कविता ही ज़िन्दगी हो जहाँ ऐसी एक दुनिया है यहाँ...शरद कोकास कोश में पढ़िए शरद कोकास और मित्रों की कविताएँ और लेख
सोमवार, अगस्त 15, 2016
शरद कोकास की लम्बी कविता ' देह '
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2016
लवली गोस्वामी की कविताएँ
लवली गोस्वामी मूलतः दर्शन और मिथक शास्त्र की स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं कवयित्री हैं . पिछले साल प्रकाशित उनकी पुस्तक ' प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता ' काफ़ी चर्चा में रही . लवली बहुत दिनों से सैद्धांतिक लेखन में सक्रिय हैं . वे कविताएँ भी लिखती हैं . इस बार प्रस्तुत है उनकी तीन कविताएँ जो साहित्यिक पत्रिका 'सदानीरा ' में प्रकाशित हैं ,पत्रिका से साभार - शरद कोकास
मेरी कल्पना में तुम
थकान की पृथ्वी का बोझ पलकों पर उठाए
पुतलियाँ अतल अंधकार में डूब जाना चाहती हैं
पर देह एक अंतहीन सुगबुगाहट के साथ जागना चाहती है
पर देह एक अंतहीन सुगबुगाहट के साथ जागना चाहती है
बारिश के बाद हरियाती पीली फूस जैसे सर उठाते
दरदरी मिट्टी के कण स्नेह से झटक देती है
ठीक वैसे ही रोम - रोम कौतुक से ऊँचककर तुम्हें देखता है
आत्मा की आँखें त्वचा पर दस्तक देती हैं
शताक्षी की देह में उगी पलकों की तरह
प्रत्येक रोमकूप में आँखे उगी हैं
अवश देह रोओं की लहलहाती फसल बीच
तुम्हारी उपस्थिति बो रही है
प्रत्येक रोमकूप में आँखे उगी हैं
अवश देह रोओं की लहलहाती फसल बीच
तुम्हारी उपस्थिति बो रही है
स्मृतियों के तमाम हरकारे कानों में
धीरे से फुसफुसाते हैं
तुम देह का कोलाहल नहीं हो, कलरव हो
तुम मन की प्रतीक्षा नहीं हो, सम्भव हो
अवसाद के नर्क के सातवें तले में
अवसाद के नर्क के सातवें तले में
तुम्हारे मन के प्रवेश - कपाट खुलते हैं
देहरी से आते धर्मग्रंथों के उजाले के
विरुद्ध सर झुकाये तुम
देवदूत गैब्रियल की शक्ल लिए दिखाई देते हो
देवदूत गैब्रियल की शक्ल लिए दिखाई देते हो
कुँवारी मैरी तक ईश्वर का सन्देश पहुँचाने के एवज में तुम पर
धर्मधिकारियों द्वारा पवित्रता नाशने का अभियोग लगाया गया है
बतौर सजा तुम्हारे पंख नुचवा लिए गए हैं
पँखों की लहूलुहान कतरने लेकर तुम
सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी में वहाँ चढ़ जाते हो
जहाँ से निर्बल असहाय पक्षी आत्महत्या करते हैं
दुखी मन से शेष बचे सफ़ेद पंख नोचकर
तुम उन्हें पहाड़ से नीचे उछाल देते हो
वे पंख नभ की आँखों से झरने वाले पानी के बादल बन जाते हैं
हर वर्षा ऋतु सृष्टि तुम्हारी पीड़ा का शोक मनाती है
अंधकार अब घटित हो रहा है
पलकें अब स्वप्नों का दृश्य - पटल है
मेरी कल्पना में तुम पद्मासन लगाये
सिद्धार्थ में तब्दील गए हो
इस दृश्य में तुम बोध प्राप्ति के ठीक पहले के बुद्ध हो
मैं तुम्हारी गोद में पड़ी अर्धविकसित अंडे में बदल गई हूँ
तुम्हारी देह की ऊष्मा से पोषण पाकर
अपने प्रसव की आश्वस्ति में नरमी से मुस्कुराती मैं
अपनी कोशिकाओं को निर्मित होता देखती हूँ
उठकर जाने की बाध्यता से डरकर तुम
इस दृश्य में तुम बोध प्राप्ति के ठीक पहले के बुद्ध हो
मैं तुम्हारी गोद में पड़ी अर्धविकसित अंडे में बदल गई हूँ
तुम्हारी देह की ऊष्मा से पोषण पाकर
अपने प्रसव की आश्वस्ति में नरमी से मुस्कुराती मैं
अपनी कोशिकाओं को निर्मित होता देखती हूँ
उठकर जाने की बाध्यता से डरकर तुम
मेरे सकुशल जन्म तक बोध - प्राप्ति की अवधि बढ़ाते जाते हो
मैं मुलमुलाती अधखुली पलकों से देखती
हूँ
तुम सफ़ेद रौशनी की तरह दिखते हो
अर्धविकसित धुंधले मन से सोचती हूँ
तुम दुःख के कई प्रतीकों में ढल जाते
हो
मैं देखती हूँ हर प्रतीक्षा दरअसल एक
अभ्यास है
अभिसार की प्रतीक्षा प्रेम का अभ्यास है
अभिसार की प्रतीक्षा प्रेम का अभ्यास है
प्रसव की प्रतीक्षा मातृत्व का अभ्यास है
बुद्धत्व की प्रतीक्षा मोहबद्धता का अभ्यास है.
बुद्धत्व की प्रतीक्षा मोहबद्धता का अभ्यास है.
नींद के बारे में
वह मुझसे पहले सोने जाता और मुझसे पहले
जागता था
मैं अक्सर लिखते - लिखते सर उठा कर कहती तुम सो जाओ
मैं बाद में आकर तुम्हारे पास सो जाउंगी
मैं अक्सर लिखते - लिखते सर उठा कर कहती तुम सो जाओ
मैं बाद में आकर तुम्हारे पास सो जाउंगी
मैं उसके साथ सोती थी
जैसे दरारों में देह को दरार का ही आकार दिए जोंक सोती है
संकीर्ण दुछत्तियों में थककर चंचल बिल्लियाँ सोती है
धरती की देह पर शिराओं का - सा आकार लिए
नदियाँ सोती है
नाल काटे जाने के ठीक बाद नाक से साँस
लेने का अभ्यास करता शिशु सोता है
जैसे धरती आकाश के बीच लटके मायालोक में त्रिशंकु सोता होगा
जैसे धरती आकाश के बीच लटके मायालोक में त्रिशंकु सोता होगा
सोने की क्रिया
हमेशा मेरे लिए एक प्रकार की निरीहता रही
पराजय रही
जागना एक सक्रियता
एक आरोहण
एक आरोहण
वह ताउम्र मुझसे कहता रहा
"कभी सोया भी करो बुरी बात नहीं"
मैं इस अच्छी बात को रोज उसके चेहरे पर होता देखने के लिए जागती रही
मैं कहती रही किसी को सोते देखना सुख देता है
वह समझदार मेरी इस समझ को नासमझी कहकर
मुझे सुलाने की कोशिश करता रहा
वैसे तो सोया हुआ आप रात को तालाब के जल को भी कह सकते हैं
उसके भीतर आसमान गतिमान रहता है
सब तारे उस पर झुक - झुक कर अपना चेहरा देखते हैं
मैं भी उसे सोते हुए मुस्कुराते देखकर
वैसे तो सोया हुआ आप रात को तालाब के जल को भी कह सकते हैं
उसके भीतर आसमान गतिमान रहता है
सब तारे उस पर झुक - झुक कर अपना चेहरा देखते हैं
मैं भी उसे सोते हुए मुस्कुराते देखकर
उसकी आत्मा में अपनी उपस्थिति देखती थी
मेरे अंतस में वह ऊर्जा के केंद्र के जैसा ही था
पृथ्वी के कोर में पिघले खनिज की तरह
मेरे अंतस में वह ऊर्जा के केंद्र के जैसा ही था
पृथ्वी के कोर में पिघले खनिज की तरह
महावराह की तरह जब वह जल के सीमाहीन
विस्तार पर
मुझे हर जगह तलाश रहा था
मैं उसके अंतस में जलप्लावित पृथ्वी सी
समाधिस्थ थी
आप कह सकते हैं वह दिपदिपाता गतिमान मेरे अंदर सो रहा था
मैं अनवरत घूमती दिन -रात के चक्कर काटती उसके अंदर जाग रही थी
अगर देह ब्रह्माण्ड है तो प्रत्येक नींद प्रलय है
जो स्वप्न अगली सुबह स्मृति में शेष रह जाते हैं
वे नूह की नौका में बचे जीवित पशु - पक्षी हैं
आप कह सकते हैं वह दिपदिपाता गतिमान मेरे अंदर सो रहा था
मैं अनवरत घूमती दिन -रात के चक्कर काटती उसके अंदर जाग रही थी
अगर देह ब्रह्माण्ड है तो प्रत्येक नींद प्रलय है
जो स्वप्न अगली सुबह स्मृति में शेष रह जाते हैं
वे नूह की नौका में बचे जीवित पशु - पक्षी हैं
यही स्मृतियाँ हमें आने वाले कल्प से
दिन में
जीने के लिए माकूल कोलाहल बख़्शती है
पलकें नियामत हैं
(आप पर्दे भी पढ़े तो चलेगा )
वरना जरा सोचिये कैसा लगता होगा
जब नींद में मगरमच्छ को आते देखकर भी मछलियों की नींद नहीं टूटती होगी
वह अंतिम भयानक सपना तो याद होगा आपको
जिसने आपको न जाग पाने की विवशता का परिचय दिया होगा
वही आपके मन के सबसे अँधेरे कोने में छिपे डर का सपना
जो नुकीले दातों से आपको कुतर देता है पर आपकी नींद नही खुलती
नींद आश्वस्ति है
जागना अविश्वास है
तो बताइये आप मछलियों को क्या देना चाहेंगे
आश्वस्ति या अविश्वाश ?
मछलियाँ खुली आँखों से सच्ची निरीह नींद सोती हैं
बगुले सोने का अभिनय करके झपट कर शिकार पकड़ते हैं
दुनिया के तमाम घोड़े खड़े – खड़े सोते हैं
जबकि उल्लू दिन की रौशनी को अनदेखा करके सोते हैं
सोना कतई सामान्य प्रक्रिया भर नहीं है
पलकें नियामत हैं
(आप पर्दे भी पढ़े तो चलेगा )
वरना जरा सोचिये कैसा लगता होगा
जब नींद में मगरमच्छ को आते देखकर भी मछलियों की नींद नहीं टूटती होगी
वह अंतिम भयानक सपना तो याद होगा आपको
जिसने आपको न जाग पाने की विवशता का परिचय दिया होगा
वही आपके मन के सबसे अँधेरे कोने में छिपे डर का सपना
जो नुकीले दातों से आपको कुतर देता है पर आपकी नींद नही खुलती
नींद आश्वस्ति है
जागना अविश्वास है
तो बताइये आप मछलियों को क्या देना चाहेंगे
आश्वस्ति या अविश्वाश ?
मछलियाँ खुली आँखों से सच्ची निरीह नींद सोती हैं
बगुले सोने का अभिनय करके झपट कर शिकार पकड़ते हैं
दुनिया के तमाम घोड़े खड़े – खड़े सोते हैं
जबकि उल्लू दिन की रौशनी को अनदेखा करके सोते हैं
सोना कतई सामान्य प्रक्रिया भर नहीं है
एक चुनी हुई आदत है
उससे भी बढ़कर एक साधा हुआ अभ्यास है.
मेरे लिए प्रेम मौन के स्नायु में गूंजने वाला अविकल संगीत है
तुम्हारा मौन प्रेम के दस्तावेजों पर तुम्हारे अंगूठे की छाप है
रात का तीसरा प्रहर कलाओं के संदेशवाहक का प्रहर होता है
जब सब दर्पण तुम्हारे चित्र में बदल जाते हैं
मैं श्रृंगार छोड़ देती हूँ
जब सुन्दर चित्रों की सब रेखाएं
तुम्हारे माथे की झुर्रियों का रूप ले लेती हैं
मैं उष्ण सपनों के रंगीन ऊन पानी में बहाकर
सर्दी की प्रतीक्षा करती हूँ
सर्दियाँ यमराज की ऋतु है
सर्दियाँ पार करने के आशीर्वाद हमारी परम्परा हैं
* पश्येम शरदः शतम्
** जीवेम शरदः शतम्
मृत्यु का अर्थ देह से उष्णता का लोप है
तो शीत प्रेम का विलोम है
अक्सर सर्दियों में बर्फ के फूलों सा खिलता तुम्हारा प्रेम मेरी मृत्यु है
तुम मृत्यु के देवता हो
तुम्हारे कंठ का विष अब तुम्हारे अधरों पर है
तुम्हारे बाहुपाश यम के पाश हैं
सर्दियों में साँस - नली नित संकीर्ण होती जाती है
आओ कि आलिंगन में भर लो और स्वाँस थम जाये
न हो तो बस इतने धीरे से छू लो होंठ ही
कि प्राणों का अंत हो जाये
तुम मेरी बांसुरी हो
प्रकृतिरूपा दुर्गा की बाँसुरी
तुममे सांसों से सुर फ़ूँकती मैं
जानकर कितनी अनजान हूँ
छोर तक पहुंचते मेरी यह सुरीली साँस
संहार का निमंत्रण बन जायेगी
मेरे बालों में झाँकते सफ़ेद रेशम
जब तुम्हारे सीने पर बिखरेंगे
गहरे नील ताल के सफ़ेद राजहंसों में बदल जायेगे
ताल, जिसे नानक ने छड़ी से छू दिया कभी न जमने के लिए
हंस, जो लोककथा में बिछड़ गए कभी न मिलने के लिए
मेरे प्रिय अभागे हरश्रृंगार इसी प्रहर खिलते हैं
सुबह से पहले झरने के लिए
सृष्टि के सब सुन्दर चित्र मेरा - तुम्हारा वियोग हैं
मेरे मोर पँख, कहाँ हो
मेरा जूडा अलंकार विहीन है
मेरी बांसुरी, मेरी सृष्टि लयहीन है.
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-लवली गोस्वामी
# "पश्येम शरदः शतम्" -हम सौ शरदों तक देखें, सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति
स्पष्ट बनी रहे.
#" जीवेम शरदः शतम् " -हम सौ शरदों तक जीवित रहें .
#" जीवेम शरदः शतम् " -हम सौ शरदों तक जीवित रहें .
- लवली गोस्वामी
शीर्षक
2016,
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‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2014
शरद कोकास का नया कविता संग्रह " हमसे तो बेहतर हैं रंग
शीर्षक
कविता,
शरद कोकास,
हमसे तो बेहतर हैं रंग,
Dakhal Prakashan दख़ल प्रकाशन,
Delhi,
Hamse To Behatar Hain Rang,
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‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शनिवार, सितंबर 22, 2012
1989 की कवितायें - दो तिहाई ज़िन्दगी
यह उन दिनों की कविता है जब नौकरी भी आठ घंटे करनी होती थी और मजदूरी के भी आठ घंटे तय होते थे , शोषण था ज़रूर लेकिन इतना नहीं जितना कि आज है । कुछ अजीबोगरीब बिम्बों के साथ लिखी यह कविता ...
59 दो तिहाई ज़िन्दगी
भुखमरी पर छिड़ी बहस
ज़िन्दगी की सड़क पर
मज़दूरी करने का सुख
कन्धे पर लदी अपंग संतान है
जो रह रह मचलती है
रंगीन गुब्बारे के लिये
कल्पनाओं के जंगल में ऊगे हैं
सुरक्षित भविष्य के वृक्ष
हवा में उड़ –उड़ कर
सड़क पर
आ गिरे हैं
सपनों के कुछ पीले पत्ते
गुज़र रहे हैं सड़क से
अभावों के बड़े- बड़े पहिये
जिनसे कुचले जाने का भय
महाजन की तरह खड़ा है
मन के मोड़ पर
तब
फटी जेब से निकल कर
लुढ़कती हुई
इच्छाओं की रेज़गारी
बटोर लेना आसान नहीं है
मशीनों पर चिपकी जोंक
धीरे-धीरे चूस रही है
मुश्किलें हल करने की ताकत
चोबीस में से आठ घंटे बेच देने पर
बची हुई दो तिहाई ज़िन्दगी
कई पूरी ज़िन्दगियों के साथ मिलकर
बुलन्द करती है
जीजिविषा
रोटी और नींद का समाधान ।
शरद
कोकास
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‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शुक्रवार, सितंबर 21, 2012
1989 की कवितायें - धुएँ के खिलाफ
एक कवि को कोई हक़ नहीं कि वह भविष्यवाणी करे , लेकिन कवि पर तो क्रांति का भूत सवार है , वह दुर्दम्य आशावादी है , उसे लगता है कि स्थितियाँ लगातार बिगड़ती जायेंगी और फिर एक न एक दिन सब ठीक हो जायेगा । देखिये इस कवि ने भी 23 साल पहले ऐसा ही कुछ सोचा था ...
58 धुएँ के खिलाफ
अगली शताब्दि की हरकतों से
पैदा होने वाली नाजायज़ घुटन में
सपने बाहर निकल आयेंगे
परम्परिक फ्रेम तोड़कर
कुचली दातून के साथ
उगली जायेंगी बातें
मानव का स्थान लेने वाले
यंत्र मानवों की
सुपर कम्प्यूटरों की
विज्ञान के नये मॉडलों
ग्रहों पर प्लॉट खरीदने की
ध्वनि से चलने वाले खिलौनों की
मस्तिष्क के खाली हिस्से में
अतिक्रमण कर देगा
आधुनिकता का दैत्य
नई तकनीक की मशीन पर
हल्दी का स्वास्तिक बनाकर
नारियल फोड़ा जायेगा
ऊँची ऊँची इमारतों से
नीचे झाँकने के मोह में
हाथ –पाँव तुड़वा कर
विपन्नता पड़ी रहेगी
किसी झोपड़पट्टी में
राहत कार्य का प्लास्टर लगाये
कहीं कोई मासूम
पेट से घुटने लगा
नींद में हिचकियाँ ले रहा होगा
टूटे खिलौनों पर शेष होगा
ताज़े आँसुओं का गीलापन
मिट्टी के तेल की ढिबरी से उठता धुआँ
चिमनियों के धुयें के खिलाफ
सघन होने की राह देखेगा ।
शरद
कोकास
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1989 की कवितायें,
शरद कोकास,
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modernism,
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‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
गुरुवार, सितंबर 20, 2012
1989 की कवितायें - सितारे
1989 की एक और कविता जिसके लिये आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा था कि यह कविता मध्यवर्ग की मानसिकता के नये अर्थ खोलती है । इसमें प्रस्तुत सितारों का बिम्ब और भी जाने किस किस की मानसिकता को प्रकट करता है , आप इसमें नये अर्थ ढूंढ सकते हैं , क्या यह आज भी प्रासंगिक नहीं है ?
57 सितारे
अन्धेरी रातों में
दिशा ज्ञान के लिये
सितारों का मोहताज़ होना
अब ज़रूरी नहीं
चमकते सितारे
रोशनी का भ्रम लिये
सत्ता के आलोक में टिमटिमाते
एक दूसरे का सहारा लेकर
अपने अपने स्थान पर
संतुलन बनाने के फेर में हैं
हर सितारा
अपने ही प्रकाश से
आलोकित होने का दम्भ लिये
उनकी मुठ्ठी में बन्द
सूरज की उपस्थिति से बेखबर है ।
शीर्षक
1989 की कवितायें,
राजनीति,
शरद कोकास,
सत्ता संतुलन,
सितारे,
sharad kokas
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
सोमवार, सितंबर 10, 2012
1989 की कवितायें - बाढ़
यह बहुत पहले की बात है , दुर्ग के पास शिवनाथ नदी में बाढ़ आई हुई थी , कई गाँव डूब गये थे । कई लोग पर्यटकों की तरह बाढ़ देखने पहुँचे थे । वहीं एक फोटोग्राफर भी था जो अलग अलग एंगल से बाढ़ के दृश्यों को कैमरे में उतार रहा था , उसी की एक बात ने इस कविता के लिये यह विचार दिया । यह कविता जनवाद और कलावाद के अंतर को भी स्पष्ट करती है । समीक्षक तो बेचारा व्यर्थ ही इस कविता में आ गया ।
(56) बाढ़
बारिश
अच्छी लगती है
बस फुहारों तक
बादल बून्द और हवायें
कपड़ों का कलफ़ बिगाड़ने का
दुस्साहस न करें
मौसम का कोई टुकड़ा
कीचड़ सने पाँव लेकर
कालीन रौन्दने लगे
तो छत के ऊपर
आसमान में
बादलों के लिये आप
प्रवेश –निषेध का बोर्ड लगा देंगे
आकाश तक छाई
हृदय की घनीभूत पीड़ा को लेकर
कविता लिखने वाले
ख़ाक लिखेंगे कविता
टपकते झोपड़े में
घुटनों तक पानी में बैठकर
आनेवाली बाढ़ में
अलग-थलग रह जायेंगे
सारे के सारे बिम्ब
बच्चे, पेड़ , चिड़िया
सभी अपनी जान बचाने की फिक्र में
कैसे याद आ सकेगी
माटी की सोन्धी गन्ध
लाशों की सड़ान्ध में
फोटोग्राफर
कैमरे की आँख से देखकर
समीक्षक की भाषा में कहता है
पानी एक इंच और बढ़ जाता
तो क्या खूबसूरत दृश्य होता ।
शरद
कोकास
शीर्षक
1989 की कवितायें,
कलावाद,
जनवाद,
flood,
photo,
rain,
sharad kokas
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
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