रविवार, अक्तूबर 02, 2011

रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी

1984 की डायरी से यह एक कविता


क्योंकि हम मूलत: भिक्षावृत्ति के खिलाफ हैं

हमारे सामने फैले हुए हाथ पर
चन्द सिक्के रखने की अपेक्षा
हमने रख  दी है कोरी सहानुभूति
और उसके फटे हुए झोले में
डाल दिये हैं कुछ उपदेश
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं

उसकी ग़रीबी पर
बहाए हैं मगरमच्छ के आँसू
और गालियाँ दी हैं अमीरों को
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं

उसकी फटेहाली पर
व्यक्त किया है क्षोभ
और कोसा है व्यवस्था को
उसकी ओर उंगली दिखाते हुए
 क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं

उससे पूछा है
कोई काम करोगे
उसके काम माँगने पर
उछाल दिया है आश्वासन
नेताओं की तरह
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं

फिर हमारी रेल आ जाती है
हम बैठकर चले जाते हैं
चाँवल से भी वज़नी
हमारे उपदेश और सहानुभूति
और आश्वासन
उसके झोले में लगे विवशता
के पैबन्द फाड़
प्लेटफॉर्म पर 
जहाँ- तहाँ गिर जाते हैं ।

            - शरद कोकास 

8 टिप्‍पणियां:

  1. क्योंकि हम मूलत:
    भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं...

    बेहतर...

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  2. हमारे वजनी उपदेश और दबा हुआ निरीह भिखारी।

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  3. एक युवा की दृष्टि से बहुत संवेदनशील रचना .

    लेकिन क्या आज भी ऐसा ही सोचते हैं भिखारियों के लिए ?

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  4. लगता है कुछ कविताएँ उम्र की मोहताज होती हैं।

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  5. आपका उपदेश और सहानुभूति आज भी प्रासंगिक है :)

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  6. कल 05/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. RACHANAA BAHUT SUNDAR.....JISKI TASWEER YAHAAN DIKHAAI PAD RAHI HAI USE MAI SAN 1994 SE JAB RAJNANDGAON UP-DOWN KARTA THA, DEKH RAHA HOON...2010 TAK...AB TO NAGPUR HAI DUTY KABHI KABHI AATE JAATE TRAIN ME DIKH JAATA HAI AUR VAHI GANA..."BHEEKH DE DE DHARMI DAYALOO....."

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