगढ़ से न जाने कितने मजदूर रेल में बैठकर खाने-कमाने देश के सुदूर हिस्सों में जाते हैं । उनमें से कितने ही होते हैं जो फिर कभी लौटकर नहीं आते । रेल से यात्रा करते हुए जब भी मैं खिड़की से बाहर झाँकता हूँ तो उन हरे-भरे पेड़ों की ओर देखता हूँ जिनके बीज जाने कहाँ से आये होंगे और अब जो इस मिट्टी में स्थायी हो गये हैं ..। अब यही ज़मीन उनका घर है । फिर यह खयाल भी आता है कि यदि इन्हे इस जगह से उखाड़ कर कहीं और लगा दिया जाये तो क्या वे फिर पनप सकेंगे ? क्या उन्हे उनकी जड़ों से उखाड़ने का यह खेल उन्हे जीवन दे सकेगा ? क्या उन्हे हम वही सब कुछ दे सकेंगे ? वे डूब से विस्थापित हुए लोग हों ,चाहे आतंक से ,चाहे नये कारखाने बसाने के नाम पर उन्हे हटाया जा रहा हो ,चाहे रोजी-रोटी की मजबूरी से वे घर छोड़ रहे हों ..यह सवाल तो उन सभी के लिये है । इसी प्रश्न पर सोचते हुए 15 वर्ष पूर्व इस कविता ने जन्म लिया था । लोहे का घर-तीन
किसी पौधे को
कहीं और रोपने से
और उम्मीद मात्र से
क्या वह बन सकेगा
एक छायादार वृक्ष...?
क्या उसे दे सकेंगे हम
वही धूप धरती और आकाश
क्या उसे हासिल होंगे
दुलारने वाले वही हाथ
और बच्चों और चिड़ियों की
वही चहचहाहट
क्या उसे हम बचा सकेंगे
कुल्हाड़ियों से और
विकास के बुलडोज़रों से
लोहे के इस घर में बैठकर
सुरक्षित यात्रा करते हुए
मैं अक्सर सोचता हूँ...
खिड़की से दिखाई देते पेड़
कभी नहीं जान सकते
उखड़े पौधों का दर्द ।
-- शरद कोकास (चित्र गूगल से साभार )
Friday, November 20, 2009
सुविधा के दिनों में गर्दिश के दिनों की याद पैदा करती है रूमानियत
यह जीवन भी रेल में की गई यात्रा की तरह है जहाँ एक स्टेशन से हम यात्रा प्रारम्भ करते है और किसी एक स्टेशन पर समाप्त करते हैं । प्रारम्भ का स्टेशन तो हमें पता होता है लेकिन गंतव्य के स्टेशन का हमें पता नहीं होता वह कब आयेगा ..हम सशंकित होकर हर किसी से पूछते हैं , जब यह जवाब मिलता है कि अरे ..अभी तो आपका अंतिम स्टेशन बहुत दूर है तो हम खुश हो जाते हैं । और अगर कोई कह दे कि बस आपका अंतिम स्टेशन आने ही वाला है तो हम दुखी हो जाते हैं । कई लोग सोचते हैं कि अभी तो हमें बहुत दूर तक यात्रा करनी है वे अचानक किसी स्टेशन पर उतर जाते हैं ..हम सोचते ही रह जाते हैं ..अरे यह तो कहता था बहुत दूर का सफर है बीच में ही उतर गया । कुछ लोग यात्रा करते करते ऊब जाते हैं और सोचते हैं कि यह अंतिम स्टेशन कब आयेगा ? और कुछ अंत तक यात्रा में नहीं ऊबते और खुशी-खुशी आखरी स्टेशन पर उतर जाते हैं । सोचकर देखिये कितना कुछ सोचा जा सकता है इस “लोहे के घर” में यात्रा करते हुए .. इस यात्रा में हम सभी हम सफर हैं । किसीने यात्रा जल्दी शुरू कर दी है किसीने देर से । कोई बीस स्टेशन देख चुका है कोई अठ्ठाइस कोई पचास कोई सत्तर । जैसे जैसे स्टेशन आयेंगे नये मुसाफिर भी शामिल होते जायेंगे कोई पहले उतर जायेगा कोई देर तक यात्रा करता रहेगा । सबसे महत्वपूर्ण होगा साथ बिताया हुआ समय ..।जब एक न एक दिन आखरी स्टेशन पर उतरना ही है तो क्यों न करें ऐसा कि हम यह समय इस तरह साथ बितायें कि हमारे स्टेशन पर उतर जाने के बाद भी बचे हुए वे सहयात्री हमे याद रख सकें ।
अरे.. मैं जिस कविता को यहाँ देने जा रहा था उसका सन्दर्भ तो यह कतई नहीं था .. आप सोच रहे होंगे .. रूमानी होते होते पटरी बदलकर यह दार्शनिक कैसे हो गया ?, अब क्या करूँ ...लोग सलाह ही इतनी गम्भीर देते हैं । खैर .. इस कविता का सन्दर्भ देने की ज़रूरत ही नहीं आप पढ़ेंगे तो खुद समझ जायेंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ ।और यह भी कि इस कविता और पिछली कविता की “रूमानियत “ में क्या फर्क है?
लोहे का घर - दो
फुटबोर्ड पर लटककर
यात्रा करते हुए
याद आती हैं
सुविधाजनक स्थान पर बैठकर
की गई यात्राएँ
आरक्षित बर्थ पर लेटे हुए
फुटबोर्ड पर लटक कर
सही जगह की तलाश में
की गई यात्राएँ
उसी तरह जैसे
सुविधाओं से युक्त जीवन में
गर्दिश के दिनों की याद
पैदा करती है रूमानियत ।
-- शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार )
शीर्षक
आरक्षण,
कविता,
रेल यात्रा,
लोहे का घर,
शरद कोकास
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
7:38 PM
Tuesday, November 17, 2009
स्वप्न देखने के लिये टिकट लेना कतई ज़रूरी नहीं है ।
रात के सन्नाटे में दूर कहीं किसी रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनाई देती है । एक रेल धड़धड़ाते हुए किसी पुल से गुजर जाती है ..हवा में तैर जाता है एक हल्का सा कम्पन और सन्नाटे में गूंजता है दुश्यंत का यह शेर... ‘तू किसी रेल सी गुजरती है..मै किसी पुल सा थरथराता हूँ ।“
यह थरथराहट अवचेतन में बसे उन तमाम बिम्बों को सतह पर ले आती है जो अपनी बैचलर लाइफ में यात्राएँ करते हुए मैने सहेजे थे । एक रेल थी जो मुझे अपने शहर से दूर ले जाती थी और फिर कभी वापस लेकर नहीं आती थी । कभी आती भी थी तो फकत छुट्टियों में ..फिर वापस ले जाने के लिये ।
उन दिनों की स्मृतियों को सहेजता हूँ तो आज भी रेल में बैठते ही रेल का वह डिब्बा मुझे घर जैसा लगने लगता है , मै इसीलिये उसे “ लोहे का घर “ कहता हूँ । आपने भी इस बात को महसूस किया होगा कि यात्रा में जाने कितने परिवार मिल जाते है, कितने मित्र बन जाते है। हम उनसे कितना बतियाते हैं । बातें करते हुए अक्सर इतनी अंतरंगता हो जाती है कि जो बातें हम कभी किसी से नहीं कहते ट्रेन में मिले अपने सफर के साथी से कह देते हैं । यह जानते हुए भी हम दोबारा शायद ही कभी मिलें .. लेकिन अपने सुख-दुख बाँटना ,यही तो मनुष्य होना है । ऐसी अनेक रेल यात्राएँ मैने की हैं और इन यात्राओं में अनेक कवितायें लिखी हैं । “लोहे का घर “ शीर्षक से अलग अलग बिम्बों और चित्रों को लेकर यह कवितायें मेरे कविता संग्रह “गुनगुनी धूप में बैठकर “ में संग्रहित हैं । इस श्रंखला की यह पहली कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ..कविता ज़रा रूमानी है ..लेकिन मेरी उन दिनों की उम्र का खयाल करके बर्दाश्त कर लीजिये .. और हर्ज़ क्या है आप भी ज़रा सा रूमानी हो जायें ..प्रेम करने और स्वप्न देखने की भी कोई उम्र होती है .भला .?
लोहे का घर
सुरंग से गुजरती हुई रेल
उम्र के साथ
बीते सालों के
फड़फड़ाते पन्नों को
खिड़की से आया
पहचानी हवा का झोंका
किसी एक खास पन्ने पर
एक सूखा हुआ गुलाब का फूल
दुपट्टे से आती भीनी भीनी महक
रात भर जागकर बतियाने का सुख
उंगलियों से इच्छाओं का स्पर्श
स्वप्न देखने के लिये
टिकट लेना
कतई ज़रूरी नहीं है ।
- शरद कोकास
(पिछले दिनो की गई एक यात्रा का चित्र ,इस यात्रा में अचानक बचपन के दो दोस्त मिल गये थे ..चन्द्रपाल और सूरजपाल दोनों सगे भाई ,मेरी यह तस्वीर चन्द्रपाल ने अपने मोबाइल से ली है )
टिकट लेना
कतई ज़रूरी नहीं है ।
- शरद कोकास
(पिछले दिनो की गई एक यात्रा का चित्र ,इस यात्रा में अचानक बचपन के दो दोस्त मिल गये थे ..चन्द्रपाल और सूरजपाल दोनों सगे भाई ,मेरी यह तस्वीर चन्द्रपाल ने अपने मोबाइल से ली है )
शीर्षक
गुनगुनी धूप,
टिकट,
दुश्यंत,
यात्रा,
रेल,
लोहे का घर
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
11:41 PM
Sunday, November 08, 2009
आसान नहीं है किसी जवान मौत को बर्दाश्त कर लेना
बस बीस –इक्कीस साल उम्र थी अनिकेत की । मेरे मित्र अशोक कृष्णानी का बेटा जो अभी चार दिन पहले एक छोटे से स्टेशन पर न जाने किस उहापोह में रेल की पटरी पार करते हुए तेज़ गति से आती हुई रेल से टकरा गया । अच्छा खासा निकला था घर से और एक दिन बाद उसकी यह खबर आई । खबर के सदमे से उबर नहीं पाये थे कि बैंडेज में लिपटी उसकी मृत देह आ गई । बगैर उसका चेहरा देखे उसका अंतिम संस्कार ..उफ.. इतनी बड़ी सज़ा ? कल्पना भी जिस दृश्य की असम्भव उसे सच होते हुए देखना ? कठिन है ।
एक भयावह सी शांति पसरी हुई है उस घर में ,मौत जहाँ दस्तक दे चुकी है । सब जानते हैं कि उसके जीवन की यात्रा बीच में ही समाप्त हो चुकी है लेकिन माँ –बाप और दो छोटी बहनों को क्या कहें ..उनकी निगाहें अभी भी सड़क की ओर लगी है ,उन्हे अभी भी आस है कि शायद वह घर लौटकर आ जाये ।
अपने मित्र के आँसू पोंछकर चार दिनों बाद लौटा हूँ तो कुछ सूझ नहीं रहा है । याद आ रहे हैं अनिकेत जैसे बहुत सारे युवा जो घर से पिकनिक मनाने निकले और किसी नदी ,बावड़ी में डूब गये । कुछ जो तेज़ गति से चलने वाली बाइक पर सवार होकर हवा से बातें करते हुए निकले और किसी ट्रक से टकरा कर हवा में विलीन हो गये । कुछ जिन्होंने जीवन को खेल समझ लिया और नादानी में मौत के साथ यह खेल खेल गये । कुछ युवा जो देश की रक्षा के लिये निकले और मोर्चे पर शहीद हो गये ।
फिर याद आये वे ढेर सारे बच्चे ,भूख और बीमारियाँ जिन्हे निगल गई , और दंगे, बाढ़ ,भूकम्प ,अकाल और बम धमाकों में असमय काल के गाल में समा जाने वाले अनेक बच्चे,युवा और बुज़ुर्ग ।
आसान नहीं है ,मौत को इस तरह से स्वीकार कर लेना । सारे उपदेश .नीतिवाक्य ,और समझाने बुझाने की बातें धरी रह जाती हैं जब किसी बाप के कन्धे पर जवान बेटे की अर्थी दिखाई देती है ।
मै क्या कहूँ ... इतना ही कह पाया यह क्या कम है । एक कविता जो शायद मेरी भावनाओं को और आप की सम्वेदनाओं को शब्द दे सके ....
कठिन है
आसान नहीं है
किसी बच्चे की मौत का
दुख बर्दाश्त कर लेना
अनदेखे सपनों की पिटारी को
डेढ़ हाथ की कब्र में दफना आना
आसान तो नहीं है
किसी बरगद बुज़ुर्ग की मौत पर
आँसू पी जाना
यकायक छाँव गायब पाना
अपने सर से
आसान नहीं है
बिलकुल भी
किसी जवान मौत को
सदमे की तरह
बर्दाश्त कर लेना
ज़िम्मेदारियों के पहाड़ों से
मुँह चुराकर निकल जाना
बहुत कठिन है
बहुत बहुत कठिन
उनकी छोड़ी हुई
दुनियाओं के बारे में सोचना
और..
चट्टानों की तरह
अपनी जगह पर टिके रहना ।
- शरद कोकास
शीर्षक
अनिकेत कृष्णानी,
दुर्घटना,
मृत्यु
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
11:14 PM
Friday, October 30, 2009
आखिर हम घर किसके लिये बनाते हैं ?
मेरे पिता स्व.जगमोहन कोकास ,मध्यप्रदेश के बैतूल शहर से शिक्षक की नौकरी करने के लिये निकले और महाराष्ट्र के भंडारा नामक शहर में आ बसे । अपने से बड़े दो किसान भाईयों की मदद और अपना परिवार पालने की ज़द्दोज़हद में कुछ इस तरह फँसे रहे कि रिटायरमेंट से पहले अपना मकान नहीं बना पाये । तनख्वाह इतनी कम थी कि कर्ज़ भी नहीं मिला । जब तक मकान बना तब तक बेटी की शादी हो चुकी थी और दोनो बेटे अपनी नौकरी के लिये दूसरे शहर जा चुके थे । एक मेहनतकश,ईमानदार और ज़िम्मेदारियों के बोझ से लदे मध्यवर्गीय के साथ ऐसा हो सकता है । परिवार के साथ रहने का सुख हर इंसान जीवन भर ढूँढता रहता है।माता-पिता भी जीवन भर कोशिश करते है कि बच्चों को बेहतर परिवेश दे रहने के लिये और अन्य सुविधायें भी लेकिन जब सुविधायें मिलती है तब तक रोजी-रोटी की कश्मकश बच्चों को उनसे दूर कर देती है। आजकल बच्चे भी उच्च शिक्षा के लिये कम उम्र में ही घर से निकल जाते हैं और फिर नौकरी काम-धन्धे में ऐसे उलझते हैं कि कभी घर लौट नहीं पाते । बेटियों का विवाह के पश्चात अपने माँ-बाप से दूर चले जाना तो उनकी नियति है ।आम मध्यवर्गीय की इस व्यथा को उतारने की कोशिश की है मैने इस कविता में । यह कविता उन सभी माता-पिता के लिये और उन सभी बच्चों के लिये जो एक दूसरे से दूर हैं । शायद एक पिता का दर्द भी आपको इसमें नज़र आये .....।
रिटायरमेंट के बाद बना मकान
चिड़िया ने देखा
घोंसले का स्वप्न
पिता ने जुटाई थोड़ी सी पूंजी
तिनका तिनका हिम्मत
उमीदों की नींव पर
बन गया एक मकान
रिटायरमेंट के बाद
छत ढलने से पहले ही
ढलने लगे थे स्वप्न
यहाँ महकेगी रसोई
यहाँ खिलेगा गुलमोहर
यहाँ बसेंगे बहू-बेटे
दीवार नहीं थे बच्चे
जिनसे पिता चाहते थे सुरक्षा
छत भी नहीं थे बच्चे
जिनसे बुढ़ापे में हो छाँव की अपेक्षा
बूढॆ पिता नहीं जानते थे
बच्चे दीवार और छत की तरह
एक जगह टिके नहीं रहते
बच्चे पंछियों की तरह बढ़ते हैं
पर फैलाते हैं
दाने-पानी की खोज में
आंगन में अकेले बैठे पिता
सुनते हैं
परदेस जाते बेटे के कदमों की आवाज़
झाड़ते हैं
बिटिया के गुड्डे-गुड़ियों पर जमी धूल
बन्द पड़े सूने कमरे की ओर ताकते हुए
वे याद करते हैं
किराये के छोटे से मकान में बिताये
चहल पहल भरे दिन ।
--- शरद कोकास
(चित्र :मेरे निर्माणाधीन मकान का जो होम लोन की मदद से काफी पहले बन चुका है , दूसरा व तीसरा चित्र बाबूजी के बनाये हुए मकान और बाग़ीचे का जिसके लिये यह कविता लिखी गई , जो मैने बाबूजी को कभी नही सुनाई इस लिये कि यह सुनकर उन्हे दुख होता )
SHARAD KOKAS
शरद कोकास
द्वारा समय
3:47 AM
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