शनिवार, अक्तूबर 24, 2009

यह अक्तूबर का चमकदार उतार है


आज 24 अक्तूबर है .. हवा में कल रात थोड़ी ठंडक महसूस की मैने .. खिड़की से हवा का एक झोंका आया और उसने कहा .याद है तुम्हे, तुम्हारे मित्र कुमार अम्बुज ने इन्ही  दिनों के लिये एक कविता लिखी थी ..‘ अक्तूबर का उतार ‘.. अरे हाँ ,मुझे याद आया , मैने रैक से अम्बुज का वह संग्रह निकाला “ किवाड़ “ उसीमें से यह कविता पढ़ रहा हूँ .जो कुमार अम्बुज  ने 1988 में लिखी थी ....आप भी पढ़िये मेरे साथ..

                                                            अक्तूबर का उतार

छतों पर स्वेटरों को धूप दिखाई जा रही थी
और हवा में
ताज़ा धुले हुए चूने की गन्ध
झील में बतख़ की तरह तैर रही थी
यह एक खजूर की कूची थी जिसके हाथों
मारी जा चुकी थी बरसात की भूरी काई
और पुते हुए झक्क-साफ मकानों के बीच
एक बेपुता मकान
अपने उदास होने की सरकारी-सूचना के साथ
सिर झुकाये खड़ा था
टमाटरों की लाली शुरू होकर
चिकने भरे हुए गालों तक पहुंच रही थी
अंडे और दूध का प्रोटीन जेब खटखटा रहा था
खली और नमक की खुशबू
पशुओं की भूख में मुँह फाड़ रही थी
आदम-इच्छाओं में शामिल हो रहा था
हरे धनिये का रंग और अदरक का स्वाद
बाज़ार में ऊन और कोयले के भाव बढ़ रहे थे

रुई धुनकने वाले की बीवी के खुरदरे हाथ
सुई-डोरे के साथ
रज़ाई-गद्दों पर तेज़ी से चल रहे थे
( यही वह जगह होती है जहाँ सुई तलवार से
और डोरा रस्सी से बड़ा हो जाता है )
बढ़ई की भुजाओं की मछलियाँ
लकड़ी को चिकना करते हुए
खुशी से उछल रही थीं
तेज़ हो रही थी लोहा कूटने की आँच
खुल रहे थे बैलगाड़ियों के रास्ते
आलू की सब्ज़ी शाम तक चल जाने लायक इन दिनों में
एक मटमैली चिड़िया अपनी चोंच से
बच्चे की चोंच में दाना डाल रही थी

रावण का पुतला सालाना जश्न में जल चुका था
मगर आसमान में बारूद और आवाज़ें बाकी थीं
बाकी थी रोशनी और सजावट के लिये कुछ जगह
थोड़ी सी जगह
बच्चों के खेल के लिये निकल आई थी
और थोड़ी-सी पेड़ के नीचे एक बेंच पर

इस रोनी दुनिया में
मुस्कराये जाने की गुंजाइश के साथ
इमली का पेड़ लगातार हिल रहा था

यह सर्दियों की चढ़ाई थी
जब मकड़ियों के घर उजड़ रहे थे
और अक्तूबर का यह चमकदार उतार था
जिस पर से एक पूरा शहर फिसल रहा था

जैसे रिसक-पट्टी से फिसलता है
एक बच्चा  !

- कुमार अम्बुज

तो आप भी बक्सों से स्वेटर रज़ाई,कम्बल निकाल लीजिये और उन्हे धूप दिखाइये । और हाँ ..एक बात और कुमार अम्बुज कवि होने के अलावा एक चिंतक भी है । विगत दिनों धर्म को लेकर ब्लॉग्स पर एक बहस चली थी । शायद इसका सार्थक जवाब यहाँ मौजूद हो .. इस ब्लॉग कुमार अम्बुज में ।- आपका शरद कोकास
 (चित्र गूगल से साभार )

40 टिप्‍पणियां:

  1. bahut achchi lagi yeh kavita......

    Aaj UNO day bhi hai...... aur is baat ka bada surprise hua hai..... ki blog jagat pe iski charcha hi nahi hai...... aaj hi ke din aaj se 5 saal pehle HINDI ko UNO ki OFFICIAL bhaasha ke roop mein apnaya gaya tha..... maine socha ki main hi likhoon ..... Lekin yeh khud mere dhyaan mein abhi aapke dwara 24 October likhe gaye se dhyaan aaya..... aur mujhe bahut afsos hai ki main HINDI ki is uplabdhi ko saamne nahin la paaya.... Aaaj ke hi din United nations mein HINDI day bhi manaya jata hai....

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  2. इस रोनी दुनिया में
    मुस्कराये जाने की गुंजाइश के साथ
    इमली का पेड़ लगातार हिल रहा था

    कही तो कोई तो मुस्कराहट की संभावनाएँ संजोये हुए है.

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  3. हम तो धूप लगा भी चुके ...पूरी कविता सर्दियों की कुनकुनी धूप की आहट को महसूस कराती सी लगी ...कुमार अम्बुज के परिचय का आभार ...!!

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  4. Lagta hai us saal diwali aur dussehra late the !!
    :)
    aur ye dusehra aur diwali ke beech ke dino main 'Insert' ki gayi hogi !

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  5. बहुत सुन्दर कविता है।

    ये न थी हमारी किस्मत कि रजाई,कंबल, स्वैटर को धूप दिखा पाते!
    जमाने से ऐसी जगहों में रह रही हूँ जहाँ ठंड नहीं पड़ती।
    घुघूती बासूती

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  6. हर हरफ कुछ कहता है। दिल को छूकर निकल गई कविता।

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  7. सही वक्त पर सही कविता है। सर्दियाँ वाकई आरंभ हो गई हैं। स्वेटर कुछ ही दिनों में निकल आएँगे बाहर और सुबह शाम धूप सुहानी हो उठेगी।

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  8. अजी हम ने तो कभी राजाई रखी ही नही, रोजाना रजाई की जरुरत पडती है, फ़िर स्वेटर से हमारे यहां काम नही चल सकता.... अजी जाकेट वो भी बहुत गर्म..
    आप की कविता बहुत सुंदर लगी, पुरानी यादे याद आई जब पुराने स्वेटर उधेड कर मां पुरानी ऊन से हमारे लिये नये नये माडल के स्वेटर बुनती थी, ओर भी बहुत कुछ.धन्यवाद

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  9. समय पर उचित सलाह के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया !

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  10. प्रिय कवि की कवितायेँ बार बार पढना अच्छा लगता है.
    अक्टूबर से यहाँ भी निस्बतन अच्छे दिन शुरू हो जाया करते हैं.

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  11. bahut hi sundar man ko bhigo gai hmare apne jeevan ki sachhi kavita .maousam ka bdlna bhi hmare liye utsav ki tarh hota hai .kash ki ye sab bna rhe vikas ki bhent nhi chdhna ab hme .

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  12. इतनी सुंदर रचना बांटने के लिए आभार.

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  13. मौसम और जीवन के उतार चढाव का अच्छा वर्णन.
    वैसे गर्मियों से सर्दियाँ बेहतर लगती हैं. जितना चाहो पहन तो सकते हैं.

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  14. इस रोनी दुनिया में
    मुस्कराये जाने की गुंजाइश के साथ
    इमली का पेड़ लगातार हिल रहा था

    बहुत खूब सुन्‍दर शब्‍द रचना अच्‍छा लगा कुमार अम्‍बुज जी इस रचना को, आपका आभार जो आपने इसे प्रस्‍तुत किया ।

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  15. अच्छा लगा कुमार अम्बुज जी को पढ़ना.

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  16. बहुत ही अच्छा अनुभव रहा कुमार अम्बुज जी को पढ़ना !
    आपका आभार

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  17. अरे इसे पढके मुझे भी कितना कुछ याद आया
    किवाड खोल ली है और जल्द ही कुछ प्रस्तुत करुंगा।

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  18. बहुत ही अच्छा कुमार अम्बुज जी को पढ़ना !
    आपका आभार

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  19. -कुमार अम्बुज जी की कविता ने शरद आगमन की हलचल का विवरण दे दिया.

    -यहाँ भी मौसम बदल रहा है..सुबह शाम ठंडी हवा है.. दिन में तो अभी भी ऐ सी की ज़रूरत होती है.

    -'गरम कपडे धूप सेंकने निकल पड़े हैं. '

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  20. बहुत ही सुंदर और शानदार रचना लिखा है आपने! कुमार अम्बुज जी को पढ़कर अच्छा लगा! मुझे तो सर्दी का मौसम बेहद पसंद है और इसी वजह से आपका ये पोस्ट मुझे बहुत पसंद आया! एक से बढ़कर एक तस्वीरें, लाल लाल टमाटर के तो क्या कहने!

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  21. इस रोनी दुनिया में
    मुस्कराये जाने की गुंजाइश के साथ
    इमली का पेड़ लगातार हिल रहा था ....muskurhat pe ik or post padhi...मेरी कल्पना में
    अक्सर जीवित हो उठता है वो दृश्य
    जिसमें छह अरब लोग
    एक साथ मुस्कुरा रहे हैं....

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  22. waqayi bahut achchi rachna padhayi hai aapne
    ab to bharat mein sardi aa rahi hai
    kavita sajeev ho gayi

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  23. रावण का पुतला सालाना जश्न में जल चुका था
    मगर आसमान में बारूद और आवाज़ें बाकी थीं
    बाकी थी रोशनी और सजावट के लिये कुछ जगह
    थोड़ी सी जगह
    बच्चों के खेल के लिये निकल आई थी......

    सब कुछ होने के बावजूद आशा बाकी रहती है .......... मौसम khilta है ....... sardi आती है ...... shashakt रचना है ...

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  24. शरद, कुमार भाई का संग्रह् किवाड़ वैसे भी मेरा पसंदीदा काव्य संग्रह है, तुमने आज आलमारी से निकाल पलट्ने पर मज़बूर कर दिया, इसी में पिता पर भी एक कविता है, जिक्र करोगे तो अच्छा लगेगा.. - अय्यर्

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  25. Babli ने कहा…
    बहुत ही सुंदर और शानदार रचना लिखा है आपने! कुमार अम्बुज जी को पढ़कर अच्छा लगा! मुझे तो सर्दी का मौसम बेहद पसंद है

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  26. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  27. " bahut hi acchi lagi kavita "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  28. aapki pratikriya aur sujhaav ka shukriya! ambuj ji ki sardi ki taiyari achchi lagi :-)

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  29. बहुत बढिया लगा ये अक्तूबर का उतार जिस पर सारा शहर खुशी से फिसल रहा है । जिंदगी की इन छोटी छोटी खुशियों में कितना सुख है ।

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  30. शरद जी, आप संजय भाई के ब्लॉग पर खोटा पता छोड़ आये, मैंने कोई तीन बार कॉपी पेस्ट किया पर सीधे विकि के पास पहुँच गया. आपका ब्लॉग समृद्ध है और कविताए मानवीय भावनाओं की पोषक.

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  31. सम-सामयिक रचना

    धुप दिखाई जा रही है...........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  32. अमित के. सागरने मेल से टिप्पणी भेजी है
    Amit K. Sagar to me
    show details 9:25 PM (18 hours ago)
    ब्लॉग पर न जाने क्यों टिपण्णी छाप ही नहीं रही थी...इसलिए यहाँ लिख भेज रहा हूँ.
    ---
    आपकी रचना में चीज़ों की समावेश्ता भी एक अलग ही तरह की विशिष्टता है!
    जारी रहें.

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  33. अम्बुज साब को खूब पढ़ा है।

    "एक बेपुता मकान अपने उदास होने की सरकारी-सूचना के साथ" जैसे इमेज वो ही क्रियेट कर सकते हैं।

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  34. और अक्तूबर का यह चमकदार उतार था
    जिस पर से एक पूरा शहर फिसल रहा था

    जैसे रिसक-पट्टी से फिसलता है
    एक बच्चा !

    हाँ बच्चे का यह फ़िसल-पट्टी पे फिसलना, किसी अधपिघली आइस्क्रीम को मुंह मे रखने की तरह है..जिसका स्वाद आना शुरू करने से पहली ही वह गायब हो जाती है,,और छोड़ जाती है बस एक बार और..की ख्वाहिश..अपना तो अनुभव ऐसा ही रहा ;-)

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