शुक्रवार, मार्च 19, 2010

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे


नवरात्रि चतुर्थ दिवस  गाब्रीएला मिस्त्राल की  कविता
19.03.2010 । नवरात्रि के तीसरे दिन प्रकाशित अन्ना अख़्मातोवा की कविता पर अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी विशेष टिप्पणी में कहा अन्ना आख़्तामोवा की यह कविता एक सघन सांकेतिकता की कविता है। 'लक्ष्मण रेखा के पार चले जाना'जैसे विशुद्ध देसज मुहावरे का इसमे प्रयोग कर अनुवादक ने अपने भाषाई समझ और कौशल का परिचय दिया है। समाज द्वारा तय की गयी सीमाओं से बाहर जाने के बाद क्या होता है एक औरत का? उसका आगे बढ़ते जाना समाज के नियंताओं की नज़र का टेढ़ा होता जानादोनों एक ही समानुपात में घटित होते हैं। बीटिंग रीट्रीट का बजनाअंधेरायह सब मिलकर गहन उदासी का एक बिंब रचते हैंलेकिन उम्मीद कभी नहीं मरतीधुंधले प्रकाश से उड़ता हुआ सारस यह उम्मीद ही तो है जो कवि को इस निराशा के अंधकार से दूर ले जाता है। रजनीकांत जी का अनुवाद कविता को हिन्दी पाठकों के लिये सहज बनाता है ।रंगनाथ सिंह ने इस पर प्रतिटिप्पणी की अशोक जी की टिप्पणी के बाद कुछ कहना अनुचित लग रहा है। उन्होंने बहुत सुंदरता से कविता का अर्थ और महत्व समझाया है ।
संजय भास्कर और चन्दन कुमार झा ने कहा सच में अंधेरे से उजाले की तरफ चलते जाना आसान नहीं होता जबकी अंधेरा अपको जकड़े हुए हो और लक्षमण रेखाऐं खींच दी गयी हो । कविता का अर्थ समझाने के लिये अशोक जी का धन्यवाद । अब कविता और भी अच्छी लग रही है । रचना दीक्षित ने कहा धुन्धले प्रकाश में / सारस का एक जोड़ा उड़ा जा रहा है । ये अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे कविता का सार खुद ब खुद कह रही हैं.वो उम्मीद की किरण नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर, संताप वेदना और कलुषित मानसिकता से बाहर निकल एक खुले आसमां में उड़ान द्योतक है की आगे अब सिर्फ प्रकाश है वो भी श्वेत जो अपने साथ लायेगा सुखद अनुभूतियों का किरण पुंज। वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा ..मतलब स्थितियां आन्ना अख्मातोवा के समय में भी वही थीं जो कमोबेश आज हैं. "पहल" ने हमें बहुत उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध कराया है. जब उसका प्रकाशन बन्द हुआ, उस टीस को आज कुछ राहत मिली. साधुवाद.लावण्या जी ने कहा कविता से अपने मन की पीड़ा, गहन अनुभूति, आशा - निराशा , समाज के कटु सत्य , विवशता सभी चन्द पंक्तियों में लिख गयीं अमिताभ श्रीवास्तव अम्बरीश अम्बुज राज भाटिया और अलबेला खत्री जी को भी यह रचना बहुत अच्छी लगी
                     बेचैन आत्मा ने कहाअशोक जी की व्याख्या अच्छी है. मगर जिस अंश को उन्होंने छोड़     दिया..नमकहराम हूँ नख से शिख तक गिरगिट की तरह रंग बदलती हूँ हूँ ही ऐसी , यह स्वीकारोक्ति बड़ी बात है. यह मन की निर्मलता को बयां करती है. जिसका ह्रदय इतना विशाल हो उसी को दिख सकतीं है ...आशा की किरण  धुंधले प्रकाश में उड़ता सारस का एक जोड़ा । गिरिजेश राव ने कहा कविता और अनुवाद दोनों की परिपक्वता दर्शनीय है। यदि आप ने कवयित्री का नाम नहीं बताया होता तो मैं इसे मुक्तिबोध, केदार या अज्ञेय की रची समझता।.कुछ और बातचीत अशोक जी ने भी की है .. चाहें तो एक बार पुन: पिछली पोस्ट देख लें । धन्यवाद - शरद कोकास

आज नवरात्रि के चौथे दिन प्रस्तुत है लातीन अमेरिकी कवयित्री गाब्रीएला मिस्त्राल की यह कविता जिसका अनुवाद कबाड़खाना ब्लॉग के श्री अशोक पाण्डेय ने किया है ।

अपना हाथ दो मुझे

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
बस एक इकलौता फूल
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
बस एक इकलौता फूल.
साथ नाचते हुए मेरे साथ एक लय में
तुम गीत गाओगे मेरे साथ
हवा में फ़क़त घास
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
हवा में फ़क़त घास.
उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

                       गाब्रीएला मिस्त्राल

 परिचय : गाब्रीएला मिस्त्राल नोबेल पुरुस्कार पाने वाली पहली लातीन अमेरिकी महिला रचनाकार थीं १८८९ में चिली के वीकून्या नामक क़स्बे में जन्मी गाब्रीएला का वास्तविक नाम लूसिला गोदोई ई आलायागा था. वे एक गांव में लड़कियों के एक स्कूल में अध्यापन किया करती थीं.गाब्रीएला की कविता के उत्स उनके पहले असफल प्रेम सम्बन्ध में खोजे जाते हैं अध्यापिका का पेशा अपनाने से पहले उनका सघन प्रेम एक रेलवे कर्मचारी से हुआ. इस रेलवे कर्मचारी ने डिप्रेशन के चलते बाद में आत्महत्या कर ली थी | कविता के कारण जब वे काफ़ी प्रसिद्ध हो गई थीं चिली की सरकार ने उन्हें लीग ऑफ़ नेशन्स में उन्हें अपने देश का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करने का ज़िम्मा सौंपा| बाद के वर्षों में वे अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में स्पानी साहित्य पढ़ाती रहीं| बीसवीं सदी के महानतम कवियों में शुमार पाब्लो नेरूदा को कविता लिखने की ओर प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली गाब्रीएला का देहान्त १९५७ में हुआ |
                   एक निवेदन - कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का ने कहा है " कविता में कुछ भी साधारण नहीं होता ..एक पत्थर , या उस पर ऊगा फूल ..या..और कुछ । " इसलिये कविता में छुपी इन साधारण सी बातों पर भी गौर कीजिये ..आपके विचार सादर आमंत्रित हैं -शरद कोकास 
 

21 टिप्‍पणियां:

  1. अशोक भाई ने उम्दा अनुवाद किया है...अनुवाद कहीं से भी अनुवाद सा नहीं लगता है..एक मौलिक रचना ही प्रतीत होता है..यही खूबसूरती है.

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  2. बस इकलौता फूल
    हवा में फकत घास
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

    अपने नाम खोकर मुक्ति ...

    बन्धु! इस कविता का विश्लेषण नहीं कर सकता। बस अनुभव कर सकता हूँ। किए जा रहा हूँ। ... ऐसी स्थिति आ जाय तो बस जीवन पूर जाय। .. ना ना कोई वाद नहीं।

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  3. गुरूदेव...इस कविता को मैं अपने ब्लॉग पर लगाए की अनुमति माँग रहा हूँ..उम्मीद है गुरूदेव मना नहीं करेंगे।.....

    अपना हाथ दो मुझे

    दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
    अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
    बस एक इकलौता फूल
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    हम बने रहेंगे
    बस एक इकलौता फूल.
    साथ नाचते हुए मेरे साथ एक लय में
    तुम गीत गाओगे मेरे साथ
    हवा में फ़क़त घास
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    हम बने रहेंगे
    हवा में फ़क़त घास.
    उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
    लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    हम बने रहेंगे
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

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  4. दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
    अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
    बस एक इकलौता फूल
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    हम बने रहेंगे


    हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  5. धन्यवाद । नहीं भाई मैं एक मामूली सा इंसान हूँ .. गुरू तो ये हैं "बीसवीं सदी के महानतम कवियों में शुमार पाब्लो नेरूदा को कविता लिखने की ओर प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली गाब्रीएला मिस्त्राल "

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  6. बहुत ही सुन्दर भाव्…………………।उतनी ही सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. शरद भाई,
    गाब्रीएला मिस्त्राल की लेखनी को सलाम...

    वैसे हाथ तो हमारे देश में भी कमाल दिखा रहा है...चुनाव से पहले भीख की तरह फैल कर वोट लेता है...चुनाव के बाद वही महंगाई की शक्ल में हमारे गाल पर रोज़ तड़ से जड़ा जाता है...

    जय हिंद...

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  8. उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
    लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे

    बहुत ही प्यारी सी कविता...एक सुखद अनुभूति लिए..

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  9. ''लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे''
    अर्थ की सघनता कविता का उत्कर्ष है ....शब्द्सत्ता मे विलीन हो गई .
    हार्दिक बधाई .

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  10. कभी-कभी ख्याति भी कितना दंश देने लगती है! सामान्य जीवन जीने की ख्वाहिश बलवती हो उठी है रचना में. ग्राबिएला की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है ये. बधाई और धन्यवाद, आपको और अशोक जी को.

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  11. ...यह तो कबीर का 'अनहद' आनंद है!

    दूर देश के मानव आपस में गूंगे-बहरे होते
    कैसे भाव होते अभिव्यक्त सोंचता यदि अनुवादक ना होते!
    ..अशोक जी के अनुवाद को प्रणाम.

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  12. शरद जी ! कविता के अनुवाद पर मैं निशब्द हूँ...अशोक जी को सलाम

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  13. लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    हम बने रहेंगे
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
    शरद जी आज की पोस्ट भी उतनी ही उत्कृष्ट कोटि की है जितनी आपकी इस श्रंखला की बाकी हैं.मुझे जो समझ आया उसके हिसाब से एक बहुत खूबसूरती से लिखी गयी व्यथा है जो किसी का साथ पाने की तीव्र बलवती होती इक अभिलाषा, हर पल हर साँस में इक जिंदगी जी लेने की अनकही सी दास्ताँ सी लगती है

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. निश्छल प्रेम !!! जो कभी एक नृत्य बन जाता है तो कभी फूल और कभी सुन्दर गीत । जरूरत है हाथ बढ़ाकर उस प्रेम को छूने की, बाकी काम तो प्रेम स्वंय कर लेता है, हवा में तैरते फ़ख़त घास रास्ते बन जाते है । मुक्त हो जाता है जीव स्वंय से । अनुवाद के लिये श्री अशोक पाण्डेय जी एवं ब्लाग पर प्रकाशित करने के लिये आपका आभार । शुभकामनायें ।

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  16. अद्भुत कविता ! खूबसूरत अनुवाद ! अशोक जी का स्तुत्य प्रयास है यह !
    अभी तो सारी पिछली प्रविष्टियाँ पीने की राह पर हूं ! उपस्थिति-टिप्पणी दे रहा हूं ।
    आभार ।

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  17. पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं
    प्रेम में खोकर मुक्त होकर भी पहाडियों पर सिर्फ एक नृत्य के रूप में बने रहने की कामना अदभुत है .अशोक जी का सुंदर अनुवाद और सुंदर प्रस्तुति . बधाई शरद जी !

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  18. शीर्षक पढ़ कर पहले तो अशोक बाजपेई की एक कविता जेहन मे आयी..मगर मजमून मे जाते है चीजें एकदम बदल गयी..और सच कहूं तो काफ़ी दुविधा रही कविता क पकड़ने मे..क्या क्या कह जाते हैं कविता के बिम्ब..प्रेम मे स्वत्व को खो कर एकलय, एकरूप हो कर इकलौता फ़ूल होने की कबीर जैसी ख्वाहिश..या आपाधापी के युग मे जीवन के सबसे मूलभूत मगर खो गये तत्वों की तलाश और खुद को मुक्त करने की कामना..जो घास सी हलकी और पहाड़ पर नृत्य सी आदिम है..क्या है पता नही!!

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  19. इकलौता फूल!
    --
    फ़क़त घास!
    --
    पहाड़ियों पर बस एक नृत्य!
    --
    तीनों बिंब एकाकी प्रेम में
    आलौकिक आभा के
    मिथक-से बनते प्रतीत हुए!

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