मंगलवार, जुलाई 10, 2012

1989 की कवितायें -सौदागरों की खोज

इस कविता के बारे में मुझे सिर्फ इतना कहना है ...

 सौदागरों की खोज

महाजन की बही से
अपना नाम कटवाने की खातिर
बैल खेत बहन बेटियों का सौदा करने वाले
विवश लोगों के लिये
सोच सोच कर दुखी होने से बेहतर है
रोटी की लड़ाई में अपनी भागीदारी दर्ज करना
खुद भूखे रहकर
उनका पेट भरने के
आदर्शवाद से बेहतर है
समस्याओं के समन्दर में गोता लगाकर
उन कारणों को ढूँढ लाना
जो जीवन से अधिक
मौत की महत्ता प्रतिपादित करते हैं

एक से दिखने वाले चेहरों के बीच
उन सौदागरों की खोज
साँपों के झुंड में
जहरीली प्रजाति खोजना है

हमारे हाथों के दायरे में हैं
हरे भरे खेत छीन कर
दरारों भरा आकाश थमाने वाले सौदागर
हम अपनी मुठ्ठियों में संजोई
ताकत का वास्ता देकर
उनसे माँगेंगे
अपने खेत
अपने पेड़
और सारा आकाश ।
                        शरद कोकास 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी लगी यह कविता।..वाह! बेहतरीन!!

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  2. सच में, ऐसा ही वातावरण होता है, ऐसा ही परिवेश होता है..

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  3. हम अपनी मुठ्ठियों में संजोई
    ताकत का वास्ता देकर
    उनसे माँगेंगे
    अपने खेत
    अपने पेड़
    और सारा आकाश ।

    काश ऐसा हम करते, कर पाते ।

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