मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

नवरात्रि कविता उत्सव २०११ द्वितीय दिवस - सुकृता पॉल की कवितायेँ

                                   
नवरात्रि के प्रथम दिवस रानी जयचंद्रन की कविता पर अनेक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई . मैं आभारी हूँ , सभी पाठकों का . साथ ही मैं सभी पुराने पाठकों को भी आवाज़ दे रहा हूँ . 

आज प्रस्तुत है सुकृता पॉल कुमार की यह कविता जिसका अंग्रेजी से अनुवाद किया है सिद्धेश्वर सिंह ने . 
 
                                     उजला होता जा रहा है अधिक उज्ज्वल

सुकृता ( सुकृता पॉल कुमार ) कथा साहित्य की गंभीर अध्येता और अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापक हैं। वह चित्रकार , अनुवादक , संपादक तथा सामाजिक सरोकारों से सक्रिय जुड़ा़व रखने वाली कार्यकर्ता हैं। वह अमेरिका के आयोवा विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम शामिल हो चुकी हैं और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला की फेलो भी रह चुकी हैं। एक कवि के रूप में वह केवल सुकृता के नाम से जानी जाती हैं। दिल्ली निवासिनी  हिमालय प्रेमी  सुकृता जी का जन्म और पालन पोषण केन्या में हुआ है। पिछले कई दशकों से वह अपनी कविताओं के जरिए अपनी जड़ों की तलाश के क्रम में रत हैं। उनके चार कविता संग्रह Oscillations, Apurna, Folds of Silence और Without Margins प्रकाशित हो चुके हैं।  प्रस्तुत हैं उनके चौथे संग्रह में संकलित दो कवितायें :

सुकृता पॉल कुमार
01 . नीरवता को तोड़ते हुए



शब्द झरते हैं

सुमुखि के मुख से

बारिश की तरह



रेगिस्तानों पर ।

*

अंतस में आड़ोलित

आँधियों और चक्रवातों के पश्चात



शब्द गिरते हैं

शिलाखंडों की तरह।

*

अटक गए हैं शब्द

जमी हुई

बर्फ़ की तरह



प्रेमियों के कंठ में।

*

विचारों में पिघलते हुए

मस्तिष्क में उतराते हुए



एकत्र हो रहे हैं शब्द

अनकहे वाक्यों में।



02. परिज्ञान



रोशनी के उस वृत्त के

ठीक मध्य में

उभर रहा है

अनुभवों की सरिता में

हाँफता -खीजता

सिद्धेश्वर सिंह
मेरे जीवन का सच



इतना उजला

कि देख पाना मुमकिन नहीं मेरे वास्ते।



गड्ड मड्ड हो गए हैं सारे रंग

जिन्दगियाँ एक दूजे में सीझ रही हैं

उजला होता जा रहा है अधिक उज्ज्वल

और मैं

पहले से अधिक दृष्टिहीन।
-----------
( कविता : सुकृता पॉल कुमार)
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )



20 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शरद जी
    नमस्कार !
    रोशनी के उस वृत्त के

    ठीक मध्य में

    उभर रहा है

    अनुभवों की सरिता में

    हाँफता -खीजता

    सिद्धेश्वर सिंह
    मेरे जीवन का सच

    बहुत ही सुन्दर
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

    उत्तर देंहटाएं
  2. नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें !
    माँ दुर्गा आपकी सभी मंगल कामनाएं पूर्ण करें

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब कहा है ...बेहतरीन शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अद्भुत और सरल भी। शब्‍द और उजाले के लिए नई दृष्टि।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अटक गए हैं शब्द
    जमी हुई
    बर्फ़ की तरह
    प्रेमियों के कंठ में ..
    Namaskaar शरद जी ...
    अक्सर शब्द सही समय पर ही दोखा देते हैं ...
    बहुत ही लाजवाब है हर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. दोनों कवितायें अच्छी लगीं. कवियत्री, सिद्धेश्वर जी एवं आपको बधाई. एक छोटा सा अनुरोध कि, 'नवरात्रि कविता उत्सव २०११ ----' की बजाए पोस्ट का शीर्षक 'चैत्र
    नवरात्रि कविता उत्सव २०११-----' नहीं रख सकते क्या? क्योंकि वर्ष के अंत में पुनः नवरात्रि आयेगी. मेरे ख्याल से इस तरह से बाद में आने वाले पाठकों के लिए पोस्ट ढूंढना आसान हो जाएगा भैया.

    उत्तर देंहटाएं
  7. दोनों कवितायें अच्छी लगीं. कवियत्री, सिद्धेश्वर जी एवं आपको बधाई. एक छोटा सा अनुरोध कि, 'नवरात्रि कविता उत्सव २०११ ----' की बजाए पोस्ट का शीर्षक 'चैत्र नवरात्रि कविता उत्सव २०११-----' नहीं रख सकते क्या? क्योंकि वर्ष के अंत में पुनः नवरात्रि आयेगी. मेरे ख्याल से इस तरह से बाद में आने वाले पाठकों के लिए पोस्ट ढूंढना आसान हो जाएगा भैया.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत खूबसूरत शब्द चित्र...बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  9. शब्द गिरते हैं
    शिलाखंडों की तरह।

    बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  10. Without Margins मैंने भी देखी है..... अनुवाद बहुत जीवंत और सशक्त है. बधाई सुकृता जी और सिद्धेश्वर भाई!

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  11. iss baar bharteey kavitaa ki talash ka silsilaaachchha lagaa. anek ahindi bhashee kavyitriyaa achchha likh rahi hai. unka lekhan bhi samane aanaa chahiye. is soch ka swagat hai. yah pyaree kavita bhi mere kosh me rahegi. anuvaad kavitaa ki dhar ko kam nahi kartaa. anuvad badhai ke patr hai.

    उत्तर देंहटाएं
  12. (1) शब्दों की उम्र बडी लम्बी है। अनकहे वाक्यों में जिंदगी के दर्द अभिव्यक्त करती है। कभी बारिश की तरह झरती, कभी शिलाखण्डों की तरह गिरती कभी प्रेमियों के कंठ मे अटक जाती है बर्फ बन। इस कविता में नारी के संपूर्ण जीवन की झलक भी मिलती है।
    (2) जीवन के चकाचौंध में गुम होते जड़ों का चित्रण। जब हम बाहरी उज्ज्वलता में खुद को तलाशते हैं तो ज्ञान होता है कि कितने दृष्टिहीन हैं।
    ....मैने तो यही समझा। न समझा हो तो कृपया समझाने का कष्ट करें।...आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  13. सशक्‍त अभि‍व्‍यक्‍ति‍....अच्‍छा अनुवाद...

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  14. शरद जी, मैंने रानी जी की कविता पर कमेंट किया था, पता नहीं कहां खो गया...

    सुकृता जी की कविता किसी रेगिस्तान में पानी के निर्मल झरने की तरह है...

    आपका और सिद्धेश्वर जी का आभार...

    जय हिंद...

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  15. रोशनी के उस वृत्त के

    ठीक मध्य में

    उभर रहा है

    अनुभवों की सरिता में

    हाँफता -खीजता


    सिद्धेश्वर सिंह
    मेरे जीवन का सच
    waah kya kahne ,aap bahut hi sundar likhti hai .badhai nav raatri utsav ki .

    उत्तर देंहटाएं
  16. अनकहे वाक्यों में एकत्रित शब्द ,
    उजाला होता जा रहा है और उज्जवल और मैं दृष्टिहीन ...
    चुन कर लाये हैं मोती !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  17. घोंघा, खरगोश और विरही परिंदा

    ======================

    कविताओं की दुनिया बड़ी निराली है. अंग्रेजी के साहित्यकारों ने वनचरों पर अद्भुत रचनाएँ की हैं मैंने कुछ कविताओ को अनुदित किया है आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ -

    घोंघा (considering the snail-Thomas Gun)



    हरी चादर पर रेंगता एक घोंघा

    भीगी, खुरदरी ,बोझिल सी घांस पर

    एक चमकीली सी पगडण्डी बनाता

    वहां, जहाँ धरती के धूमिल रंग को

    और भी गहरा कर देती है बारिश

    रेंगता है वह आकांक्षाओं के बीहड़ में

    ****

    अपने शिकार को आता देख

    भयभीत पुन्केसरों का कम्पन

    समझ नहीं पता मैं कि कौन सी

    शक्ति से वे हैं उद्दीप्त!

    प्रयोजन -कुछ भी न समझकर

    कैसा है उस घोंघे का आवेश

    मैं सोचने लगता हूँ कि अगर

    मैंने नहीं देखी होती वह पगडण्डी

    सफ़ेद ,पतली और चमकीली

    *******

    कभी नहीं कर पाता कल्पना मैं

    धीमी पर निश्चिन्त प्रगति के लिए

    घोंघे के उस मंथर उन्माद की

    हरी चादर पर.... रेंगता है एक घोंघा



    2.खरगोश (THE HARE- WILLIUM COPPER)





    जिसे ग्रे-हाउंड भी छू न पाया

    ओस भी जिसके पैरों रही अ-मृत

    दुलारा गया जिसे प्यार से

    रोटी,दूध और डूब खता था वह

    सलाद और गाजर भी भाते थे उसे

    उसका लान था तुर्की गलीचा

    जहाँ भरता था वह कुलांचे

    शाम को करता था वह शैतानी

    पुरबाई या फुहारों के समय

    आ जाता था दुबककर वह गोद में

    अब अखरोट कि छाया तले है

    उसका बसेरा ,चिरनिद्रा में लीन

    मानो खामोश करता है प्रतीक्षा

    मेरे पुचकारने क़ी...

    3. विरही परिंदा (TO THE WIDOW BIRD-P.B.SHELLEY )



    बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था

    विरह से व्यथित एक विरही परिंदा

    बैठा था डाल के कोने पर

    गुमसुम... यादों के हसीं हिंडोले पर

    सीना चीर रहीं थीं हवाएं सर्द

    नीचे बहता झरना भी हो गया था बर्फ

    बेरौनक थे बेपत्ता जंगलों के नंगे ठूंठ

    जमीन पर नहीं गिरा था एक भी फूल

    खामोश थी हवाएं .. एकदम बेजान

    गाहे ब-गाहे चीखती थी,पवन चक्की नादान




    आज बस इतना ही .. अपना ख्याल रखिए

    किशोर दिवसे

    मोबाइल 09827471743

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  18. बहुत सुंदर... कविता भी और अनुवाद भी..

    उत्तर देंहटाएं