मंगलवार, जुलाई 21, 2009

इस सूर्य ग्रहण पर शर्म तो आ रही है

यह बताते हुए कि उन दिनो जब मै कविता का क ख ग नहीं जानता था मैने यह कविता लिखी थी सूर्यग्रहण पर और 16 फरवरी 1980 को सूर्यग्रहण के दिन यह प्रकाशित भी हुई थी नागपुर के नवभारत दैनिक में . उन दिनो आज जैसे डराने वाले टी.वी.चैनल नहीं थे ,अखबारों में पढा कि ग्रहण को नंगी आंखों से नहीं देखना है वरना दृष्टि चली जायेगी लेकिन मेरा कवि तो इसका उलटा ही सोच रहा था ऐसा भी तो हो सकता है कि सूर्य की ओर देखने से अन्धे को दिखाई देने लगे .बस इसी विचार पर कविता लिख मारी .कविता क्या, बस थोडी सी तुकबन्दी..कॉलेज के दोस्तों को सुना और वाह वाह भी खूब हुई .इतने सूर्यग्रहण आये और चले गये पर इसकी याद नहीं आई .कल एक पुराने मित्र ने इसकी याद दिलाई तो कागजों में ढूंढ निकाली .चलिये उन मौज-मस्ती के दिनों की याद करते हुए आपको भी सुना देता हूँ यह कहते हुए कि "प्लीज..बीयर विद मी.."

सूर्य ग्रहण 16 फरवरी 1980


सूर्य ग्रहण के दिन अजब हादसा हुआ

अन्धे की आँख में कुछ प्रकाश सा हुआ

कानों सुनी थी बातें जो कभी उसने

आँखो से लगा उनको वो परखने


आवारा नौनिहालों को देख वो गश सा खा गया

वे भाषण ,वे रैलियाँ बालवर्ष का क्या हुआ

बहुत सुना था शोर सरकार है बदली

बदले हैं सिर्फ बैनर नेता वही नकली


सुना था कि आया है प्रजातंत्र

मगर दिखा नहीं कहीं

पूछने पर वही जवाब आगे देखो तो सही


वही महंगाई,खाल उतरवाई

विकल्पहीनता की स्थितियाँ हैं

वही वादे हैं वही नारे हैं

हर कोई यहाँ दुखिया है


आँख वाले अन्धों के जहाँ में

कैसे वो रह पायेगा

अब वो बाट है जोह रहा

अगला सूर्यग्रहण कब आयेगा ??

शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार )

10 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है..बहुत ही बेहतरीन रचना!! मजा आ गया शरद भाई.

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  2. शरद जी
    आपकी रचना लाजवाब है.... करार व्यंग है समाज की परिस्थिति पर ........... इतना पहले भी आप कमाल का लिखते थे और अज भी कमाल का ........

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  3. सुन्दर रचना के साथ ........रोचक

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  4. Aapki rachna ke saath-saath aapke blog ka design bhee bahut khoobsoorat hai. Samagree bhee hogi hi. Sabke liye ek saath badhaai

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  5. बढिया रचना!!!वर्तमान के हालातों पर भी उतनी ही लागू जितनी कि 1980 में, जब आपने ये कविता लिखी होगी।

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  6. आपकी इस ख़ूबसूरत, शानदार और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

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