रविवार, नवंबर 21, 2010

झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की


यह इंसान की ही फितरत है कि वह हर दुनियावी और दुनिया से बाहर की चीज़ की अपने अनुसार परिभाषा गढ़ लेता है । प्रेम के बारे में भी उसका यही सोचना है । फैज़ कहते हैं " मेरे महबूब मुझसे पहली सी मोहब्बत न मांग, और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा । " लेकिन इंसान की विवशता यह है कि वह इन दुखों से भी लड़ता है और मोहब्बत भी करता है । शायद यह मोहब्बत ही उसे दुखों से लड़ने की ताकत देती है । इस मोहब्बत को अंजाम तक पहुँचाने के लिये वह अपने आप से लड़ता है ,अपने महबूब से लड़ता है गोया कि सारी दुनिया से लड़ता है , कभी आँसू बहाता है , कभी खुश होता है , और यह कश्मकश लगातार चलती है ... लेकिन वह अंत तक नहीं समझ पाता कि इसी कश्मकश का नाम ही तो प्रेम है  । प्रस्तुत है " झील से प्यार करते हुए " कविता श्रंखला की यह एक प्रेम कविता  , मेरे कविता संग्रह " गुनगुनी धूप में बैठकर " से

 झील से प्यार करते हुए – एक

झील की ज़ुबान ऊग आई है
झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की
झील के मन में है ढेर सारी नफरत
उन कंकरों के प्रति
जो हलचल पैदा करते हैं
उसकी ज़ाती ज़िन्दगी में
झील की आँखें होती तो देखती शायद
मेरे हाथों में कलम है कंकर नहीं
           
झील के कान ऊग आये हैं
बातें सुनकर
पास से गुजरने वाले
आदमकद जानवरों की
मेरे और झील के बीच उपजे
नाजायज प्रेम से
वे ईर्ष्या करते होंगे

वे चाहते होंगे
कोई इल्ज़ाम मढना
झील के निर्मल जल पर
झील की सतह पर जमी है
खामोशी की काई 
झील नहीं जानती
मै उसमें झाँक कर
अपना चेहरा देखना चाहता हूँ

बादलों के कहकहे
मेरे भीतर जन्म दे रहे हैं
एक नमकीन झील को
आश्चर्य नहीं यदि मैं एक दिन
नमक के बड़े से पहाड़ में तब्दील हो जाऊँ । 

                            - शरद कोकास 

41 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ...
    झील के दर्द को बखूबी उकेरा है आपने
    'नमक का पहाड़' होने से पहले ही बादल कहकहे लगाना बन्द कर देंगे.

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  2. बहुत खूबसूरती से यह प्रेम की अभिव्यक्ति लिखी है ...

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  3. काश, प्रकृति कुछ कह सकती। जब सहन नहीं होता है, क्रोधवश विनाश कर बैठती है।

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  4. कवि महोदय
    बहुत ही प्यारी कविता लिखी है आपने
    जबरदस्त

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  5. कोई आश्चर्य नहीं !!!!!!!! मुमकिन है :)

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  6. ये फैज़ साहब का है, हम तो सोच रहे थे ग़ालिब का है, और यकीन मानिए, ग़ालिब साहब की जितनी थोड़ी बहुत शायरी पढ़ी या सुनी है, उस पर ये फब भी नहीं रहा था, आपने तो हमारी समस्या हल कर दी ....
    जहाँ तक कविता का सवाल है, तो हमारा मानना है की जब झील ने आपको पूरी एक रचना गढ़ने का माहौल दिया है, तो फिर आपको उसके शिकायत नहीं होनी चाहिए, हमें तो आप ही बेवफा लग रहे है .... हम तो झील पर अपनी मायूसी कभी न थोपे, गिनी चुनी तो चीज़ें बची है प्राकृतिक, उनमे तो उर्जा ही दिखानी चाहिए ... हमारा तो यही मानना है...
    बाकी आपकी प्रस्तुति बहुत दिलचस्प और मौलिक है .. लिखते रहिये ....

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  7. प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (22/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  8. झील के कान ऊग आये हैं
    बातें सुनकर
    पास से गुजरने वाले
    आदमकद जानवरों की
    मेरे और झील के बीच उपजे
    नाजायज प्रेम से
    वे ईर्ष्या करते होंगे
    aaj admi bahara ho gaya hai.wo sun nahi sakata
    aap sadak par harn bajate hai kiya koie sunta hai .

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  9. झील के द्वारा गहरी बात कही है भईया, धन्‍यवाद.

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  10. ऐसी पाक मोहब्बत हो तो कंकर पत्थर और आदमकद जानवरों की क्या बिसात कि झील से जुदा कर दें आपको।

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  11. झील नहीं जानती कि मैं उसमें झांककर अपना चेहरा देखना चाहता हूँ....
    ...नमकीन झील का स्वाद चखते ही परिस्थितियाँ बदल जाएंगी.
    ..अच्छी लगी कविता।

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  12. sharad jee jheel ke dil kee abhivykti bahut khoob ukeree hai aapne..........
    Aabhar

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  13. बादलों के कहकहे
    मेरे भीतर जन्म दे रहे हैं
    एक नमकीन झील को
    आश्चर्य नहीं यदि मैं एक दिन
    नमक के बड़े से पहाड़ में तब्दील हो जाऊँ
    नमक के पहाड़ में तब्दील हो जाऊंगा !!!!!!!

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  14. jheel ka dard jana ..... yahi hai jivan ko pana .... vatvriksh ke liye apni rachna parichay aur tasweer ke saath bhejiye rasprabha@gmail.com per

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  15. @ उत्तम राव जी ,
    'नमकीन झील' और 'नमक के पहाड़' हो जाने की आशंकाओं पर 'क्षीरसागर' की वाह!!! :)

    @ कोकास जी ,
    क्या प्रेम में 'ज़ाती' जैसा कुछ भी शेष रह पाता है ? फिर भी झील उसे अपने पास बैठने से मना करती है ? शायद उसका प्रेम कच्चा हो कि उसके लिए , कंकर और कलम के फर्क , पास से गुज़रते हुए आदम कद जानवरों की फुसफुसाहट की परवाह के चलते मिट जाएँ ?

    पता नहीं ये ससुरा प्रेम इतना कन्फ्यूज क्यों करता है कि एक टिप्पणी भी ढंग से लिखी नहीं जाती :(

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  16. रचना पीड़ा को पूरी तरह परिभाषित करने में सक्षम रही है...सुंदर...
    आभार.....



    झील मैं अब जम गयी हूँ
    धूप बन आ गुनगुनी,
    फिर झरूँगी झरने सी,

    गीता पंडित

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  17. पसदं आई कविता..
    'झील को आईना न समझा करीए ..झील के दिल में भी फ़ूल खिला करते हैं..'

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  18. झील का विम्ब लेकर खूबसूरत एहसासों को बुनती रचना!!!
    सुन्दर!

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  19. झील के शांत जल में हम कंकड़ उछालकर बहुत खुश होते थे मगर आज पता चल उन्हें भी दर्द होता रहा होगा .... बहुत ही सुंदर कविता

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  20. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 23 -11-2010
    को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  21. झील के घनीभूत पीड़ा ससार को उकेरती, गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  22. शरद जी...एक सुखद एहसास को दर्शाती उम्दा रचना..झील का वर्णन करते करते एक बेहतरीन अभिव्यक्ति प्रस्तुत किया आपने...सुंदर रचना के लिए बधाई!!

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  23. बेहतर कविता ....
    @अल्पना जी से सहमत :-)

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  24. शानदार .....इसी सब्जेक्ट पर गुलज़ार साहब ने भी एक त्रिवेणी लिखी थी

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  25. प्रेम कविता का एक अलग नया रूप ... अचम्भित करता हुआ...

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  26. वे चाहते होंगे
    कोई इल्ज़ाम मढना
    झील के निर्मल जल पर
    झील की सतह पर जमी है
    खामोशी की काई
    झील नहीं जानती
    मै उसमें झाँक कर
    .हर एक लफ्ज सन्देश से भरा है
    शुक्रिया

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  27. झील की खामोशी को बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द दिये हैं आपने ...

    गहन भावों के साथ बेहतरीन शब्‍द रचना ।

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  28. बहुत बढ़िया लिखते हैं आप ! शुभकामनायें शरद भाई

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  29. झील का दर्द ... बहुत गहरी सोच है शरद जी ... एक संवेदनशील मन ही इतना सोच सकता है ... मौन दर्द को ज़ुबान दी है आपने ... शब्दों की भाषा में उनका दर्द उतार फिया है ... लाजवाब ...

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  30. एक अनुपम एवं अद्वितीय रचना ! बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति एवं अनोखे दृष्टिकोण के साथ सशक्त प्रस्तुति ! बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  31. झील का दर्द है या पर्वत की व्यथा ...
    बेहद खूबसूरत कविता !

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  32. झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की !!! झील का सौन्दर्य और दर्द समझने वाला यह कोई नया पुरुष है ! शरद सिंह ने यह आरोप लगाया है कि हिंदी के व्याकरण में स्त्री केवल लिंग है !जबकि सारा व्याकरण प्रथम मध्यम और उत्तम पुरुष के इर्द गिर्द घूमता है ! इस कविता को पढ़ते हुए मुझे याद आया कि यहा पर झील के प्रति अपनी भावना को उसकी भावना के जरिये कहने कि कोशिश की गई है !पहली बार कही झील अभिव्यक्त हो पाई है प्रेम की ईमानदारी ,गहराई और सुंदर सुंदर फोटो से ! शरद कोकस जी आपको तहे दिल से बधाई ! मेरा द्वीप भी देख लीजियेगा ! धन्यवाद !

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  33. अनूठी रचना ,शुरू में व्याख्या पढ़कर ही आनंद आ गया ।

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  34. एक अच्छी रचना के लिए साधुवाद.

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  35. bahut hi sundar prem kavita with backdrops of Jheel ...

    aanand aa gaya padhkar .

    bahut sundar rachna

    badhayi

    vijay
    kavitao ke man se ...
    pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

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  36. झील के माध्यम से अपने भीतर के आक्रोश को जबाँ दे दी आपने और बन घई एक खूबसूरत रचना ।

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