रविवार, सितंबर 27, 2009

सड़क किनारे खड़े मनचले सेंक सकेंगे अपनी आँखें

नवरात्रि पर विशेष कविता श्रंखला-समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें नौवाँ दिन

मिता दास की कविता रसोई में स्त्री पर अपने विचार व्यक्त करते हुए रंजना ने कहा “ रसोई में औरत के दिल में भी कुछ कुछ साथ साथ पकता रहता है । “ शोभना चौरे ने कहा मिता ने नारी के कुशल प्रबन्धन को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । सद्भावना दर्पण के सम्पादक गिरीश पंकज ने मिता की कविता की नमक के स्वाद के साथ तुलना करते हुए कहा कि समकालीन कविता में सद्भाव का नमक बना रहे । दीपक भारतदीप ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में कहा कि नई पीढ़ी इंटरनेट पर कहानी कविताओं में कथ्य,तथ्य और भाव देख रही है । गम्भीर कवितायें ज़्यादा सशक्त होती हैं । अशोक कुमार पाण्डेय ने इसी ज़मीन पर लिखी कुमार अम्बुज की कविता को याद करते हुए कहा कि यह छोटी कविता सच में बड़ी बात कहती है । काजल कुमार ने इस तरह की कविताई को सुनार का काम कहा । निशांत ने कहा कि कभी किसी की पंक्तियाँ हृदय में गहरे तक उतर आती हैं उन पर टिप्पणी करने से हम खुद को रोक नहीं पाते । समीर लाल ने इसे औरत की आम ज़िन्दगी के आसपास खोई कविता का पता बताती हुई कविता कहा । वहीं चन्द्रमोहन गुप्त ने इस कविता को काम के दबाव तले कसमसाती साहित्यिक प्रतिभाओं की घुटन को बयान करती कविता कहा । वन्दना को हर औरत में छुपी हुई एक कवयित्री नज़र आई । अनिल पुसदकर ने सहज भाव से कहा मुझे कविता की ज़्यादा समझ नहीं है लेकिन मैं उन्हे पढ़ने से परहेज नहीं करता । दिगम्बर नासवा ने इसे रोज़मर्रा के शब्दों से निकली जीवंत रचना माना और विधु ने कहा मिता दास के शब्द और दिल की हलचल बड़े बड़े कवियों को पीछे छोड गई है । अजित वडनेरकर ,अविनाश वाचस्पति ,अल्पना वर्मा ,वाणी गीत , एम.वर्मा, श्रीश श्रीधर पाठक ,सच्चाई, लावण्या,विनोद कुमार पाण्डेय , लोकेश ,ललित शर्मा , सुमन ,पवन चन्दन ,और अली को यह रचना बेहद पसन्द आई । आज नवरात्रि के अंतिम दिन  प्रस्तुत कर रहा हूँ एक संताल आदिवासी परिवार में जन्मी कवयित्री निर्मला पुतुल की कविता । मूल संताली कविता का हिन्दी में रूपांतर किया है अशोक सिंह ने । यह कविता शहरी लोगों के उस चेहरे को बेनकाब करती है जो आदिवासियों को एक दूसरी दुनिया के मनुष्य़ की तरह देखता आया है। स्त्री विमर्श और नारी के लिये घड़ियाली आँसू बहाने वाले तमाम तथाकथित सभ्य लोगों को आईना दिखाती यह कविता ,भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित निर्मला पुतुल के कविता संग्रह “ नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द “ से साभार ।-                           

आपका -शरद कोकास                                                                                                                         
                                            एक बार फिर                               
                        ( अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह का आमंत्रण पत्र पाकर )  
                                                                                                                                                                    


एक बार फिर
हम इकट्ठे होंगे एक विशाल सभागार में
किराये की भीड़ के बीच


एक बार फिर
ऊंची नाकवाली अधकटे ब्लाउज पहनी महिलायें
करेंगी हमारे जुलूस का नेतृत्व
और प्रधिनिधित्व के नाम पर
मंचासीन होंगी सामने


एक बार फिर
किसी विशाल बैनर के तले
मंच से माइक पर चीखेंगी
व्यवस्था के विरुद्ध
और हमारी तालियाँ बटोरते
हाथ उठाकर देंगी साथ होने का भरम


एक बार फिर
शब्दों के उड़नखटोले पर बिठा
वे ले जायेंगी हमें संसद के गलियारों में
जहाँ पुरुषों के अहँ से टकरायेंगे हमारे मुद्दे
और चकनाचूर हो जायेंगे उसमें
निहित हमारे सपने


एक बार फिर
हमारी सभा को सम्बोधित करेंगी
माननीया मुख्यमंत्री
और गौरवान्वित होंगे हम
अपनी सभा में उनकी उपस्थिति से


एक बार फिर
बहस की तेज आँच पर पकेंगे नपुंसक विचार
और लिये जायेंगे दहेज-हत्या ,बलात्कार
यौन-उत्पीड़न
वेश्यावृत्ति के विरुद्ध मोर्चाबन्दी कर लड़ने के
कई –कई संकल्प


एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गलियों से
पुरुष सत्ता के खिलाफ़
हवा में मुट्ठी-बन्धे हाथ लहराते
और हमारे उत्तेजक नारों की उष्मा से
गर्म हो जायेगी शहर की हवा


एक बार फिर
सड़क किनारे खड़े मनचले सेंक सकेंगे अपनी आँखें
और रोमांचित होकर बतियाएँगे आपस में कि
यार,शहर में वसंत उतर आया


एक बार फिर
जहाँ शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
इकठ्ठे हो हम लगायेंगे उत्तेजक नारे
वहीं दीवारों पर चिपके पोस्टरों में
ब्रा-पेण्टी वाली सिने तारिकायें
बेशर्मी से नायक की बाँहों में झूलती
दिखाएँगी हमें ठेंगा
धीरे –धीरे ठण्डी पड़ जायेगी भीतर की आग
और एक बार फिर -
छितरा जायेंगे हम चौराहे से
अपने-अपने पति और बच्चों के
दफ्तर व स्कूल से लौट आने की चिंता में ।
                                - निर्मला पुतुल

37 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चाई को दर्शाती बहुत ही खूबसूरत कविता।

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  2. सच्चाई को दर्शाती बहुत ही खूबसूरत कविता।

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  3. निर्मला पुतुल की कविताएं हमेशा पसंद आती हैं।


    ...यानी अभी बहुत कुछ होना बाकी है
    महिलाओं के कास्मेटिक की
    तरह नारी मुक्ति की कार्रवाइयां....
    ये नज़ारे देखते हुए गुज़रता रहा है वक्त...
    वक्त के साथ चलें
    या उसे बदले...
    सवाल पूछती है स्त्री
    खुद से बचते हुए।

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  4. nirmala puttul ki maine or bhi rachnaye pdhi hai, ye ek stri ki vastavik peeda ko pradrashit karne me sakshm hai, inki ek kvita "baba mujhe mat bayahna us jagah" padh kar mai ro utha tha,vah kavita aaj bhi mai puri nahi padh pata,aankhon me aansu aa jate hai,padhte-pdhate gala rundh jata hai,muh se bol nahi niklate hai,maine hajar kiviyon - kviyatriyon ko pdha hoga lekin nirmala puttul ki baat kuchh or hai,

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  5. जैसे घूमता है पंखा
    वैसे ही घूमते हैं हम
    हम पंखा नहीं हैं
    पर आदतें हमारी
    पंखा ही हैं
    लौट‍ फिर कर
    फिर लौट आना
    यही है दास्‍तां।

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  6. ..हम पहले विजय के त्यौहार मनाते थे,पर अब पर अब हमें , शायद पराजय का उत्सवीकरण भी स्वाभाविक लगने लगा है..कड़ाही में पूड़ी साथ छाननी होगी, पोछने होंगे श्रम के पसीने भी साथ ही और साथ ही गिनने होंगे शेयर्स और अपनी जिम्मेदारियां...भी

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  7. करारा प्रहार है यह दिखावटी स्‍त्री विमर्श के झंडाबरदारों के उपर. निर्मला जी एवं आपको बधाई.

    विजयादशमी की अग्रिम शुभकामनांए.

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  8. एक बार फिर
    ऊंची नाकवाली अधकटे ब्लाउज पहनी महिलायें
    करेंगी हमारे जुलूस का नेतृत्व
    और प्रधिनिधित्व के नाम पर
    मंचासीन होंगी सामने

    तथाकथित आधुनिकता का दम भरने वाली बिना काम किये सुर्खियों में आने के लिए अपने ही अस्तित्व को नजर अंदाज करने वाली महिलाओ के पुरे सच को सामने लती हुई सशक्त कविता |

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  9. और एक बार फिर -
    छितरा जायेंगे हम चौराहे से
    अपने-अपने पति और बच्चों के
    दफ्तर व स्कूल से लौट आने की चिंता में ।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    यहां पर , कवियत्री ने मध्यवर्गीय द्रश्य खींचा है
    चलिए ...
    शुक्र है ,
    के आदिवासी स्त्रियाँ भी
    ( अन्य स्त्रियों की तरह ) ,
    ये भी करतीं हैं ...
    " पति और बच्चों का इंतजार !"
    अन्यथा ,
    यही सोच रही थी के
    शायद आज भी वे ,
    निविड़ जंगल के
    मध्य ,
    महुए के पात एकत्रित कर रहीं होंगीं ...

    --
    - लावण्या

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  10. narmala ki kavita talkh yatharth ko chitri karti hai. utsav ke aadambaro par prahar bhi karti hai. nari ki sthiti badale to behatar varna nagnata ko hi aadhunikta samajh baithi aurate hi nari mukti ka nara lagati hai. nirmla ne aisi aurato par bhi kataksh kiya hai. yah kavita bhi samkaleen kavita ki sahi disha ki or jati hai. badhai...

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  11. शरद जी
    ग्यान जी का चित्र
    अदभुत है. आपकी लेखन-शैली
    भा गई

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  12. स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर जो कुछ आजकल हो रहा है ...उसे करारे व्यंग्य के रूप में उकेरती सुन्दरतम कविता ...दशहरे की बहुत शुभकामनायें ..!!

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  13. ये जीवन का सत्य है ..... इस बात से किसी को परहेज़ नही है पर आज का ये भी सत्य है की नारी समाज के असली मुद्दे को कोई नारी संगठन उठाना नहीं चाहता कुछ नारियां जो अपने आप को प्रगतिशील मानती हैं ........ जो भारत की आत्मा से दूर हैं बस मीडिया में छाए रहने का प्रपंच करती हैं ......... मन को छूती हुए सार्थक और सटीक रचना ,,,,,,,,,, आप सब को विजयदशमी की शुभ कामनाएं

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  14. तथाकथित आधुनिकता, प्रचलित आडम्बरों, दिखावटी सम्मान को पाने का उतावली नारियों का वास्तविक तस्वीर, पुरुष के अहम् तले चकनाचूर होते महिलाओं के अधिकार और सपने, सभी कुछ को एकदम सटीक और नग्न रूप में दिखाने में पुर्णतः कामयाब रही हैं निर्मला पुतुल जी.

    आपको हार्दिक बधाई उनकी इतनी अच्छी रचना से अवगत करने के लिए.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर

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  15. बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने! विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

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  16. satya ko ujagar karti rachna hai ...........sath hi aaj ke samaaj ke moonh par ek tamacha hai ki hum kaise dohri zindagi jeete hain aur dikhavat mein jeete hain .........sirf nari mukit ya nari swatantrata kagzon tak hi simit hai .......ek publicity stunt hai usse aage kuch nhi.
    nirmala ji ko badhayi ........bahut hi shandar vyangya hai.

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  17. बहुत सुंदर लगी कविता, शाय्द आज का एक सच हो....
    आप को ओर आप के परिवार को विजयादशमी की शुभकामनांए.

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  18. अंतिम दिन बड़ा अच्छा रहा. बहन की कविताएं पढ कर खुश हूं, टिप्पणी क्या करूं ?

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  19. कविता में झलकता आक्रोश और निराशा जायज है. लेकिन इन पंक्तियों की चिंता भी नाजायज नहीं कही जा सकती-

    छितरा जायेंगे हम चौराहे से

    अपने-अपने पति और बच्चों के

    दफ्तर व स्कूल से लौट आने की चिंता में ।

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  20. एक बार फिर
    सड़क किनारे खड़े मनचले सेंक सकेंगे अपनी आँखें
    और रोमांचित होकर बतियाएँगे आपस में कि
    यार,शहर में वसंत उतर आया

    सच तो बस इतना सा ही है.............बाकी तो कल्पना है...कुछ हुआ तो हुआ, नहीं हुआ तो नहीं हुआ.......कविता अच्छी है.

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  21. Sharad ji aapko Janmadivas par haardik shubhakaamanayen!!
    is kavita ke liye dhanyavaad..shaasakiya vikendrikaran aur panchayaton me mahila arakshan ke baad se yah do pravrittiyan bharatiya raajneeti mein mil rahi hain..ek jo Nirmala ji ne kavita mein kahi..woh purushvadi mansikata ke liye suvidhajanak bhi hai aur manoranjak bhi..aur doosri jisme apani jameen khud banane ki janddojahad hai aur ek paritartan laane ki chaah..ummeed hai ki aane vale kal ki tasveer jyada saaf-suthri hogi..aur suqoondeh bhi..
    aapke shubh-janmadivas par kuch aur achhi kavitaon se hamara taarruf hoga..ummeed hai.
    Badhaii

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  22. भले ही किसी को कड़वी लगती हों ये बातें लेकिन सौ प्रतिशत सच्चाई लिए हुए है कविता
    बेहतरीन कविता है ये

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  23. भाई हम तो लड्डू पार्सल के लिए अपना पता देने आये हैं | अविनाशजी से पता चला आपका जन्मदिन है | जन्म दिन की शुभकामनाए !!

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  24. शरद जी,
    मेरी तरफ से आपको जन्मदिन की ढेरो शुभकामनाये !

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  25. आपका प्रयास भीड में एकदम अलग नजर आता है।
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  26. शरद जन्म दिन पर बधाई.........मैं भी 30 को ही आया था, बस महीना मार्च का था.....मैं गर्मी लेकर आया और तुम शीतल बयार लेकर आ रहे हो... इसी लिए सारी सृजनशील कवियित्रियाँ तुम्हारे खेमे में हैं... जिओ हज़ारों साल.... अच्छी कविताएँ तो पढवाते रहोगे...

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  27. सब इतना कह ही दिए तो फिर मै तो कहूँगा......
    no comments....

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  28. मुझे भी अपनी शरण में ले लो श्रीमान जी,
    इससे जादा और कम कहना मुशिकल है.
    जारी रहें.


    ---
    हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

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  29. सत्ता के गलियारों के बीच तथाकथित नारी विमर्शों की विचार नपुंसकता और व्यवहारिक व्यर्थता पर एक सीधी टिप्पणी है यह कविता...

    आक्रोश अक्सर अभिव्यंजित होने से रह जाता है...इसलिए सपाट रह जाता है...

    निर्मला जी की सीधी फ़टकार...स्वीकार...

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  30. Aaj aapkie blog par Nirmala Putul, Mita Das aur Jaya jee kee kawitaen padheen naree man ko kitane teevrata se ujagar karatee hian ye kawitaen aur adiwasee auraton kee wyatha to isliye bhee aur geharee hai kiawe janteen hain ki we hee hain Bharteey kehlane kee asalee hakdar.

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  31. यक़ीनन यह एक विचारोत्तेजक कविता है... सोच को कुरेदती है!

    -जितेन्द्र ‘जौहर’
    IR-13/6, Renusagar, Sonebhadra (UP)231218.
    Mobile # +91 9450320472

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