रविवार, जनवरी 24, 2010

इनकी रोशनी में नहीं दिखाई देते अपने दुख दर्द

सिटी पोयम्स मुम्बई श्रंखला के अंतर्गत चार कवितायें 



1.सिटी पोयम्स मुम्बई – ऊँचे टॉवर्स

ऊंचे टॉवर्स की खिड़कियों से
छन छन कर आती रोशनी
भली लगती है

इनकी रोशनी में नहीं दिखाई देते
अपने दुख दर्द

इन रोशनियों के पीछे छुपे दुख दर्द भी
कहाँ दिखाई देते हैं ।


2 . सिटी पोयम्स मुम्बई – झोपड़े  


ऊंची ऊंची इमारतों के सिर पर
मुकुट की तरह सजा है चांद

इसी चांद को देखते हैं हम रोज़
अपने छोटे छोटे घरौन्दों से
इसी से बातें करते हैं हम
इसी से अपने सुख-दुख कहते हैं

कल जब मैं कहीं दूर चला जाउंगा
और हमारी बातें खत्म हो जायेंगी
चांद फिर उसी तरह ऊगेगा आसमान में
लेकिन वह कभी नहीं जान सकेगा
कि झोपड़ों में रहने वालों की पहुँच
आसमानों तक कभी नहीं होती ।










3 . सिटी पोयम्स मुम्बई- जुहू बीच –एक

नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
सिर्फ उन्हे महसूस होता है
जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
बाक़ी के लिये
सुख क्या और दुख क्या ?
 

4 . सिटी पोयम्स –मुम्बई – जुहू बीच – दो

मुठ्ठी से रेत की तरह
वक़्त के फिसलने का बिम्ब
यूँ तो बहुत पुराना है
और उससे भी पुराना है
एक ज़िन्दगी में
प्रेम के व्यक्त न हो पाने का बिम्ब

इसलिये इससे पहले कि यह ज़िन्दगी
दुख की किसी लहर के आने पर
पाँवों के नीचे की रेत की तरह फिसल जाये
कह दो जो कुछ कहना है
इसी एक पल में  ।

                      -शरद कोकास 

( चित्र -गूगल से व शरद के कैमरे से साभार )


 






35 टिप्‍पणियां:

  1. नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
    बाक़ी के लिये
    सुख क्या और दुख क्या ?

    सच लिख दिया आपने तो।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह शरद भाई बहुत अच्छी कविताएँ--

    नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।

    कितनी गहराई है इन पंक्तियों में...

    उत्तर देंहटाएं
  3. साधारण सी लगती कविताएं...
    कुछ बेहतर अभिव्यंजनाओं को समेटे हुए...

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  4. बहुत सुंदर कविताएँ! एक ऐसा अनुभव जो मैं ने और बहुतों ने जिया है।

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  5. अनुभव तो सब करते हैं लेकिन कविता का जामा
    कलाकार ही बैठते हैं ,, यहाँ दिल्ली में रोशनी की
    इसी महानता (?) से मैं भी बावस्ता होता रहता हूँ ,, पढ़कर अच्छा लगा आभार ,,,

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  6. नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते
    इन पंक्तियों को ऊपर विवेक जी और कुलवंत जी भी रेखांकित कर चुके हैं लेकिन क्या करूं, निगाहें केवल इन्हीं पंक्तियों पर ठहर जाती हैं. अतिसुन्दर.

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  7. वाह!! सभी रचनाएँ यथार्थ केधरातल पर दिल को छू लेने वाली


    नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
    बाक़ी के लिये
    सुख क्या और दुख क्या

    कितनी गहरी बात कही आपने...दिल को छू गई.

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक से बढ़कर एक रचनाएँ। लेकिन आखिरी वाली में जिंदगी का फलसफा छुपा है।
    चित्र भी अति मनभावन।

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  9. वाह!!
    बहुत सुंदर रचनाएँ
    बहुत गहराई है पंक्तियों में

    आभार

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  10. इन रचनाओं में ज़िन्दगी के संघर्ष का सौंदर्य बोध दिखाई देता है।

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  11. मुंबई प्रवास ने बहुत अच्छी प्रेरणा दी.... सच को बयाँ करती ..... बहुत सुंदर कवितायें....

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  12. बहुत खूब शरद भईया , कविता लाजवाब रही ।

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  13. बहुत खूब कोकाश साहब , कविता में आपने रंक से राजमहल तक का रंग भर डाला !

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  14. बिलकुल अलग ही नज़र से देखा मुंबई को...कवि मन ने बहुत कुछ सहेज लिया और पहुंचा दिया उनतक...जीवन की आपाधापी में जिनकी नज़रों से छूट जाता है,ये सब.

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  15. यथार्थ के धरातल पर लिखी शानदार कवितायेँ....

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  16. इसलिये इससे पहले कि यह ज़िन्दगी
    दुख की किसी लहर के आने पर
    पाँवों के नीचे की रेत की तरह फिसल जाये
    कह दो जो कुछ कहना है
    इसी एक पल में ।
    लीजिये शरद जी आपकी बात को ध्यान मे रखते हुए मैं तो कहें दे रही हूँ अपने मन की बात. कवि हृदय से खिंची गयी ये मुम्बईया तस्वीर वहां के वाशिंदों का मन टटोलने में सोलह आने सच साबित हुई है. हर एक बात वहां के लोगों के दर्द की कहानी आप ही कह रही है

    नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
    बाक़ी के लिये
    सुख क्या और दुख क्या ?
    ये पंक्तियाँ तो जाने क्या क्या सवाल मन में खड़े कर गई
    बहुत बहुत आभार

    उत्तर देंहटाएं
  17. शरद भाई,
    आपकी तरह , अनुभूतियों को उकेरना सबके बस में कहां होता है !

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  18. रामजाने आपकी तस्वीरों से कविता निकलती है या कविता से तस्वीरें... कैसे कैमरा चलाते हैं और कैसे कलम और कैसे जिहन? मेरे लिए तो ये पोस्ट नहीं एक सबक होती हैं तस्वीरें और कवितायेँ दोनों ही... एक दर्शन होता है... ये सब पढ़ने या देखने के लिए नहीं बल्कि महसूस करने के लिए होता है...
    कृपा बनाये रखें भाईसाब...गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें....
    जय हिंद... जय बुंदेलखंड...

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  19. रेत पर नंगे पाँव चलना उसी को सुखप्रद लगेगा जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ...सही है रोटी का मोल भूखे से ज्यादा कौन जान सकता है ...
    कहना है जो अभी कह दे ...जीवन का ये पल बीत ही जाने वाला है ...कह देते हैं हम भी ...
    विहंगम दृष्टि है आपकी कविताओं में ...हर बार अलग ...हर बार नयी ...!!

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ...!!

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  20. महानगरों में उपजते विडंबनामूलक जीवन का बेहतरीन शब्द-चित्र।

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  21. मुठ्ठी से रेत की तरह
    वक़्त के फिसलने का बिम्ब
    यूँ तो बहुत पुराना है
    और उससे भी पुराना है
    एक ज़िन्दगी में
    प्रेम के व्यक्त न हो पाने का बिम्ब

    इसलिये इससे पहले कि यह ज़िन्दगी
    दुख की किसी लहर के आने पर
    पाँवों के नीचे की रेत की तरह फिसल जाये
    कह दो जो कुछ कहना है
    इसी एक पल में ।


    ये ज्यादा पसंद आयी शायद इसलिए क्यूंकि समय के अनेक मोड़ो से गुजरने के बाद जब झोपडी वाला भी महलो फ्लेटो में शिफ्ट हो जाएगा ......तब भी इससेजुड़ा रहेगा

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  22. वाह भाई शरद जी बहुत सुंदर कहा है आपने.

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  23. बहुत सुन्दर! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  24. सुंदर! प्रेरित करती है खामोश रहने वालों को..

    इसलिये इससे पहले कि यह ज़िन्दगी
    दुख की किसी लहर के आने पर
    पाँवों के नीचे की रेत की तरह फिसल जाये
    कह दो जो कुछ कहना है
    इसी एक पल में ।

    उत्तर देंहटाएं
  25. कई बार उलझन में पड़ जाता हूं ये सोचकर कि एक कवि की नजर ज्यादा पारखी होती है या एक उस्ताद फोटोग्राफर की...

    चारों शब्द-चित्र बहुत अच्छे बन पड़े हैं गुरुवर।

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  26. एक साथ पढ़ने पर ये कवि्तायें एक अद्भुत शब्द चित्र उतपन्न करती हैं…एक सच अपने पूरे उछाह के साथ सामने आता है…उदास कर जाता है…और सोचने पर मज़बूर करता है!!!

    उत्तर देंहटाएं
  27. नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
    बाक़ी के लिये
    सुख क्या और दुख क्या ?

    bahut hi sundar...

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  28. Tasveeron ke saath yatharth ko bahut hi achhe dhang se prastut kiya hai aapne.. Bahut achha lagta hai jab koi is tarah sab ke baare mein sochata hai, likhta hai.....
    Bahut shubhkamna

    उत्तर देंहटाएं
  29. ’आसमान’ की यही परिभाषा मुझे समझ आती है...
    कि झोपड़ों में रहने वालों की पहुँच
    आसमानों तक कभी नहीं होती ।

    एक जानने योग्य जरूरी सच मुखर है इस कविता मे.
    और फिर यह..

    इसलिये इससे पहले कि यह ज़िन्दगी
    दुख की किसी लहर के आने पर
    पाँवों के नीचे की रेत की तरह फिसल जाये
    कह दो जो कुछ कहना है
    इसी एक पल में ।


    ...और इसी एक पल का इंतजार अक्सर जिंदगी से लम्बा नही हो जाता है क्या..लहर-दर-लहर?

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  30. नंगे पाँव रेत पर चलने का सुख
    सिर्फ उन्हे महसूस होता है
    जो कभी नंगे पाँव नहीं चलते ।
    बाक़ी के लिये
    सुख क्या और दुख क्या
    bahut gahri baat kah gaye ,hum to sochte rah gaye is sachchai ko lekar ,bahut khoob sharad ji .vande matram .jai hind.

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  31. कह दो जो कुछ कहना है
    इसी एक पल में .................

    उत्तर देंहटाएं