बुधवार, अक्तूबर 07, 2009

मेरी आँखों के जल में झिलमिलाता चांद

नवरात्र के बाद शरद पूर्णिमा भी आकर चली गई ,फिर अब करवा चौथ ,रात पूर्णिमा और चांद यह शब्द युग्म अपने आप में एक कविता की तरह लगता है , सभी तरफ चांद की ही बातें हैं । खिड़की से बाहर देखो तो चांद , सड़क पर चलते हुए देखो तो चांद । मुझे याद आ रही है बरसों पहले लिखी एक प्रेम कविता । सफल प्रेम की या असफल प्रेम की ..? यह तो आप को तय करना है ।

                                                  तफरीह                                                          

तफरीह चल रही थी                       
चांद की आसमान में                     
ज़मीन पर हमारी            
बैठी थी वह                       
दुपहिये की पिछली सीट पर     


बेनकाब था चांद आसमान में      
यहाँ थी मुखौटों की भीड़               
मुश्किल था असल चेहरा पहचानना  


मैने कहा चांद को देखो     
हमारे साथ चल रहा है         
उसने कहा
तुम सड़क पर निगाह रखो                                                 
तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है   


मै नहीं देख पाया                                
उसकी निगाहें                                                         
चांद पर थी या नहीं                                                            
वह भी कहाँ देख पाई                                                                  
मेरी आँखों के जल में                                                                      
झिलमिलाता हुआ चांद ।                               

- शरद कोकास                                                                                         
(चित्र में दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात भिलाई की एक व्यस्त सड़क )

33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर चाँद अपनी बात कहलवा ही लेता है ..

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  2. क्या बात है वाह-वाह... सभी करवा चौथ मानाने लगे...

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  3. वह भी कहाँ देख पाई
    मेरी आँखों के जल में
    झिलमिलाता हुआ चांद । !!!!
    और इसी तरह सी बीत जाती है जिन्दगी !
    ऐसा भी नही की नही मिला और ऐसा भी नही की मिल
    गया !!!!!सुंदर अभिव्यक्ति !!!!!!!!

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  4. आँखो मे झिलमिलाते चाँद की झलक मिली. सबकी निगाह उसी चाँद पर है

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  5. चांद कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, जीवन सब से महत्वपूर्ण है। इस कविता में 'तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है'वाक्यांश अजीब लग रहा है। यह पाठक रुचि के अनुसार हास्य या विद्रूपता दोनों ही पैदा कर सकता है।
    कविता इसी कारण से विशिष्ठ हो चली है।

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  6. मै नहीं देख पाया

    उसकी निगाहें

    चांद पर थी या नहीं

    वह भी कहाँ देख पाई

    मेरी आँखों के जल में

    झिलमिलाता हुआ चांद ।

    वाह !!!

    सचमुच यह तय करना कठिन है कि इस प्रेम को क्या कहा जाय...

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  7. वह भी कहाँ देख पाई

    मेरी आँखों के जल में

    झिलमिलाता हुआ चांद ।

    भाई, असफल प्रेम की विरह गाथा लगती है.
    पर है मजेदार.

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  8. शरद ऐसी स्थितियों से गुज़ार देने पर ही स्त्रियाँ प्रेमिका से पत्नी बन जाती हैं...
    मै नहीं देख पाया
    उसकी निगाहें
    चांद पर थी या नहीं
    वह भी कहाँ देख पाई
    मेरी आँखों के जल में
    झिलमिलाता हुआ चांद ।

    मार्मिक कविता... बहुत सुन्दर

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  9. वह स्त्री दुर्घटना से डर रही है लेकिन खुद ज़िंदा रहना चाहती है इसलिए तुम्हारा क्या मुझे तो बरसो जीना है ऐसा कह रही है प्रेम में स्वार्थ नहीं होना चाहिए स्वार्थ प्रेम को विफल कर देता है । इसलिए तो प्रेमी की आँख में आँसू है यही है ना इस कविता का मतलब ?

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  10. बहुत सुंदर जी, सच बोल रही है, चांद जाये भाड मै... चुपचाप चलाओ, साबधानी हटी ओर टिकट कटी

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  11. अजित वडनेरकर to me
    show details 5:43 PM (4 hours ago)
    बहुत खूब....मुझे भी कुछ याद आया....

    चांद किसी का हो नहीं सकता,
    चांद किसी का होता है?
    चांद की खातिर ज़िद नहीं करते
    ऐ मेरे अच्छे इंशा चांद...



    (मेरे प्रिय शायर इब्नेइंशा की चांद विषयक लम्बी नज्म का एक बंद

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  12. आज फिर वही चांद है शरद जी. सुन्दर कविता.

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  13. भाई साहब जिसका चांद सामने हो उसे उपर वाले की क्या फ़िक्र्।
    यह ऐसी कविताओं में से है जिस पर बहस नहीं की जाती…बस रस लिया जाता है

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  14. us chand se mahatvpurn hai aankho ka sajal chand...... or us se bhi mahatvpoorn hai kavita ka marm.

    hatzz off sharat bhaiya .

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  15. सचमुच में, यह एक सफल प्रेम कवित ही होनी चाहिये । बहुत ही अच्छी लगी यह रचना । आभार

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  16. चित्र में दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात भिलाई की एक व्यस्त सड़क

    is vakya ne mujh jaise alpgyani ko kavita samjhne main badi sahayta ki !!

    waise beside joke :कविता कठिन है फिर भी
    यह पेज 60बार पढ़ा गया haha...

    (are ye bhi PJ tha?)

    Ek treveni nazar kar raha hoon:
    अब भी वो चाँद वहीँ पे लटका है देखो .
    पूर्णमासी थी तब, आज अष्टमी है बेशक .
    तुम्हारे जन्म दिन पे एक गुब्बारा फुला के टांगा था.

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  17. उसने कहा
    तुम सड़क पर निगाह रखो
    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना
    वह भी कहाँ देख पाई
    मेरी आँखों के जल में
    झिलमिलाता हुआ चांद ।
    जीना तो दोनों को ही है..हास्य है..व्यंग्य है..जो भी है..सहज अभिव्यक्ति..!!

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  18. Are aap to bhawuk ho chale. chand to usane bhee dekha hoga par aapko zidakti nahee to kya aap sadak par dhyan ete. romance sadak par wahan chalate hue ............. khatarnak !

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  19. चाँद का हर रूप इन्सान ने बनाया है। अब तो सच मे चाँद पर पानी मिल गया है अब सच मे चाँद सजल है आभार कविता बहुत सुन्दर है

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  20. कभी-कभी हमारे भावः, अभिव्यक्ति चीज़ों के मोल अनमोल कर हैं यह तो फिर चाँद है...बहुत उम्दा लिखा है आपने. जारी रहें.
    ---

    ---
    हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

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  21. प्रेम को जीवन की कठिन ड़गर पर उतरना ही होता है...
    असली परख तो यहीं है...
    चांद कभी-कभी इस बेबसी की भावुकता को टटोलकर आंखों के जल में झिलमिलाने चला आता है...

    बेहतर कविता...

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  22. नहीं देख पाया

    उसकी निगाहें

    चांद पर थी या नहीं

    वह भी कहाँ देख पाई

    मेरी आँखों के जल में

    झिलमिलाता हुआ चांद ।

    वाह !!!बेहतर

    उत्तर देंहटाएं
  23. मैने कहा चांद को देखो

    हमारे साथ चल रहा है
    उसने कहा
    तुम सड़क पर निगाह रखो

    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है
    एकदम समझदारी की बात कही भाभीजी ने, शरद साहब !

    उत्तर देंहटाएं
  24. सुन्दर रचना है शरद जी .......... प्रेम की सुन्दर अभ्व्यक्ति है .........

    उत्तर देंहटाएं
  25. मै नहीं देख पाया

    उसकी निगाहें

    चांद पर थी या नहीं

    वह भी कहाँ देख पाई

    मेरी आँखों के जल में

    झिलमिलाता हुआ चांद ।

    बहुत सुंदर .....!!

    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है ....

    मजाक में कहा होगा शरद जी ...कोई स्त्री ऐसी भी कामना नहीं करती .....!!


    पर शरद जी क्या यह प्रेम कविता है .....??

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  26. तुम सड़क पर निगाह रखो
    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है
    sach to kha chand to niklta hi rhta hai sdyo se aor niklta hi rhega sadiyo tak ,
    bdhiya bhav
    abhar

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  27. अपने प्रिय कवि की एक लाजवाब कविता पर अपने दूसरे प्रिय कवि अशोक कुमार पांदेय जी बातों से पूर्णतया समर्पित...

    चाँद पे न जाने कितना कुछ लिखा गया होगा अब तक, ये तस्वीर कुछ अनूठी लगी...

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  28. कविता प्रेमियों कि लिए अच्छा ब्लाग है। खास तौर पर आप टिप्पणियों को जो सम्मान देते हैं वो उल्लेखनीय है

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  29. शरद जी अगर आपके दोपहिया पे पीछे बैठी युवती को मैं जिन्दगी मान लूँ..तो अचानक इस कविता का फ़लक बहुत विस्तृत और अनूठे अर्थपूर्ण हो जाता है..यह जिन्दगी ही तो है जो आपके खयाली चाँद का पीछा करना छोड़ कर अपनी रुटीन लाइफ़ के व्यस्त और भीड़ भरे मार्ग पर अपने रोटी-कपड़ा-मकान पर फ़ोकस करने पर मजबूर कर देती है..बैकसीट पर बैठ कर ड्राइविग के लेसन्स देने मे बिजी जिंदगी को कब दिखेगा आपकी आँखों मे झिलमिलाता चाँद
    उसके लिये तो
    तुम सड़क पर निगाह रखो
    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है

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  30. वह भी कहाँ देख पाई
    मेरी आँखों के जल में
    झिलमिलाता हुआ चांद
    तुम सड़क पर निगाह रखो
    तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है
    bahut khoob...
    aur Apoorv ka vishleshan bhi anootha...
    Kavita rahasyamayi lagi...!!

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