सोमवार, अक्तूबर 02, 2017

स्मृति साहित्य का व्याकरण है - लवली गोस्वामी

आज दिनांक 2 अक्टूबर २०१७ के दैनिक जागरण में युवा कवि लवली गोस्वामी के रचनाकर्म  पर वरिष्ठ कथाकार, पत्रकार गीताश्री जी की एक टिप्पणी प्रकाशित हुयी है. इस टिप्पणी को लिखने के क्रम में गीताश्री और लवली गोस्वामी के मध्य कुछ वार्तालाप मेल पर हुआ था. लवली ने यह मुझे पढ़ने को दिया. मुझे यह रोचक लगा. यह साक्षात्कार गीता जी और लवली की अनुमति से मैं यहाँ ब्लॉग पर लगा रहा हूँ. आप पढ़े इसमें कवि के रचनाकर्म और कविता पर कुछ रोचक टिप्पणियाँ हैं.

1. गीताश्री -    आपकी कविताएँ बहुत लंबी और शिल्प के स्तर पर भी थोड़ी दुरुह , एक्सपेरिमेंटल हैं. क्या जानबूझकर कर या होता चला गया.

लवली गोस्वामी -  पहले मैं लम्बी कविता के बारे में बात करती हूँ. कविताएं बहुत लम्बी हैं, ऐसा सिर्फ तब ही कहा जा सकता है जब आप आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास को अनदेखा करेंगी. मैं छायावाद को छोड़ भी दूं तो नयी कविता में ऐसे अनेक उदाहरण आपके पास हैं, जो आपको मेरी कविताओं से अधिक लम्बी लग सकती हैं. शमशेर की टूटी हुई बिखरी, मुक्तबोध की “अँधेरे में” अज्ञेय की  “चक्रांत शीला, “असाध्य वीणा” आदि. मेरी अब तक लगभग चालीस के लगभग कविताएँ प्रकाशित होंगी जिसमे पाँच या छह वाकई लम्बी कविता कही जा सकती है. मैंने कई कविताएँ लिखी हैं जो पांच या सात लाइन की भी हैं. सबसे छोटी कविता चार लाइन की है. हर कवि में यह मिले – जुले रूप में होता है, कुछ कविताएँ लम्बी  कुछ छोटी होती हैं. जितने में लग जाए कि कोई बात यहाँ तक पूरी हो रही है, मैं उतना ही लिखती हूँ. मेरा ध्यान इस तथ्य पर रहता है कि बात संप्रेषित हुयी कि नहीं कविता कितनी लम्बी है या छोटी इसपर नहीं.

दूसरी बात शिल्प में कुछ प्रयोग मैंने किये हैं, ज़ाहिर है वे सचेतन प्रयोग है. मुझे महसूस हो रहा था कि अब तक की कविता में जो शिल्प मेरे पहले के मेरे बेहद प्रिय कवियों ने प्रयोग किया है वह मेरी बात के लिए अपर्याप्त है, तो जैसे मुझे बात स्पष्ट होती हुयी लगी मैंने उसे वैसे ही रखा. कुछ कविताओं “जैसे प्रेम के फुटकर नोट्स” और “आलाप” के प्रत्येक नए से लगते हिस्से के पहले एक दो या तीन लाइन का पूर्वकथन या फिर अंत में निष्कर्ष के रूप में कही गयी पंक्तियाँ इसी नए शिल्प का हिस्सा है. यह मेरी कोशिश थी मेरा अपना लहजा ढूँढने की, या साहित्यिक भाषा में कहें तो या मेरी काव्य – योजना थी मेरी सचेतन पोयटिक्स का हिस्सा.

तीसरी बात दुरुहता, मैं समझ नहीं पायी कि आपका इशारा है किस तरफ है, दुरूह भाषा या फिर वाक्यों का काव्यात्मक अर्थ या कविता के शिल्प की दुरुहता यह तीनों अलग बातें हैं. मैंने भाषा वही इस्तेमाल की है जो मैं किसी हिंदी भाषी से बोलते वक्त इस्तेमाल करती हूँ, हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि लोगों से बात करते वक्त मैं जटिल हिंदी के शब्दों की जगह उनके अंग्रेजी अनुवाद भी उपयोग कर लेती हूँ, कविता में भी यह कभी – कभी होता है, कभी नहीं. कभी हिंदी के जटिल शब्द वैसे ही रह जाते है. और अर्थ में जो जटिलता दिखती है वह एक तरह से सामने वाले की दिमागी परिपक्वता और उसकी सहृदयता पर भी निर्भर है. कविता पढना सीखना पड़ता है. रस्ते चलते अख़बार पढ़े जा सकते हैं साहित्य नहीं. यह एक प्रकार से पाठक के लिए आग्रह और कसौटी दोनों है, कि आप रुक कर पढ़े अन्यथा न पढ़े. हालाँकि मैं पल्प लिटरेचर या सरल साहित्य कि आलोचक या विरोधी नहीं हूँ.
2.   गीताश्री -     प्रेम कविताओं में कुछ अनूठे बिंब, टटका -सा, तरल - सा कुछ. प्रेम आपकी कविताओं का मूल स्वर है. आप ख़ुद को किसका कवि मानती हैं? प्रेम या इतर ?

लवली गोस्वामी
लवली गोस्वामी - यह मैंने बहुत लोगों से कई बार सुना है कि “आपकी कविता का मूल स्वर “प्रेम” है”. मैं इससे इंकार नहीं करुँगी. स्त्री पुरुष के संबंध मुझे हमेशा से रोचक विषय लगे. मैंने स्त्री यौनिकता पर राजनितिक – आर्थिक दृष्टी से किताब भी लिखी है. हाल के दिनों में मैंने किसी पत्रिका के एक अंक के लिए एक आत्मकथ्य लिखा था इस विषय पर, (वह अभी प्रकाशित होने में समय है इसलिए मैं नाम नहीं लिख रही ), मैं वही बातें यहाँ दुहरा देती हूँ. मैंने लिखा था प्रेम, दर्शन और राजनीति तीनों ही मेरी कविताओं के प्रस्थान बिंदु हैं. मुझे लगता है प्रेम एक सूत्र है जिसमे आप जीवन के कई आयाम और उससे जुड़े अनुभव संजो सकते हैं.

पुराने ज़माने में जब कवि लिखते थे तो वे ईश्वर से या कला की देवियों (अलग – अलग सभ्यताओं में अपनी परम्परा के अनुसार ) से संवाद करते हुए अपनी कविता लिखते थे. बाद में ऐसा हुआ वे कविताएँ संवाद तो रही लेकिन उसमे कई और कई लोग जुड़ गए, जैसे सम्बन्धी, प्रेमी, गुरु, समाज या खुद कवि का अदर सेल्फ (अल्टर इगो), आदि. फिर भी विराट सत्ता जिसे आप आम भाषा में ईश्वर कह लें और प्रेमी को सम्बंधित कविताएँ अधिक रही. अगर कविता कवि की ध्वनि है तो किसी को संबोधित होगी. जो उसे प्रिय होगा, जो करीब होगा कवि उसे ही संबोधित करेगा, इस हिसाब से  प्रेम एक सूत्र है, जो जीवन भर में मिले कई अनुभव एक धागे में पिरोने में मदद करता है. लेकिन कविताओं में सिर्फ प्रेम नहीं होता  बल्कि समकालीन समाज, राजनीति और दर्शन से जुडी कई बातें होती हैं. मुख्यतः एक अनुभव जो स्वयं जीवन जितना बड़ा है, होता है.

3. गीताश्री  - आपके लिए कविताएँ क्यों जरुरी?  ऐसा लगता है जैसे भीतर से कुछ भरभरा कर निकल रहा हो. बहुत वाचाल हैं कहीं कहीं... ये क्या है ? मुक्ति का मार्ग है या अपने को खोने पाने का साधन ?

गीताश्री
लवली गोस्वामी - मैं नितांत सामाजिक प्राणी हूँ, जैसा कि हर मनुष्य होता है. मैं कई सांस्कृतिक – साहित्यिक संगठनों का अनौपचारिक हिस्सा भी रही हूँ. सांस्कृतिक साहित्यिक रूप से अपने परिवेश में हमेशा सक्रीय रही हूँ. अपने बचपन से मुझे लगता है बोलने के मुकाबले मैं लिख कर अपनी बात अधिक अच्छे से कह पाती हूँ. लिखना मुझे संतोष देता है. यह खुद को ढूंढना तो है ही, समाज में अपनी स्थिति को खोजना, अपनी जिज्ञासाओं और प्रश्नों के हल तलाश करना है. जो लोग मुझे पढ़ सकते हैं , उनसे यह पूछना भी है कि “जीवन को मैंने ऐसा देखा, आपका इस बारे में क्या ख्याल है ?” फिर उनके उत्तर पर सोचना है, फिर लिखना है यह एक निरंतर चलती प्रक्रिया है. जैसा कि मुक्तिबोध कह गए हैं – “मुक्ति है तो सबके साथ है.” भले ही मैं एकांत में साहित्य की साधना करूँ लेकिन वह एक दिन तो लोगों के सामने आएगा ही, इसी लिए लिखते हैं हम. हाँ, यह संवाद खुद से भी होता है, उतना ही, जितना दूसरे लोगों से.

यह साहित्य के हर फार्म में होता है मैं लगभग सात – आठ साल से लिख रही हूँ जिसमे मैंने एक किताब, कई निबंध और कई सारी कविताएँ लिखी है. अभी भी दो अधूरे प्रोजेक्ट में लगी हूँ, जो जाने कब पूरे होंगे. कविताये भी इस व्यापक दृश्य का हिस्सा है. यह विधा संक्षिप्त, सटीक और सुन्दर होने की ताक़त रखती हैं इसलिए विशेष प्रिय है. और कुछ है जो बहुत गहरे कहीं राहत देता है, जो अन्य फार्म कम या नहीं दे पाते, कविता  पीड़ा, क्लेश और अवसाद झेलने की ताकत देती है, फिर वह क्लेश व्यक्तिगत हो या सामाजिक. 

जहाँ तक वाचाल होने का प्रश्न है तो वाचाल कवि का “सेल्फ ” है या कविता मितभाषी नहीं है, यह दोनों अलग बातें हैं. अपनी तरफ से मैं दोनों पर नियत्रण रखने की कोशिश करती हूँ. यह याद रखने वाली बात है कि कवि का “मैं” सिर्फ उसका “मैं ” नहीं होता, उस बहाने से वह दुनिया के बहुत सारे “मैं” का प्रतिनिधित्व भी करता है. वह वाचाल है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि कवि के पास शब्दों के अलावा कुछ और नहीं है. वह आपति ज़ाहिर करेगा, क्षमा मांगेगा, अफ़सोस करेगा, प्रतिरोध करेगा, सहमत होगा, प्रशंसा करेगा, राजनीति करेगा या प्रेम करेगा यह सब अभिव्यक्त शब्दों में ही होगा.

4. गीता श्री -     कविता कब आती है, कैसे ? लिख जाने के बाद क्या महसूस होता है ?
लवली गोस्वामी - अलग – अलग तरीके से आती है कविता, कभी किसी से बात करते, कोई वाक्य अचानक जुबान पर आ जाये और लगे कि कविता है, कभी अकेले बैठकर सोचते, कभी घर या बाहर के बहुत मामूली काम करते, बर्तन धोते या बाज़ार से सौदा खरीदते. कभी किसी मीटिंग के बीच. उसी क्षण नोट कर लेती हूँ. फिर उसे कहाँ रखना है या वह किस कविता का हिस्सा है यह बाद में तय करती हूँ. जब नहीं कर पाती तो बाद में याद करने की कोशिश करती हूँ. कई बार याद नहीं भी आती. तब अफ़सोस होता है.

कई बार कविताएँ पूरा होने में बहुत वक्त लेती हैं. “प्रेम पर फुटकर नोट्स” डेढ़ साल में लिखी गयी कविता है. ऐसा नहीं है कि मैं लगातार उसी पर सोच रही थी, बीच में कई लेख, एक किताब आदि लिखे लेकिन  वह खंड – खंड में दिमाग में आती थी. मैंने उसके मुकम्मल स्वरुप में आने का इंतजार किया. पूरा करके ख़ुशी हुयी. अक्सर होती है जैसे कोई भी अच्छा काम करके, अच्छा इटालियन खाना बनाकर, या फिर पेंटिंग करके होता है, किसी की मदद करके भी. मतलब एक तरह की तृप्ति, रचनात्मक तृप्ति.

 5.  गीताश्री -     आप ख़ुद को कविता में कहाँ देखती हैं और कहाँ पाती हैं?
-         लवली गोस्वामी    - यह मुश्किल सवाल है, मूलत मैं एक विद्यार्थी हूँ कविता की. अच्छी और सच्ची कविता की परम्परा में एक तुच्छ अभ्यासी. मैं कविता की पम्परा का बहुत सम्मान करती हूँ. अगर उसमे कुछ सकारात्मक जोड़ पाउंगी तो मुझे अच्छा लगेगा.

6. गीताश्री -  स्मृतियाँ बहुत हावी हैं आपकी कविताओं पर. क्या कविता के लिए स्मृति एक पवित्र और अखंड अवधारणा है जिसके पास बार बार लौट कर जाना पड़ता है
लवली गोस्वामी -    हर किस्म का सहित्य स्मृति पर आधारित होता है. अगर इसी क्षण मैं आपके मन से सब स्मृतियाँ पोछ दूं तो आप कुछ नहीं लिख पाएंगी. यह कोई पवित्र चीज नहीं, एक तरह से साहित्य की आत्मा ही स्मृति है. आप शब्द लिख रही हैं तो उसके पीछे परिभाषा एक स्मृति की तरह है. आप वाक्य बना रही हैं तो उसके गठन के आधार में व्याकरण की स्मृति है. स्मृति साहित्य का व्याकरण है. वह वास्तविक आधार है वह जिस पर आप साहित्य के झालरदार के कंगूरे गढ़ते है.

दैनिक जागरण से साभार.

3 टिप्‍पणियां:

  1. स्मृति और व्याकरण पर फिर विचार करना होगा। स्मृति साहित्य का व्याकरण कैसे हो सकता है ?

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    1. अखिलेश जी , छठवाँ उत्तर कृपया पुनः देखें , स्मृति को साहित्य की आत्मा कहा गया है । हम जब कोई वाक्य बनाते हैं तो हमारे अवचेतन में व्यकरण के अध्ययन की जो स्मृति होती है उसके आधार पर बनाते हैं

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-010-2017) को
    "शुभकामनाओं के लिये आभार" (चर्चा अंक 2747)
    पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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