सोमवार, मार्च 22, 2010

वे नहीं सूंघ सकतीं बेकरी की डबलरोटी



नवरात्रि पर्व : सातवाँ दिन
अब तक जिनकी कवितायें आपने पढ़ीं : फातिमा नावूत , विस्वावा शिम्बोर्स्का, अन्ना अख़्मातोवा .गाब्रीएला मिस्त्राल ,अज़रा अब्बास , और दून्या मिख़ाइल कवितायें पढ़ीं ।
अब तक जिन्होने अपनी उपस्थिति दर्ज की: लवली कुमारी ,हरि शर्मा ,पारुल ,राज भाटिया , सुमन , डॉ.टी.एस.दराल , हर्षिता, प्रज्ञा पाण्डेय ,मयंक , हरकीरत “हीर” , के.के.यादव , खुशदीप सहगल , संजय भास्कर ,जे. के. अवधिया , अरविन्द मिश्रा , गिरीश पंकज ., सुशीला पुरी , शोभना चौरे , रश्मि रविजा , रश्मि प्रभा  , बबली , वाणी गीत , वन्दना , रचना दीक्षित ,सुशील कुमार छौक्कर देवेन्द्र नाथ शर्मा , गिरिजेश राव , समीर लाल , एम.वर्मा ,कुलवंत हैप्पी ,काजल कुमार ,मुनीश ,कृष्ण मुरारी प्रसाद,अपूर्व ,रावेन्द्र कुमार रवि, पंकज उपाध्याय,विनोद कुमार पाण्डेय ,अलबेला खत्री , चन्दन कुमार झा , डॉ.रूपचन्द शास्त्री “ मयंक “,
अब आप पढ़ेंगे : ईरान डेनमार्क मूल की कवयित्री शीमा काल्बासी की कविता जिसका अनुवाद किया है श्री अशोक पाण्डेय ने और इसे मैने साभार ज्ञानरंजन जी की पत्रिका पहल के अंक 87 से लिया है ।
अब शीमा काल्बासी का परिचय भी जान लीजिये :    शीमा काल्बासी चार भाषाओं में लिखती है । उनकी पहली कविता आठ वर्ष की उम्र में छपी थी । डेनिश स्कूल ऑफ नर्सिंग एण्ड रेडियोग्राफी से नर्सिंग का डिप्लोमा ले चुकी शीमा ने U N H C R और C R M के लिये दुभाषिये का काम किया है । साथ ही वे संयुक्त राष्ट्र संघ के अनेक पुनर्वास तथा आपदा प्रबन्धन कार्यक्रमों में शिरकत कर चुकी हैं और अनेक देशों में रह चुकी हैं । फिलहाल वे अपने पति और बच्चों के साथ अमेरिका में रहती हैं । वीमेन इन वार उनकी रचनाओं का ताज़ा संग्रह है । प्रस्तुत है उनकी चर्चित कविता “ अफगानिस्तान की स्त्रियों के लिये “ से यह अंश । कल आपने दून्या मिख़ाइल की युद्ध पर एक कविता पढ़ी थी जिसका स्वर व्यंग्य का था , आज अफगानिस्तान पर अमेरिका के हमले के सन्दर्भ में शीमा की कविता पढ़िये जिसमें कहीं कोई राजनीतिक बयान नहीं है लेकिन स्त्री की स्थिति के बहाने सब कुछ कह दिया गया है । 

अफगानिस्तान की स्त्रियों के लिये

मैं टहल रही हूँ काबुल की गलियों में
रंगी हुई खिड़कियों के पीछे
टूटे हुए दिल और टूटी हुई स्त्रियाँ हैं

जब उनके परिवारों में कोई पुरुष नहीं बचता
रोटी के लिये याचना करतीं वे भूख से मर जाती हैं
एक ज़माने की अध्यापिकायें ,चिकित्सिकायें और प्रोफेसर
आज बन चुकी चलते फिरते मकान भर

चन्द्रमा का स्वाद लिये बगैर
वे साथ लेकर चलती हैं अपने शरीर ,कफ़न सरीखे बुर्कों में
वे कतारों के पीछे धरे पत्थर हैं
उनकी आवाज़ों को उनके सूखे हुए मुंहों से बाहर आने की इज़ाज़त नहीं
तितलियों जैसे उड़ती हुई अफ़गान स्त्रियों के पास लेकिन कोई रंग नहीं
क्योंकि खून सनी सड़क के अलावा वे कुछ नहीं देखतीं

रंगी हुई अपनी खिड़कियों के पीछे से
वे नहीं सूंघ सकतीं बेकरी की डबलरोटी
क्योंकि उनके बेटों की उघड़ी हुई देहें सारी गन्धों को ढँक लेती हैं
और उनके कान कुछ नहीं सुनते
क्योंकि वे सिर्फ उनके भूखे पेट को सुनती हैं
गोलीबारी और आतंक की हर आवाज़ के साथ
अनसुनी कराहों और उनके रूदन के साथ ।
कड़वाहट के साथ चुप करा दी गई शांति एक उपाय है
अफ़गान स्त्री के  जीवन के रक्तपात के लिये ,
बाहर न आती हुई भिंची हुई आवाज़ें टूटती जाती हैं
उनके जीवन के त्रासद अंत में ।

                                    शीमा काल्बासी
    

 

रविवार, मार्च 21, 2010

मेहनतकश जंग लड़कियों को सिखाती है इंतज़ार करना



                                                             नवरात्रि छठवाँ दिन
आपने अब तक इन्हे पढ़ा - प्रथम दिन से लेकर आपने अब तक फातिमा नावूत , विस्वावा शिम्बोर्स्का, अन्ना अख़्मातोवा .गाब्रीएला मिस्त्राल और अज़रा अब्बास की कवितायें पढ़ीं ।
आप सभी अच्छी कविता के प्रशंसक हैं  - कल प्रकाशित अज़रा अब्बास की कविता पर खुशदीप सहगल , संजय भास्कर ,जे. के. अवधिया , अरविन्द मिश्रा , गिरीश पंकज . प्रज्ञा पाण्डेय , सुशीला पुरी , शोभना चौरे , रश्मि रविजा , रश्मि प्रभा  , बबली , वाणी गीत , वन्दना , रचना दीक्षित ,सुशील कुमार छौक्कर देवेन्द्र नाथ शर्मा , गिरिजेश राव , समीर लाल , एम.वर्मा ,कुलवंत हैप्पी ,काजल कुमार ,मुनीश ,कृष्ण मुरारी प्रसाद,अपूर्व ,रावेन्द्र कुमार रवि ,हर्षिता,पंकज उपाध्याय,विनोद कुमार पाण्डेय ,अलबेला खत्री , चन्दन कुमार झा की प्रतिक्रियाएँ  प्राप्त हुई । आप सभी अच्छी कविता के प्रशंसक हैं , आप सभी के प्रति मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ । सबसे अधिक प्रसन्नता मुझे युवा कवि व ब्लॉग अनुनाद के शिरीष कुमार मौर्य के आगमन से हुई उनका मै स्वागत करता हूँ और पिछले दिनों उन्हे प्राप्त लक्षमणप्रसाद मंडलोई सम्मान के लिये इस ब्लॉग के पाठकों की ओर से बधाई देता हूँ । सिद्धेश्वर जी ने फोन पर बताया कि डॉ. रूपचन्द शास्त्री “ मयंक “ भी यह कविता श्रंखला पढ़ रहे हैं , उनके प्रति भी मैं धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ । अशोक कुमार पाण्डेय व्यस्तता के चलते आज मात्र उपस्थिति ही दर्ज कर पाये इसके लिये भी धन्यवाद ।
आप आज पढ़ेंगे - आज प्रस्तुत है अरबी में लिखने वाली कवयित्री दून्या मिख़ाइल की एक महत्वपूर्ण कविताअरविन्द मिश्रा जी ने एक जिज्ञासा रखी थी सो दून्या की कविता पर कवि गीत चतुर्वेदी की यह टिप्पणी प्रस्तुत कर रहा हूँ । इस कविता का अनुवाद भी गीत ने ही किया है और यह मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “ पहल “ के अंक 83 से साभार ली है । गीत चतुर्वेदी कहते हैं “ अरबी में लिखने वाली दून्या मिख़ाइल का व्यंग्य कहता है कि आप शब्दों को , उसी अर्थ में न समझें , उन्हे इस्तेमाल करने के पीछे की सोच भी समझें । जब वह कहती है ‘हमेशा’ तो उसका मतलब पूरी तरह हमेशा नहीं होता , ऐसा तो उसने सिर्फ तुक मिलाने के लिये कहा था । जब वह चुप रहती हो तो उसे पूरी तरह चुप्पी न समझा जाये , हो सकता है उसकी आँखों के रास्ते अभी अभी बगदाद की गलियों में गुजरा उसका बचपन आया हो ।“
गीत चतुर्वेदी कहते हैं “ दून्या के यहाँ महिला होने का सियापा नहीं है । उसमें प्रेमिकाओं की तरह इंतज़ार करने की ताकत है और यह हुनर उसे  “ मेहनतकश  जंग “ ने सिखाया है । अरबी कविता जब से वयस्क हुई है उसमें गोली,धमाके, ख़ून से लथपथ चांद और एक बूढ़े पेड़ की उसांसों से निकलता तूफ़ान बेसाख़्ता आता रहा है ।  ये कवितायें उस कवयित्री ने लिखी हैं जो बहुत हड़बड़ी में थी जिसने अभी कल ही अपना देश खोया है । ये कवितायें उन लोगों को सम्बोधित हैं जो आनेवाले दिनों में अपना देश खो देंगे । क्योंकि वे सब भी बहुत हड़बड़ी में हैं । हम ऐसे समय में हैं जहाँ हर सुबह संज्ञाएँ बदल जाती हैं ,सर्वनाम वही रहते हैं पर क्रियायें बदल जाती हैं ।“
आप भी जानिये कुछ दून्या मिख़ाइल के बारे में   - दून्या की पैदाइश 1965 की है ,उनके चार संग्रह आ चुके हैं 2001 में सन्युक्त राष्ट्र का “ फ्रीडम ऑफ राइटिंग अवार्ड “ मिला है । ईराक से उसे धमकियाँ मिली हैं ,जान बचाने की फिक्र मिली , बग़दाद की गलियों में लाशें चीख पुकार मिली , अंतत: 1996 में वह अपना वतन छोड़कर अमेरिका स्थित मिशिगन में जा बसी । बग़दाद से अंग्रेज़ी मे बी.ए. किया अमेरिका की वेन स्टेट  यूनिवर्सिटी से एम.ए.किया और अब अरबी पढ़ाती हैं । “
प्रस्तुत है युद्ध और युद्ध की विभीषिकाओं को लेकर ,समय के महत्वपूर्ण सवालों से लड़ने वाली दून्या मिख़ाइल की यह कविता इसमें व्यंग्य की धार के साथ आप जंग के नये नये सन्दर्भ देख सकते हैं । हमने युद्ध की स्थितियों को ज़्यादा जिया नहीं है फिर भी हम जानते हैं, युद्ध से क्या क्या होता है भले ही राष्ट्रप्रेम की भावना के चलते बहुत सी बातों को हम अनदेखा करें । दून्या के शब्दों  में कहें तो “ ईराक में मैने युद्ध को जिया है इसलिये मुझे पता है कि युद्ध क्या होता है । “ पढ़िये बिना किसी रूपक या बिम्ब के ,सरल सरल शब्दों में लिखी युद्ध के दूसरे पक्ष पर लिखी  अंत में एक सवाल छोड़ जाने वाली एक अलग तरह की कविता । आप महसूस करेंगे इस कविता की हर पंक्ति मे एक नई कविता का विषय है |


जंग कितनी मेहनतकश है

कितनी अद्भुत होती है जंग
कितनी कर्मठ
कितनी हुनरमन्द

अलस्सुबह उठकर
वह जगाती है सायरन को
एम्बुलेंसों को रवाना करती है सब दूर
हवा में झुलाती है लाशों को
घायलों के आगे फिसलाती है स्ट्रेचर
मांओं की आँखों के लिये बुला लाती है बारिश
कितना खोदती है ज़मीन को
अपने फावड़े से
मलबे के भीतर से निकाल लाती है कितना कुछ
कुछ बेजान चमकती चीज़ें
बाक़ी मुर्दुस , फिर भी धड़कती हुई

यह बच्चों के दिमाग़ में
कई नये सवाल भरती है
आसमान में दाग़ती है मिसाइलें और आग के गोले
और ईश्वर का मनोरंजन करती है

यह खेतों में बोती है बारूदी सुरंग
उगाती है फफोले और मवाद
परिवारों से करती है आग्रह
कहीं और बसने का
और हाकिमों के साथ खड़ी रहती है
जब वे कोस रहे होते हैं शैतान को
( बेचारा शैतान ,उस वक़्त भी उसका एक हाथ
झुलस रहा होता है लपटदार आग में )
जंग दिन-रात करती रहती है अपना काम
बिना थके
यह आततायियों को लम्बे लम्बे भाषण देने को
प्रेरित करती है
सेनाध्यक्षों को देती है तमग़े
और कवियों को एक अदद विषय

यह कृत्रिम अंग बनाने वाले उद्योग को भी
सहारा देती है
मक्खियों और कीड़े- मकोड़ों के लिये जुटाती है भोजन
इतिहास की किताबों में जोड़ती पन्ने
मारे गये और हत्यारे के बीच समानता स्थापित करती है

प्रेमियों को सिखाती पत्र लिखना
लड़कियों को सिखाती है इंतज़ार करना
अख़बारों को देती है ख़बरें-तस्वीरें
अनाथों के लिये बनाती है नए-नए मकान
ताबूत बनाने वालों को व्यस्तता देती है
थपथपाती है क़ब्र खोदने वालों की पीठ
और नेता के चेहरे पर एक मुस्कान रंगती है

कितनी मेहनतकश  होती है जंग
इतनी बेमिसाल है फिर भी
कोई इसे सराहता क्यों नहीं

                        - दून्या मिख़ाइल 

            मित्रों, आज यह सवाल नहीं पूछूंगा कि प्रतिदिन कविता दूँ या न दूँ । कई मित्रों ने फोन पर इस बात के लिये लताड़ा है । आप सभी लोगों के उत्साह को देखते हुए इस विचार के लिये शर्मिन्दा हूँ ..और फिर संकल्प तो संकल्प ही होता है ना , जैसे आपका वैसे मेरा । बहरहाल..नाज़ी फायरिंग स्क्वाड द्वारा जिसे गोली से उड़वा दिया वह ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का , डेनमार्क की शीमा कालबासी और अन्य कवयित्रियों की  कविताओं के साथ अगले दिनों में आपकी प्रतीक्षा रहेगी  – आपका शरद कोकास  
(चित्र गूगल से साभार ) 
 

 




                                                    




शनिवार, मार्च 20, 2010

पाकिस्तान में भी अच्छी कविता होती है ..



                                 नवरात्रि पंचम दिवस । 20.03.2010
अब तक आपने पढ़ा - फातिमा नावूत ,विस्वावा शिम्बोर्स्का और अन्ना अख़्मातोवा की कविता पढ़ने के बाद कल नवरात्रि के चौथे दिन आपने लातीन अमेरिका की कवयित्री गाब्रीएला मिस्त्राल की कविता “अपना हाथ मुझे दो “ पढ़ी ।
कविता के असली कदरदान - इस कविता पर समीर लाल,सुमन ,गिरिजेश राव ,कुलवंत हैप्पी , संजय भास्कर ,वन्दना ,खुशदीप सहगल , रश्मि रविजा ,सुशीला पुरी ,वन्दना अवस्थी दुबे , शिखा वार्ष्णेय ,रचना दीक्षित चन्दन कुमार झा , हिमांशु और बेचैन आत्मा की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई । भाई अशोक कुमार पाण्डेय सम्मेलन में अपनी व्यस्तता के चलते विशेष टिप्पणी नहीं कर पाये । खैर आज की इस कविता के साथ दोनो कविताओं पर उनकी टिप्पणी प्राप्त होगी ऐसी उम्मीद है ।
आज की कविता के बारे में  - आज की कविता का शीर्षक है “ मेज़ पर रखे हाथ “ । इसे लिखा है पाकिस्तान की कवयित्री अज़रा अब्बास ने और इसका उर्दू से अनुवाद किया है सलीम अंसारी ने । “अपना हाथ मुझे दो “ और “ मेज़ पर रखी हाथ “ में जो मूलभूत अंतर है उसकी तलाश आप यहाँ कर सकते हैं । निवेदन यही है कि ज़रा ठहर ठहरकर इन कविताओं को पढ़ें । यह कविता और कवि परिचय मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “ पहल “ से लिया है और ज्ञान जी ने इसका चयन पाकिस्तान के शायर व आलोचक अहमद हमेश की पत्रिका “तशक़ील” से किया है ।
 अज़रा अब्बास कौन हैं – अज़रा अब्बास पाकिस्तान में नई पीढी की कलम कार हैं । अपनी आत्मकथा “ मेरा बचपन “ में उन्होने स्त्री होने के समसामयिक दुखों को झेलते हुए रूढ़ीवादी पाकिस्तानी समाज से कड़ा संघर्ष किया है । 1970 में उनका साहित्यिक सफर प्रारम्भ हुआ और उसी के साथ उनका विद्रोही हिस्सा प्रकट हुआ । अज़रा अब्बास की शैली में एक खुरदुरापन , गति और आक्रामकता है ।
आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए ब्लॉग जगत के पाठकों के लिये प्रस्तुत है ,पाकिस्तान की कवयित्री अज़रा अब्बास की सरल सी लगने वाली  यह कविता जो  “हाथों “ पर लिखी होने के बावज़ूद सिर्फ हाथों पर लिखी कविता नहीं है, इसे ज़रा उनके परिचय के पेशे नज़र देखें ।

मेज़ पर रखे हाथ

मेज़ पर रखे हैं हाथ
हाथों को  मेज़ पर से उठाती हूँ
फिर भी पड़े रहते हैं
मेज़ पर ,
और हँसते हैं
मेज़ पर रखे
अपने ही दो हाथों को
हाथों से उठाना मुश्किल होता है

मैं हाथों को
दाँतों से उठाती हूँ
पर हाथ नहीं उठते
मेज़ पर रह जाते हैं
दाँतों के निशानों से भरे हुए
साफित (स्थिर)  और घूरते हुए
मैं भी हाथों को घूरती हूँ
मेज़ का रंग आँखों में भर जाता है
मैं आँखें बन्द कर लेती हूँ

सो जाती हूँ
मेज़ पर रखे हुए हाथों पर
सर रखकर ।
         
          - अज़रा अब्बास

यह कविता आपको कैसी लगी ? अगले दिनो में प्रस्तुत करूंगा ईरान डेनमार्क मूल की शीबा काल्बासी ,अरबी कवयित्री दून्या मिख़ाइल की कवितायें और कुछ और कवितायें जो सिद्धेश्वर जी अशोक पाण्डेय जी और अ.कुमार पाण्डेय जी उपलब्ध करवायेंगे । बस यही निवेदन है कि अधिक से अधिक लोग यह कवितायें पढ़ें और इस साहित्यिक  चर्चा में भाग लें । यह भी बतायें कि प्रतिदिन एक कविता कहीं मेरी ज़ल्दबाज़ी तो नहीं लग रही ?             
 - आपका - शरद कोकास
 


 


शुक्रवार, मार्च 19, 2010

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे



नवरात्रि चतुर्थ दिवस  गाब्रीएला मिस्त्राल की  कविता
19.03.2010 । नवरात्रि के तीसरे दिन प्रकाशित अन्ना अख़्मातोवा की कविता पर अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी विशेष टिप्पणी में कहा अन्ना आख़्तामोवा की यह कविता एक सघन सांकेतिकता की कविता है। 'लक्ष्मण रेखा के पार चले जाना'जैसे विशुद्ध देसज मुहावरे का इसमे प्रयोग कर अनुवादक ने अपने भाषाई समझ और कौशल का परिचय दिया है। समाज द्वारा तय की गयी सीमाओं से बाहर जाने के बाद क्या होता है एक औरत का? उसका आगे बढ़ते जाना समाज के नियंताओं की नज़र का टेढ़ा होता जानादोनों एक ही समानुपात में घटित होते हैं। बीटिंग रीट्रीट का बजनाअंधेरायह सब मिलकर गहन उदासी का एक बिंब रचते हैंलेकिन उम्मीद कभी नहीं मरतीधुंधले प्रकाश से उड़ता हुआ सारस यह उम्मीद ही तो है जो कवि को इस निराशा के अंधकार से दूर ले जाता है। रजनीकांत जी का अनुवाद कविता को हिन्दी पाठकों के लिये सहज बनाता है ।रंगनाथ सिंह ने इस पर प्रतिटिप्पणी की अशोक जी की टिप्पणी के बाद कुछ कहना अनुचित लग रहा है। उन्होंने बहुत सुंदरता से कविता का अर्थ और महत्व समझाया है ।
संजय भास्कर और चन्दन कुमार झा ने कहा सच में अंधेरे से उजाले की तरफ चलते जाना आसान नहीं होता जबकी अंधेरा अपको जकड़े हुए हो और लक्षमण रेखाऐं खींच दी गयी हो । कविता का अर्थ समझाने के लिये अशोक जी का धन्यवाद । अब कविता और भी अच्छी लग रही है । रचना दीक्षित ने कहा धुन्धले प्रकाश में / सारस का एक जोड़ा उड़ा जा रहा है । ये अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे कविता का सार खुद ब खुद कह रही हैं.वो उम्मीद की किरण नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर, संताप वेदना और कलुषित मानसिकता से बाहर निकल एक खुले आसमां में उड़ान द्योतक है की आगे अब सिर्फ प्रकाश है वो भी श्वेत जो अपने साथ लायेगा सुखद अनुभूतियों का किरण पुंज। वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा ..मतलब स्थितियां आन्ना अख्मातोवा के समय में भी वही थीं जो कमोबेश आज हैं. "पहल" ने हमें बहुत उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध कराया है. जब उसका प्रकाशन बन्द हुआ, उस टीस को आज कुछ राहत मिली. साधुवाद.लावण्या जी ने कहा कविता से अपने मन की पीड़ा, गहन अनुभूति, आशा - निराशा , समाज के कटु सत्य , विवशता सभी चन्द पंक्तियों में लिख गयीं अमिताभ श्रीवास्तव अम्बरीश अम्बुज राज भाटिया और अलबेला खत्री जी को भी यह रचना बहुत अच्छी लगी
                     बेचैन आत्मा ने कहाअशोक जी की व्याख्या अच्छी है. मगर जिस अंश को उन्होंने छोड़     दिया..नमकहराम हूँ नख से शिख तक गिरगिट की तरह रंग बदलती हूँ हूँ ही ऐसी , यह स्वीकारोक्ति बड़ी बात है. यह मन की निर्मलता को बयां करती है. जिसका ह्रदय इतना विशाल हो उसी को दिख सकतीं है ...आशा की किरण  धुंधले प्रकाश में उड़ता सारस का एक जोड़ा । गिरिजेश राव ने कहा कविता और अनुवाद दोनों की परिपक्वता दर्शनीय है। यदि आप ने कवयित्री का नाम नहीं बताया होता तो मैं इसे मुक्तिबोध, केदार या अज्ञेय की रची समझता।.कुछ और बातचीत अशोक जी ने भी की है .. चाहें तो एक बार पुन: पिछली पोस्ट देख लें । धन्यवाद - शरद कोकास


आज नवरात्रि के चौथे दिन प्रस्तुत है लातीन अमेरिकी कवयित्री गाब्रीएला मिस्त्राल की यह कविता जिसका अनुवाद कबाड़खाना ब्लॉग के श्री अशोक पाण्डेय ने किया है ।

अपना हाथ दो मुझे

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
बस एक इकलौता फूल
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
बस एक इकलौता फूल.
साथ नाचते हुए मेरे साथ एक लय में
तुम गीत गाओगे मेरे साथ
हवा में फ़क़त घास
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
हवा में फ़क़त घास.
उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

                       गाब्रीएला मिस्त्राल

 परिचय : गाब्रीएला मिस्त्राल नोबेल पुरुस्कार पाने वाली पहली लातीन अमेरिकी महिला रचनाकार थीं १८८९ में चिली के वीकून्या नामक क़स्बे में जन्मी गाब्रीएला का वास्तविक नाम लूसिला गोदोई ई आलायागा था. वे एक गांव में लड़कियों के एक स्कूल में अध्यापन किया करती थीं.गाब्रीएला की कविता के उत्स उनके पहले असफल प्रेम सम्बन्ध में खोजे जाते हैं अध्यापिका का पेशा अपनाने से पहले उनका सघन प्रेम एक रेलवे कर्मचारी से हुआ. इस रेलवे कर्मचारी ने डिप्रेशन के चलते बाद में आत्महत्या कर ली थी | कविता के कारण जब वे काफ़ी प्रसिद्ध हो गई थीं चिली की सरकार ने उन्हें लीग ऑफ़ नेशन्स में उन्हें अपने देश का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करने का ज़िम्मा सौंपा| बाद के वर्षों में वे अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में स्पानी साहित्य पढ़ाती रहीं| बीसवीं सदी के महानतम कवियों में शुमार पाब्लो नेरूदा को कविता लिखने की ओर प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली गाब्रीएला का देहान्त १९५७ में हुआ |
                   एक निवेदन - कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का ने कहा है " कविता में कुछ भी साधारण नहीं होता ..एक पत्थर , या उस पर ऊगा फूल ..या..और कुछ । " इसलिये कविता में छुपी इन साधारण सी बातों पर भी गौर कीजिये ..आपके विचार सादर आमंत्रित हैं -शरद कोकास 
 

गुरुवार, मार्च 18, 2010

नवरात्रि तृतीय दिवस - अन्ना अख़्मातोवा की कविता

                                             
                        

18.03.2010 । नवरात्रि के दूसरे दिन 17.03.2010 को प्रकाशित विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविता पर सर्वप्रथम अपने विचार व्यक्त किये संजय भास्कर ने । दिनेशराय द्विवेदी ने इसे इस युग का छद्म उद्घाटित करती हुई कविता बताया ।रश्मि रविजा ने कहा सच है...खुद को भी बस उतना ही देखते हैं जितना..दूसरों को दिखाना चाहते हैं.। रंजु भाटिया ने कहा कमाल के एहसास हैं इस रचना में ।चन्दन कुमार झा ने कहा एक छोटा सा बायोडाटा जीवन की कितनी कमजोरियो का पर्दाफाश कर देता है, एक छोटा सा बायोडाटा बताता है कि आदमी ने कितने समझौते किये ज़िन्दगी में । खुशदीप सहगल ने कहा नवरात्र पर शक्ति की देवी की उपासना का इससे अच्छा और रचनात्मक तरीका और कोई हो ही नहीं सकता था । शोभना चौरे , सदा , विजय प्रकाश ,समीर लाल,अमिताभ मीत ,राज भाटिया ,काजल कुमार को यह कविता बहुत पसन्द आई ।
                          अशोक कुमार पाण्डेय  ने कहा शिम्बोर्स्का की सबसे बड़ी खूबी है किसी भी साधारण से विषय को उठाकर उसे एक अत्यंत समृद्ध और अर्थवान कविता में तब्दील कर देने की अद्भुत क्षमता । उनकी एक कविता गणितीय पाई पर है…ख़ैर अगर बात इस कविता की करें तो यह मनुष्य के जीवन के ज़रूरी और आलंकारिक सत्य को अलग-अलग कर उद्घाटित कर देती है। हम सब जिस ज़िंदगी को जीना चाहते हैं, जिन गुणों को अर्जित करने में सबसे ज़्यादा ख़ुशी महसूस करते हैं बाज़ार में अक्सर उसकी क़ीमत नहीं होती। एक कवि मित्र अक्सर यह क़िस्सा सुनाते थे कि एक बार जब यह पूछने पर कि आप करते क्या हैं उन्होंने कहा कवि हूं तो अगले ने पूछा कवि तो ठीक पर करते क्या हैं? यह कविता उसी द्वंद्व की महाकाव्यात्मक अभिव्यक्ति है। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि अनुवाद कविता का पूरा मज़ा नहीं लेने देता वे भी अगर पूर्वाग्रह से मुक्त हो इसे हिन्दी में लिखी कविता समझकर पढ़ेंगे तो निश्चित तौर पर अशोक भाई के स्तुत्य श्रम को पहचान पायेंगे।
वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा किसी कविता का इतना सटीक और सरल अनुवाद...बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं अशोक जी. हमें विभिन्न देशों की कवियत्रियों और उनकी कविताओं से रूबरू कराने के लिये आपका जितना धन्यवाद करें, कम है ।बेचैन आत्मा ने कहा कविता की व्यंग्यात्मक शैली अद्भुत है. सबसे बड़ी बात यह कि आज भी यह प्रासंगिक है और कल भी रहेगी.शायद इसे ही कालजयी कविता कहते हैं. आदमी के दोहरे जीवन को अभिव्यक्त करती इस कविता के लिए आपका और कबाड़खाना ब्लॉग के श्री अशोक पाण्डेय जी का आभारी हूँ ।रचना दीक्षित ने कहा शरद जी आज फिर से, क्या नवरात्रों में आज के युग की नवदुर्गाओं से परिचय करवाने की मुहीम छेड़ी है यकीन माने बहुत बेहतरीन है ये प्रस्तुति भी. कितनी शालीनता से इतना कटु सत्य उजागर कर दिया इस कविता में. शायद कल एक और कड़ी....।
                         तो लीजिये आज नवरात्रि के तीसरे दिन प्रस्तुत है यूक्रेन रूस की कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा की कविता .........


लक्ष्मण रेखा से
आगे चली गई थी
बर्फ हो गए थे पांव
दाएँ हाथ का दस्ताना
बाएँ हाथ में पहन लिया

जितनी आगे बढ़ी
निगाहें टेढ़ी होती गईं

एक सपाट चेहरे वाले ने कहा
“ मेरे साथ मरना चाहोगी “
नमक हराम हूँ नख से शिख तक
गिरगिट की तरह रंग बदलती हूँ
हूँ ही ऐसी , जवाब दिया था
हाँ मेरे प्यार के देवता ,
मैं मरना चाहती हूँ ,तुम्हारे साथ

बीटिंग रीट्रीट
आखिरी धुन
अन्धेरे में

शयन कक्ष की खिड़की से झाँकती हूँ
धुन्धले प्रकाश में
सारस का एक जोड़ा उड़ा जा रहा है ।

                        अन्ना  अख़्मातोवा

 अन्ना अख़्मातोवा का परिचय : 11 जून 1889 को जन्मी यूक्रेनिया रूस की कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा ने 11 साल की उम्र में पहली कविता लिखी । माता पिता से अलगाव ,वैवाहिक जीवन में तनाव , युद्ध निर्वासन, क्रांति , प्रतिक्रांति उसके परिणाम ,स्वदेश वापसी के बीच उनका लेखन चलता रहा । उनकी कविता परिवार के इर्द गिर्द रहती है ,लेकिन उसमे जैसे किसी को जवाब देने की ताकत है । 1912 में पहला संग्रह “ईवनिंग” 1917 में “ ए वाइट बर्ड फ्लाइट “ 1922 में “प्लेंटेन “ व “एनो डोमिनी “ 1962 में” ए पाएम विदाउट हीरो “ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं । 5 मार्च 1966 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “ पहल “ के 66 वे अंक में प्रकाशित इस कविता का अनुवाद किया है श्री रजनीकांत शर्मा ने । पहल से यह कविता साभार । आपका – शरद कोकास
( अन्ना अख़्मातोवा व उनके परिवार का चित्र गूगल से साभार )