बुधवार, फ़रवरी 10, 2010

दादर पुल पर भीख माँगते हुए भगवान

मुम्बई शहर में दादर इलाका आपने न देखा हो ऐसा हो ही नहीं सकता । मैने बचपन में उर्दू के प्रसिद्ध लेखक कृश्न चन्दर का प्रसिद्ध उपन्यास “दादर पुल के बच्चे “ पढ़ा था । इस उपन्यास में मुम्बई में भिखारियों के गिरोह का वर्णन था । वे किस तरह बच्चों को पकड़ते हैं और उनसे भीख मंगवाते हैं । इस उपन्यास में एक फैंटासी है कि भगवान खुद एक बच्चा बन कर मुम्बई आते हैं और लेखक जो कि एक बच्चा है उसके दोस्त बन जाते हैं । फिर दोनो मिलकर बच्चों से भीख माँगने का धन्धा करवाने वाले गिरोह का पता लगाते हैं लेकिन दोनो ही पकड़े जाते हैं और जब उन्हे पता चलता है कि एक को लंगड़ा और दूसरे को अन्धा बनाकर भीख माँगने के लिये तैयार किया जा रहा है , वे वहाँ से भाग निकलते हैं । एक बच्चा तो सफल हो जाता है लेकिन भगवान पकड़े जाते हैं । उपन्यास का अंत लेखक के इस वाक्य से होता है.. “ एक दिन मैने देखा कि भगवान अन्धे बच्चे के रूप में दादर पुल पर भीख माँग रहे हैं ।
मैने इस उपन्यास को पढ़ने के बाद दादर पुल को देखा और वहाँ भीख माँगते बच्चों में भगवान को ढूँढने की कोशिश की । आप भी कहीं से ढूँढकर यह उपन्यास पढिये और फिर दादर पुल को देखकर वहाँ भगवान को तलाश कीजिये । वैसे दादर पुल के आसपास की भीड़ देखकर आपको वैसे ही भगवान याद आ जायेंगे । मैने इस पुल के आसपास की भीड़ , यहाँ के दुकानदार , फल सब्ज़ी के ठेले और फुटपाथ पर सामान बेचने वालों को हमेशा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करते देखा है । ऐसा नहीं है कि यह शहर हमेशा भागता ही रहता है । यहाँ ठहराव भी है , जीजिविषा भी है और जीने का आनन्द भी है ।
आप आश्चर्य करेंगे के इतनी भागदौड़ ,आपाधापी के बीच भी ज़िन्दगी मुस्कराती है . प्रेम भी पनपता है और प्रेम की कविता भी जन्म लेती है । चलिये , दृश्य तो मैने उपस्थित कर दिया है , अब आप इस प्रेम कविता का आनंद लीजिये । एक कविता सफल प्रेम की और एक कविता विफल प्रेम की  ?

सिटी पोयम्स : मुम्बई - दादर पुल के नीचे

तीखी चुभन भी नहीं थी सर्दियों की हवा में
और पत्ते भी टूट कर नहीं गिरे थे सड़कों पर
एक खुशगवार सी धुन बज रही थी
मन के गिटार पर

यह छुट्टी का एक आवारा दिन था
और सड़कों पर आवाजाही भी नहीं थी

बस एक पुलक सी थी मन में
तुमसे मुलाकात की

दादर पुल के नीचे ठेलों पर रखे फूल मुस्कराये
सेव नाशपाती और केलों ने एक दूजे से कहा
इंतज़ार का फल मीठा होता है ।


सिटी पोयम्स मुम्बई – फुटपाथ

कल मैं इस फुटपाथ पर अकेले चला करती थी
आज तुम मेरे संग चल रहे हो
मेरे साथ फुटपाथ पर चलते हुए तुमने कहा

फुटपाथ के पत्थरों ने मुस्कराते हुए सोचा
कितने ही लोग रोज़ इस तरह कहते हुए
उन पर से गुजर जाते हैं

अगले ही रोज़ वही कदम
फिर किन्ही नये कदमों के संग
नज़र आते हैं ।

                                               - शरद कोकास 
( चित्र गूगल से साभार )

21 टिप्‍पणियां:

  1. अगले ही रोज़ वही कदम
    फिर किन्ही नये कदमों के संग
    नज़र आते हैं ...

    महानगर के कठोर सत्य को फुटपाथ से बेहतर कौन समझ सकता है .... काश फुटपाथ के पर भी शब्द होते .... बहुत लाजवाब लिखा है शरद जी हमेशा की तरह ...........

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  2. फुटपाथ के पत्थरों ने मुस्कराते हुए सोचा
    कितने ही लोग रोज़ इस तरह कहते हुए
    उन पर से गुजर जाते हैं
    अगले ही रोज़ वही कदम
    फिर किन्ही नये कदमों के संग
    नज़र आते हैं ।
    वाह शरद जी आपने सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है! बहुत ही सुन्दर शब्दों से आपने सुसज्जित किया है! दादर पुल के नीचे..ये रचना वाकई में लाजवाब लगा! बढ़िया पोस्ट!

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  3. सभी अंदाज़-इ-कविताई प्यारे हैं.
    हम मगर इसी हकीक़त के मारे हैं...

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  4. वैसे दादर पुल के आसपास की भीड़ देखकर आपको वैसे ही भगवान याद आ जायेंगे । मैने इस पुल के आसपास की भीड़ , यहाँ के दुकानदार , फल सब्ज़ी के ठेले और फुटपाथ पर सामान बेचने वालों को हमेशा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करते देखा है । ऐसा नहीं है कि यह शहर हमेशा भागता ही रहता है । यहाँ ठहराव भी है , जीजिविषा भी है और जीने का आनन्द भी है ।
    Mahanagar ka Vastavik aina saath mein bahut achhi rachna....

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  5. पता नहीं क्यों , दूसरी कविता ख़त्म होते वक्त सब कुछ ठहर सा गया अन्दर कहीं !

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  6. गहरे, बहुत गहरे...न जाने कहाँ ठहरे हुए

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  7. दादर पुल के नीचे..ये रचना वाकई में लाजवाब लगा! बढ़िया पोस्ट!

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  8. जब किशोर थे तब भगवान् को ढूंढते थे .ओर चंदर को भी पढ़ते थे .अब जानते है के भगवान् ओवर लोड है .....कविताएं दिलचस्प है ....

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  9. आजकल दूसरी कविता ज्यादा चरितार्थ होती है।
    अच्छी प्रस्तुति।

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  10. वाकई इंतज़ार का फल मीठा होता है...
    बेहतर...कविताएं...

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  11. वाह !
    अगले ही रोज़ वही कदम
    फिर किन्ही नये कदमों के संग
    नज़र आते हैं ।

    और जिंदगी चलती रहती है । पुलों और फुटपाथों पर ।

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  12. आप के ब्लॉग को की चर्चा तेताला पर की है देखे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084
    http://tetalaa.blogspot.com/2010/02/blog-post_7641.html

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  13. प्रसिद्ध उपन्यास “दादर पुल के बच्चे “ का मार्मिक चित्रण बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया है पढते ही मन में खलबली सी मच गई,.... साथ ही साथ दोनो रचनाएं भी लाजबाव हैं!!!!

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  14. कब से चंदर को नहीं पढ़ा...इस जिक्र ने उनकी वह किताब पढने की उत्कंठा और बढ़ा दी....आपकी कवितायें मुंबई को अलग नज़र से देखने को मजबूर करती हैं...

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  15. शरद जी आपकी दोनों कवितायेँ सघन अनुभूतियों से भीगी हुई हैं और प्रेम के शाश्वत दर्शन को परिभाषित कर रही हैं . मेरी हार्दिक बधाई .

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  16. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

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  17. इंतजार का फल तो मीठा ही होता है तभी तो आपके ब्लॉग पर इतनी देर से पहुंची.बहुत खूबसूरती से बया कर दी है दिल की बात
    बहुत प्रभावशाली रचना सुंदर दिल को छूते शब्द

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