मंगलवार, अक्टूबर 12, 2010

नवरात्र कविता उत्सव - पाँचवा दिन - मैथिली कवयित्री शेफालिका वर्मा



12 अक्तूबर 2010
            कल प्रस्तुत ज्योती लांजेवार की मराठी कविता पर अनेक सुधि पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई । इन प्रतिक्रियाओं से एक एक पंक्ति उद्धृत  कर रहा हूँ । इन्हे अवश्य पढ़िये । देवेन्द्र पाण्डेय - वेदना की गन्ध को एक क्षण बसा लेने की आकांक्षा अधुत अहसास कराती है । पद्म सिंह - बहुत अच्छी तरह उकेरे गये भाव । ललित शर्मा - बेहतरीन रचना और अनुवाद । इस्मत ज़ैदी - कोमल भावों की व्याख्या करती सुन्दर रचना ।  संगीता स्वरूप ,एस एम मासूम -स्नेहिल स्पर्श के महत्व को बताती सुन्दर रचना । के के यादव- मराठी ने ही सर्वप्रथम दलित साहित्य को ऊँचाइयाँ दीं । डॉ.मोनिका शर्मा -प्रभावी और भावपूर्ण रचना । उस्ताद जी -बोझिल । वन्दना -बहुत सुन्दर अनुवाद । सिद्धेश्वर सिंह -एक अच्छी कविता पढ़ने के सुख में हूँ । रंजू भाटिया - अनुवाद बहुत अच्छा किया है आपने । सुशीला पुरी -  प्रेम भी एक तरह का युद्ध है । महेन्द्र वर्मा -  अपने प्रिय से गहन आत्मीयता को अभिव्यक्त करती कविता । पी एन सुब्रमनियन - अनुवाद में मूल भावनाओं को समेटना बहुत कठिन होता है । मनोज कुमार - कविता भाषा शिल्‍प और भंगिमा के स्‍तर पर समय के प्रवाह में मनुष्‍य की नियति को संवेदना के समांतर, दार्शनिक धरातल पर अनुभव करती और तोलती है मुक्ति - दलित कवियत्रियों की कविताओं में एक वेदना तो होती ही है । संजय भास्कर  - मूल भाव अभियव्यक्ति लाजवाब है । शाहिद मिर्ज़ा  - आपके अनुवाद से आया निखार चार चांद लगा रहा है । शिखा वार्ष्णेय - कविता में पवन के माध्यम से वेदना को उकेरना बहुत प्रभावी लगा । ज्योति सिंह -पवन के मध्यम से गहरी बात कही गई है ।  वाणी गीत - सदियों से हाशिये पर रहे लोगों के लिए प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं हो सकता आकांक्षा - सुन्दर कविता. और सार्थक अनुवाद रश्मि रविजा - किसी भी वेदना को स्नेहिल स्पर्श की आकांक्षा जरूर होती है डॉ. टी एस दराल - अनुवाद में किये गए शब्दों के प्रयोग दिलचस्प हैं  समीर लाल - प्रेम की वेदना...अनुवाद में भी वही प्रवाह...और भावों की महक ! कैलाश - मराठी की दलित प्रेम कविता को प्रस्तुत करने के लिए आपका शुक्रियाराजेश उत्साही - अनुवाद और सहज और सरल हो सकता थाडॉ. रूपचन्द शास्त्री - शब्दों के मोतियों को टाँकने मे आपने कमाल किया है । रचना दीक्षित - सचमुच खूबसूरत कविता । zeal - परिचय करवाने का आभार और बेहतरीन अनुवाद के लिए आपको बधाई राज भाटिया - बहुत अच्छी कविता जी । रावेन्द्रकुमार रवि - उपस्थित श्रीमानउत्तम राव क्षीर सागर - अंति‍म पद की पहली पंक्‍ति‍ खटकती है मेरे हि‍साब से यह 'अपने भीतर बसा लेना उसे' होती शोभना चौरे - मराठी से हिंदी अनुवाद सुन्दर है | वन्दना अवस्थी दुबे -कितनी मासूम इच्छा है!!! बहुत सुन्दर । इसके  अलावा फेसबुक पर भी तीन मित्रों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई , तीनों कवि मित्रों के नाम ' अ ' से हैं -अंशुमाली रस्तोगी , अमिताभ श्रीवास्तव और अनुपम ओझाआप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद । 
           नवरात्र के पाँचवे दिन प्रस्तुत है मैथिली कवयित्री शेफालिका वर्मा की कविता । शेफालिका वर्मा का जन्म 1943 में हुआ । आप अनेक पुरस्कारों से सम्मानित है । प्रस्तुत है जीवन की सार्थकता पर सवाल करती हुई उनकी यह कविता । इसमें प्रेम भी है और जीवन दर्शन भी । प्रकृति के बिम्बों का भी बेहतरीन प्रयोग है । मूल मैथिली कविता का हिन्दी अनुवाद स्वयं कवयित्री ने किया है । प्रस्तुत कविता “ समकालीन भारतीय साहित्य “ के अंक 128 से साभार ।  

सार्थकता

तुमसे अलग हो आज यह अनुभूति हुई
साँस लेना ही ज़िन्दगी नहीं
किन्तु
जीवन की सार्थकता बनाना
महती उद्देश्य होना चाहिये
सार्थक ?
कैसे बनाऊँ प्रश्न छटपटाता रहा
बेचैन सा
पछवा पुरवा में लहराते पेड़ों की
शाखा से पत्तों की
लयात्मक गति से झर झर गिरने से
बेला गुलाब की सुरभि से
तुम्हारा संदेशा आ रहा था

सार्थकता उद्देश्य नहीं
जीवन की प्रक्रिया है
अपनों का साथ
एक दूसरे के सुख दुख में साँस लेना
एक – दूसरे के आँसू पोंछने में ही जीने की
सार्थकता है
अपने लिए तो सभी जीते हैं
पर तुम जिओ

उस सूरज की तरह
जो कभी अस्त नहीं होता
धरती के इस छोर से उस छोर तक
परिक्रमा करता रहता है
सबों को रोशनी बाँटता है

सबों को चैन देने में
उसका जीवन
सार्थक हो जाता है
बादल लगते हैं
कुहासा उसे ओट कर देता है
किंतु
वह कभी डगमगाता नहीं
अपने कर्तव्य में
अपने को सार्थक करने में
सबों के जीवन को
वह अडिग अटल है
प्रतिपल प्रतिक्षण ।

-       शेफालिका वर्मा 

जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दी की प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल 
( चित्र व परिचय गूगल से साभार )

सोमवार, अक्टूबर 11, 2010

दलित कविता में प्रेमी आंदोलन के कार्यकर्ता होते हैं


11 अक्तूबर – नवरात्र कविता उत्सव –चौथा दिन – मराठी कवयित्री ज्योती लांजेवार


कल प्रस्तुत असमिया कवयित्री निर्मला प्रभा बोरदोलोई की कविता के पाठकों के रूप में फिर कुछ नये लोगों का आगमन हुआ । हम उन सभी का स्वागत करते हैं । डॉ.नूतन नीति ने कहा इच्छा अंतस मन बेहद अच्छी लगी । शाहिद मिर्ज़ा ने कहा कि दोनों कवितायें मर्मस्पर्शी हैं । डॉ. रूपचन्द शास्त्री मयंक एवं उपेन्द्र जी ने मूल कविता का भाव हूबहू कविता में उतारने के लिए  अनुवादक  सिद्धेश्वर जी की प्रशंसा की । संगीता स्वरूप ने इन्हे अतीत से जुड़ती भविष्य की कविता निरूपित किया । देवेन्द्र पाण्डेय ,राज भाटिया , काजल कुमार और कुसुम कुसुमेश जी को कवितायें अच्छी लगीं । राजेश उत्साही ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में कहा कि ब्लॉग में अच्छे पाठक कैसे तैयार हों इस दिशा में सोचना ज़रूरी है । महेन्द्र वर्मा ने कहा कि सिद्धेश्वर जी ठीक कहते हैं अच्छी कविता ठहराव चाहती है । दिगम्बर नासवा ने इन्हे कम शब्दों में गहरी वेदना व्यक्त करने वाली कवितायें कहा ।वन्दना जी ने इन्हे स्त्री मन की अंतर्वेदना व्यक्त करने वाली कवितायें कहा और इस पोस्ट को चर्चा मंच में शमिल करने की सूचना दी । वन्दना अवस्थी दुबे ने कविताओं के परिप्रेक्ष्य में कहा कि ऐसा हमारे पास क्या है जिसे हम यादों के रूप में सहेज जायें ।डॉ. टी एस.दराल ने दुख को मर्मस्पर्शी तथा इच्छा को सचेत करती प्रेरणात्मक रचना बताया ।डॉ. मोनिका शर्मा , उस्ताद जी और  ZEAL को यह कवितायें अच्छी लगीं ।प्रज्ञा पाण्डेय ने इसे मन को मथने वाली कविता कहा और सुशीला पुरी ने कहा कि कवयित्री की इच्छा समूचे विश्व से जोड़ती है ।बहुत दिनो बाद पधारी आशा जोगलेकर ने कहा सिद्धेश्वर जी ने कविता की आत्मा अक्षुण्ण रखी है। रावेन्द्र कुमार संजय भास्कर व अजय कुमार ने भी अपनी उप्स्थिति दर्ज कराई ।
आप सभी पाठकों को अपनी और सिद्धेश्वर जी की ओर से धन्यवाद देते हुए आज 11 अक्तूबर नवरात्र के चौथे दिन प्रस्तुत है मराठी कवयित्री ज्योती लांजेवार की यह दलित प्रेम कविता । इसे मैंने मराठी के प्रसिद्ध दलित कवि शरण कुमार लिंबाळे द्वारा सम्पादित कविता संग्रह “ दलित प्रेम कविता “ से लिया है । शरण कुमार कहते हैं कि मूल मराठी प्रेम कविता प्रिय के वर्णन ,स्मृति ,विरह व आत्मिक प्रेम के बिम्बों से भरपूर है लेकिन दलित प्रेम कविता में प्रेम तो है ही साथ ही इसमें सामाजिक विषमता के साथ साथ प्रेमी व प्रेमिका का जीवन संघर्ष तथा जाति के आधार पर सदियों से उपेक्षित उनकी वेदना भी उपस्थित है । इसीलिये इस कविता में प्रेमी बागीचे में , या समुद्र के किनारे या एक दूजे की बाहों में दिखाई देने की अपेक्षा आन्दोलन व संघर्ष के कार्यकर्ता के रूप में दिखाई देते हैं । प्रेम में बहाए जाने वाले आँसुओं और आहों के लिये इस कविता में कोई जगह नहीं है । इस कविता में स्त्री की वेदना भी व्यक्तिगत वेदना नहीं वह पूरे दलित समाज , और स्त्री समाज की वेदना है ।
इस कविता के आस्वाद के लिए दलित आंदोलन के बारे में जानना ज़रूरी तो नहीं है लेकिन यह कविता इस बात के लिए प्रेरित करती है कि हम उत्पीड़ितों का इतिहास भी जाने शायद तभी हम रोम के गुलाम स्पार्टकस और वेरोनिया के प्रेम को समझ पायेंगे और पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविताओं के अर्थ ग्रहण कर सकेंगे । 
इस मूल मराठी कविता का हिन्दी अनुवाद किया है शरद कोकास ने ।

वेदना का प्रेम

          मेरे असीम प्रेम का परिचय देने वाला
          यह निर्बन्ध नटखट पवन
          मुझसे कुछ कहे बगैर
          यदि तुम्हारी खिड़की तक आया
          उसे भेज देना सीधे
          उफनते सागर की ओर
         मुझे पता है यह पवन
          हर फूल से चुगली करने वाला
         सुखलोलुप सिरफिरा और भ्रमित है

           मगर यहीं कहीं
          मेरी वेदना की गंध लिए
          अगर आती है कोई व्यथित दृष्टि
          तुम्हारी ओर
           तो उसे मत भेज देना
          केतकी के सुगन्धित वन में

          भीतर बसा लेना उसे
          एक क्षण के लिये ही सही
          उसे ज़रूरत होगी
          तुम्हारे समूचे अस्तित्व के स्नेहल स्पर्श की ।

-       ज्योती लांजेवार

मैंने पहली बार अपने किसी अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत किया है सो आप की प्रतिक्रिया इस पर भी चाहूँगा । आप सभी से अनुरोध है कि कल पुन: इस ब्लॉग पर पधारें और आज की अपनी टिप्पणियों के सार संक्षेप के साथ एक और भारतीय भाषा की कवयित्री की कविता का आनन्द लें । - शरद कोकास 

रविवार, अक्टूबर 10, 2010

नवरात्र कविता उत्सव - तीसरा दिन - असमिया कवयित्री निर्मल प्रभा बोरदोलोई

कल प्रकाशित वरिगोंड सत्य सुरेखा की तेलुगु कविता पर बहुत सारी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं ।प्रवीण त्रिवेदी ने कहा सच है इन प्रश्नों के जवाब नहीं ही मिलने वाले  मनोज कुमार ने कहा हँसी हँसी में गहरी बात कह दी गई है ।रावेन्द्र कुमार रवि ने कहा कि यह महसूस करने की बात है कि प्रश्नकर्ता और उत्तर न देने वाले की हँसी में क्या अंतर है ।इस्मत ज़ैदी ने कविता में प्रश्नों के उत्तर ढूँढने के इस प्रयास को सराहनीय बताया निशांत ने कहा चलानो वालो से बड़े उनसे भी बड़े चलाने वाले । एस एम मासूम, पारुल ,अजय कुमार ,देवेन्द्र पाण्डेय ,राज भाटिया ,ज्योति सिंह ,पूनम श्रीवास्तव,दीपक बाबा को यह कविता पसंद आई । संगीता स्वरूप ने कहा कि कवयित्री ने मन की वेदना कह दी है । वन्दना ने इसे सार्थक अभिव्यक्ति कहा और शाहिद मिर्ज़ा ने कहा कि सवाल जवाब का यह सिलसिला कभी नही थमेगा । शोभना चौरे ने कहा इस पीड़ा को अंतर्मन से समझने की कोशिश रही हूँ ।रश्मि रविजा ने कहा कि जवाब किसीके पास नहीं है इसलिये लोग सवालों पर हँस पड़ते हैं । सुशीला पुरी ने कहा कि विवशता में भी हँसकर खुद को बहलाया जा सकता है ।वाणी गीत ने कहा कि सवाल का जवाब भी अगर सवाल है तो हँसने के सिवा क्या किया जा सकता है ।महेन्द्र वर्मा ने चांद और डर के अनूठे बिम्ब का ज़िक्र किया । समीर लाल ने कहा कि पीड़ा का चरम भी अक्सर हँसी में तब्दील होते देखा है । राहुल सिंह ने कहा जग ह कहत भगत बहिया ,भगत ह कहत जगत बहिया .। एक ब्लॉगर की टिप्पणी बहुत दिनों बाद मिली ..कोपल कोकास ने कहा हँसने वालों को देखकर हँसी रोकना मुश्किल है तो हँसना ही बेहतर है । उत्तम राव क्षीरसागर ने इसे अपने उद्देशय में सफल कविता बताया । गत वर्ष 19 सितम्बर2009 से 27 सितम्बर 2009 तक के शारदीय नवरात्र कविता उत्सव में शामिल श्री पी सी गोदियाल , दिनेश राय द्विवेदी , निर्मला कपिला अशोक कुमार पाण्डेय,मिथिलेश दुबे, मीनू खरे, विनोद कुमार पाण्डेय , समयचक्र, हेमंत कुमार ,टी एस दराल,भूतनाथ, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, विनीता यशस्वी , मिता दास ,लावण्या शाह ,पंकज नारायण और कुलवंत हैप्पी को भी मैं याद कर रहा हूँ ।    
अब एक अनुवादक की बात - इस कविता और कविता उत्सव के इस प्रयास पर इस आयोजन में मेरे सहयोगी कवि अनुवादक और ब्लॉगर सिद्धेश्वर सिंह ने कहा अलग भाषाओं  - से साक्षात्कार एक दूसरी दुनिया खोलने वाला होता है । आप नवरात्रि के बहाने यह काम बहुत बढ़िया तरीके से कर रहे हैं। बधाई मेरे भाई । आपका यह काम मुझे तीन और वजहों से महत्वपूर्ण लगता है :
०१- कविता के स्त्री स्वर का आदर , मान और प्रस्तुतीकरण; अपनी इस विपुला पृथ्वी की आधी आबादी की रचनाशीलता का प्रतिदर्श ।
०२- अनुवाद कर्म का मान; नहीं तो हालत यह है कि आज की हिन्दी के साहित्यिक संसार में अनुवादक को तो बस दूसरे प्राणी मानकर चलने का चलन-सा हो गया लगता है।

०३- हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया में कविता के पाठक की रुचि का परिष्कार; मुझे हमेशा लगता है कि (हिन्दी)ब्लॉग की लेखकीय / पाठकीय दुनिया वह नहीं है जो छपे हुए शब्दों के संसार में है। यह एक 'दूसरी दुनिया' है। मुझे अक्सर यहाँ यह भी लगता है कि तात्कालिकता , त्वरितता और पारस्परिक प्रशंसा -प्रसंग के दबाव ( सुविधा भी! ) के कारण एक हड़बड़ी - सी है और जहाँ तक मेरी समझ है कि अच्छी कविता ठहराव की माँग करती है - रुककर / मुड़कर बार - बार देखे - निरखे -परखे जाने की। आप अपनी इस महत्वपूर्ण योजना से एक बड़ा काम कर रहे हैं। यह क्रम जारी रहे ताकि व्यक्तिगत रूप से अपन पढ़ने के संस्कार का परिष्कार करते रहें। और हाँ, इस महत्वपूर्ण योजना में आपने मुझको एक सहयोगी मित्र की तरह साथ चलने का जो सुअवसर प्रदान किया है उसके लिए शुक्रिया दिल से ।
आइये आज पढ़ते हैं असमिया कवयित्री निर्मल प्रभा बोरदोलोई की दो कवितायें जिनका अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह ने किया है  
०१- दु:ख


शरद ऋतु में
खेतों से उठने वाली गंध
जैसे तैसे चलकर
जब पहुँचती है नथुनों तक
तो पा लेती हूँ मैं अपने पिता को।

जब भी अनुभव करती हूँ
किसी दुकान से लाए गए
टटके तह खुले 'गामोशा' की गमक
तो जैसे  वापस मिल जाती है माँ।

कहाँ रख जाऊँगी मैं
स्वयं को
ओह कहाँ ?
अपने बच्चों के लिए ?

०२- इच्छा

अपने अंतस में बचाए रक्खो
जंगल का एक अंश
ताकि मिल सके
जुड़ाने भर को तुम्हें थोड़ी - सी छाँह।

अपने अंतस में बचाए रक्खो
मुट्ठी भर आकाश
ताकि पाखियों के एक जोड़े को
मिल सके उड़ान भरने के लिए एकांत ।

कवयित्री का परिचय : असम साहित्य सभा की अध्यक्ष रह चुकीं निर्मल प्रभा बोरदोलोई (1933 - 2003) ने नौ बरस की कच्ची उम्र से कवितायें लिखना आरंभ कर दिया था और आजीवन लिखती रहीं। उनके खाते में पचास से अधिक किताबें है जिनमें नौ कविता संग्रह हैं। 1983 का  प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी पाँचवें कविता संग्रह  'सुदीर्घ दिन आरु रितु' के लिए ही मिला। विदेश की कई साहित्यिक यात्राओं में उन्होंने भारत का  प्रतिनिधित्व किया है। उनके गीतों को असमिया के कई नामचीन गायकों ने वाणी दी है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि वह कविता केवल लिखने के लिए नहीं लिखतीं वरन अपनी जड़ों की तलाश और दिक्काल की सीमाओं से परे उदात्त मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा को बनाये - बचाये रखना उनका 'कविता धर्म' है और यह भी कि जीवन से बड़ी कोई कविता नहीं होती क्योंकि जीवन अपने आप में एक असमाप्त कविता है।
कविता के साथ साथ हम सिद्धेश्वर सिंह के कथन पर भी चर्चा क्यों न करें ?  

शनिवार, अक्टूबर 09, 2010

हमे चलाने वाले को चलाने वाला कौन है ?

                         

     9
अक्तूबर 2010 नवरात्र - दूसरा दिन - वरिगोंड सत्य सुरेखा
            इस नवरात्र में इस कविता उत्सव में बहुत सारे नये लोगों का आगमन हुआ है । मैं आप सभी का स्वागत करता हूं । कल प्रकाशित पद्मा सचदेव की कविता के बारे में गिरीश पंकज कहते हैं स्त्री लेखन की सही दिशा क्या हो सकती है , यह कविता तय करती है । रूपचन्द शास्त्री ने कहा यह परिवेश का सुन्दर चित्रण करती है । संगीता ने कहा पद्मा जी के बारे में जानना ,उन्हे पढ़ना सुखद अनुभूति है । रश्मि रविजा ने कहा पद्मा जी की रचना बहुत दिनों बाद पढी । सुशीला पुरी ने कहा यह कविता कई सवाल खड़े करती है । सागर ने इसे आज के संदर्भ में अच्छी कविता बताया । रन्जू भाटिया ने कहा पद्मा जी को पढ़ना अच्छा लगा । शिखा वार्ष्णेय ने कहा इस कविता की एक एक पन्क्ति छू जाती है । शोभना चौरे ने कहा पद्माजी उनकी पसन्दीदा कवयित्री हैं ।ताऊ रामपुरिया ने कहा कि इस कविता में पद्मा जी की खासियत के अनुरूप एक एक शब्द है । टी एस दराल ने पद्मा जी से इस शृंखला के श्रीगणेश को बेहतर बताया । महेन्द्र वर्मा ने पद्मा जी के धर्मयुग में प्रकाशन के दिनों की बात की । जे पी तिवारी , मनोज ,बबली ,कविता रावत ,सुज्ञ , अली ,राज भाटिया , देवेन्द्र पाण्डे , संजीव तिवारी ,वाणी गीत ,संजय भास्कर को यह कविता पसन्द आई । परमजीत सिंह बाली , अलबेला खत्री व मोनिका शर्मा को ने इसे अच्छी प्रस्तुति बताया ।  
            आज नवरात्र के दूसरे दिन प्रस्तुत है तेलुगु की युवा कवयित्री वरिगोंड सत्य सुरेखा की यह कविता । इनकी कवितायें विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं । वर्तमान में वारंगल में रहती हैं । इस कविता का तेलुगु से हिन्दी अनुवाद चेन्नै की कवयित्री आर शांता सुन्दरी ने किया है जो वर्तमान में दिल्ली में रहती हैं । लीजिये प्रस्तुत है  वरिगोंड सत्य सुरेखा की यह सरल सी कविता जो दिखने में बहुत सरल है लेकिन समझने में बहुत कठिन है । वे बहुत मासूमियत से कुछ ऐसे सवाल करती हैं जिनके जवाब आज तक नहीं मिले हैं । जवाब में सिर्फ़ हंसी है । सही है , इन सवालों के जवाब में तो अच्छे अच्छे हँसना भूल जायेंगे ।
            यह कविता  “ समकालीन भारतीय साहित्य “ के अंक 101 से साभार ।


मैं भी हँसूँ

देख कर मुझे हँसते हैं सभी
उन्हे देख डर लगता है
हँसते हैं इसलिये नहीं
पर यह सोच कर
कि हँसने वाले मेरी पीड़ा पहचानते नहीं !

चाँद अंधेरे में रहता है
डर नहीं लगता उसे ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

रात भर अकेला रहता है
उस का साथी क्या कोई नहीं ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

सदा आग उगलते सूरज को
ठंडक कहाँ से मिल पाती है ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

बिना रुके बहने वाले झरने की
थकान कौन मिटाता है ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

हम धरती माँ की गोद में बैठते हैं
पर वह माँ कहाँ बैठती है ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

घूमते पहिये पर न चल सकने वाले हम
घूमती धरती पर कैसे दौड़ रहे हैं ?
पूछूँ तो सब हँसते हैं ।

हमे चलाने वाले को
चलाने वाला कौन है ?
पूछूँ
तो ज़ोर ज़ोर से हँसते हैं
एक भी सवाल का जवाब न दे कर
हँसने वालों को देख कर
मैं क्या करूँ ?
बस , मैं भी हँस देती हूँ !

-       वरिगोंड सत्य सुरेखा



शुक्रवार, अक्टूबर 08, 2010

नवरात्र कविता उत्सव - प्रथम दिवस - पद्मा सचदेव


आज नवरात्रि के प्रथम दिन आप सभी का स्वागत है ।  आज प्रस्तुत है डोगरी की सुप्रसिद्ध कवयित्री पद्मा सचदेव की यह कविता । पदमा जी का जन्म अप्रेल 1940 को जम्मू में हुआ । आपकी डोगरी व हिन्दी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनमें कविता , साक्षात्कार , कथा साहित्य और संस्मरण की पुस्तकें है । इनमें बूँद बावड़ी , अमराई , भटको नहीं धनंजय , नौशीन , गोद भरी , अक्खरकुंड, तवी ते चन्हान ,नेहरियाँ गलियाँ , पोता पोता निम्बल आदि उल्लेखनीय हैं । पद्मा सचदेव साहित्य अकादेमी , हिन्दी अकादेमी , जम्मू कश्मीर कल्चरल अकादेमी , सोवियत लैन्ड नेहरू पुरस्कार ,उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार , राजा राम मोहन राय पुरस्कार आदि पुरस्कारों से सम्मानित हैं । आपने जम्मू में रेडियो पर स्टाफ़ कलाकार के रूप में भी कार्य किया और दिल्ली मे डोगरी समाचार वाचक के पद पर भी कार्य किया ।  
            इस कविता में जम्मू एक शहर की तरह नहीं बल्कि घर के एक सदस्य की तरह है । इस कविता में निहित अनेक अर्थों को आप तलाश सकते हैं । यह कविता साहित्य अकादेमी की द्वैमासिक पत्रिका “ समकालीन भारतीय साहित्य “ के अंक 104 से साभार । इस कविता का डोगरी से हिन्दी अनुवाद कवयित्री ने स्वयं किया है  


सच्च बताना साईं

सच्चो सच्च बताना साईं
आगे आगे क्या होना है

खेत को बीजूँ न बीजूँ
पालूँ या न पालूँ रीझें
धनिया पुदीना बोऊँ न बोऊँ
अफ़ीम ज़रा सी खाऊँ न खाऊँ
बेटियों को ससुराल से बुलाऊँ
कब ठाकुर सीमाएँ पूरे
तुम पर मैं कुर्बान जाऊँ
आगे आगे क्या होना है ।

दरिया खड़े न हों परमेश्वर
बच्चे कहीं बेकार न बैठें
ये तेरा ये मेरा बच्चा
दोनों आँखों के ये तारे
अपने ही हैं बच्चे सारे
भरे रहें सब जग के द्वारे
भरा हुआ कोना कोना है
आगे आगे क्या होना है ।

बहें बाज़ार बहें ये गलियाँ
घर बाहर में महके कलियाँ
तेरे मेरे आँगन महके
 बेटे धीया घर में चहकें
बम गोली बंदूक उतारो
इन की आँखों में न मारो
ख़ुशबुओं में राख उड़े न
आगे आगे क्या होना है

जम्मू आँखों में है रहता
यहाँ जाग कर यहीं है सोता
मैं सौदाई गली गली में
मन की तरह घिरी रहती हूँ
क्या कुछ होगा शहर मेरे का
क्या मंशा है क़हर तेरे का
अब न खेलो आँख मिचौली
आगे आगे क्या होना है

दरगाह खुली , खुले हैं मन्दिर
ह्रदय खुले हैं बाहर भीतर
शिवालिक पर पुखराज है बैठा
माथे पर इक ताज है बैठा
सब को आश्रय दिया है इसने
ईर्ष्या कभी न की है इसने
प्यार बीज कर समता बोई
आगे आगे क्या होना है
-       पद्मा सचदेव
   

गुरुवार, अक्टूबर 07, 2010

नवरात्र कविता उत्सव में आपका स्वागत है



शरद नवरात्र में प्रतिदिन एक कवयित्री की कविता

कल आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शरद नवरात्र प्रारम्भ होने जा रहा है । वर्ष में दो बार आने वाले इस पर्व पर मैं विगत दो नवरात्र से कवयित्रियों की कविताएं प्रस्तुत करता आ रहा हूँ । इस श्रन्खला में सर्वप्रथम मैंने हिन्दी की कवयित्रियों की कविताएँ प्रस्तुत की थीं । उसके अगले नवरात्र में विदेशी कवयित्रियों की कविताओं के हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किये थे । आप सब ने इन कविताओं को पढ़ा था एवं इनकी सराहना की थी और भरपूर टिप्पणियों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी । 
            आप सभी के स्नेह एवं प्रोत्साहन के फलस्वरूप इस नवरात्र में भी मै यह श्रन्खला जारी रखना चाहता हूँ । इस बार इस श्रन्खला में आप पढ़ेंगे भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों की कवितायें । इनमें मैंने सिंधी , मराठी , असमिया , पंजाबी , तेलगु , मलयाळम , मैथिली , डोगरी व उर्दू की कविताएँ शामिल की हैं । कविताओं के हिन्दी अनुवाद  कुछ कवयित्रियों द्वारा स्वयं  किये गए हैं और कुछ अनुवादकों द्वारा ।
            इनमें से अधिकांश कवयित्रियों की कविताओं का चयन मैंने साहित्य अकादमी की द्वैमासिक पत्रिका “ समकालीन भारतीय साहित्य “ से किया है । समकालीन भारतीय साहित्य के सम्पादक प्रसिद्ध आलोचक व लेखक श्री प्रभाकर श्रोत्रिय से मेरा संवाद हुआ है । श्रोत्रिय जी ने सहर्ष इन कविताओं को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने हेतु अनुमति प्रदान कर दी है । मेरे सहयोगी मित्र व कवि अनुवादक तथा ब्लॉगर सिद्धेश्वर जी से भी मेरा संवाद हुआ है । उन्होनें भी हमेशा की तरह इस श्रंखला में प्रस्तुत करने के लिए कुछ कविताओं के अनुवाद किये हैं ।
            आज इस पोस्ट द्वारा मैं आप सभी से निवेदन कर रहा हूँ कल से प्रतिदिन एक विशिष्ट कविता पढ़ने के लिए इस ब्लॉग पर दिन में एक बार अवश्य पधारें । प्रत्येक कविता की प्रस्तुति से पूर्व परम्परानुसार विगत दिन के आगंतुकों का स्वागत होगा ही ।
            आज स्वागत एव धन्यवाद समकालीन भारतीय साहित्य के सम्पादक वरिष्ठ साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय जी का  । डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का जन्म १९ दिसंबर, १९३८ को जावरा (मध्यप्रदेशभारत में हुआ। हिंदी आलोचना में प्रभाकर श्रोत्रिय एक महत्वपूर्ण नाम है । आलोचना के अलावा भी साहित्य में उनका प्रमुख योगदान रहा है । खास कर नाटकों व निबंध के क्षेत्र में । उन्होंने कम नाटक लिखे पर जो भी लिखे उसने हिंदी नाटकों को नई दिशा दी। पूर्व में मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के सचिव एवं 'साक्षात्कार' 'अक्षरा' के संपादक रहे हैं एवं भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं 'वागर्थ' के संपादक पद पर कार्य करने के साथ-साथ वे भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली के निदेशक पद पर भी कार्य कर चुके हैं ।  आप अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों के सदस्य हैं।

( प्रभाकर श्रोत्रिय जी का चित्र गूगल से साभार )