शुक्रवार, सितंबर 25, 2009

मै निर्वसना तट पर स्वप्न देखती देह का


ब्रज मोहन श्रीवास्तव,राह भाटिया,शोभना चौरे, हेमंत कुमार,और अभिषेक ओझा को छठवें दिन प्रकाशित निर्मला गर्ग की कविता “ चश्मे के काँच “ बेहद पसन्द आई । गिरीश पंकज ने कविता पर कविता में अपनी टिप्पणी देते हुए कहा “ बूढ़ी आँखों पर चश्मा / केवल चश्मा नहीं होता /वह थकी उदास आँखों का एक घोषणापत्र होता है । “एम.वर्मा ने कहा “उनका क्या करें जो वक़्त के पहले ही इस अहसास से बूढ़े हो चुके हैं । “ बबली ने बहुत व्यथित हृदय से लिखा है “लोग कोशिश भी करते हैं कि अपनी जवानी बरकरार रहे लेकिन उम्र छिपाई नहीं जा सकती ।“ आशा जोगलेकर ने इस पंक्ति को रेखांकित किया “ यही खयाल बूढ़ी का प्रेम के विषय में भी है ।
            नवरात्र के सातवें दिन प्रस्तुत कर रहा हूँ सुविख्यात कथाकार एवं कवयित्री जया जादवानी की कुछ छोटी छोटी कवितायें । स्त्री के मन को प्रकट करने के लिये अधिक शब्दों की ज़रूरत नहीं है । केवल 4 या 5 पंक्तियों की यह कवितायें अपने आप में असीमित विस्तार लिये हुए हैं । इनमें छुपे अर्थ तलाशने की कोशिश करें ।  - आपका -शरद कोकास                                                                                      

नवरात्रि पर विशेष कविता श्रंखला-समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें-सातवाँ दिन


स्त्रियाँ                                                                                                   
एक
 

वे हर बार छोड़ आती हैं
अपना चेहरा
उनके बिस्तर पर
सारा दिन बिताती हैं
जिसे
ढूँढने में
रात खो आती हैं ।

दो 




जैसे हाशिये पर लिख देते हैं
बहुत फालतू शब्द और
कभी नहीं पढ़ते उन्हे
ऐसे ही वह लिखी गई और
पढ़ी नहीं गई कभी
जबकि उसी से शुरू हुई थी
पूरी एक किताब ।


तीन



वह पलटती है रोटी तवे पर
और बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया
खड़ी रहती है वहीं की वहीं 
स्त्री 
तमाम रोटियाँ सिंक जाने के बाद भी  ।

                                                                                       
देह स्वप्न                                                                                   

ले गया कपड़े सब मेरे
दूर.... बहुत  दूर
काल बहती नदी में
मैं निर्वसना
तट पर
स्वप्न देखती देह का ।
                                                                                                                                                  

अनंत में देह                               

एक पीले पड़ गये पत्ते पर
लिखती हूँ तुम्हारा नाम
देती हूँ उसे हरियाली
कोई दरवाज़ा खटखटाके माँगने आया है
उम्र मेरी ।

                                                                                                                                    
बचा लूंगी उसे                                                   

एकदम भभक कर बुझने से पहले
मैं बचा लूंगी उसे
हाथों की ओट से
ऐसे कैसे जायेगा प्रेम
मेरी असमाप्त कविता छोड़कर ।

खुद को                                                    

उठाती हूँ जल
अंजलि में
वरती हूँ खुद को
खुद से ।

जया जादवानी                                                                              
 

29 टिप्‍पणियां:

  1. वह पलटती है रोटी तवे पर,और बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया
    खड़ी रहती है वहीं की वहीं,
    शरद भाई,आप का आभार,निहायत ही उम्दा कविताओं को आप लेकर आ रहे हैं,जया जादवानी जी की कविताओं में बहुत ही गहराई हैं,मैं जितना पढ़ता गया उतना ही स्क्रीन मेरी आँखों से ओझल होते चला गया जैसे,ये आखर नही एक चलचित्र हैं,शायद डूब ही गया था-अंतहीन गहराई में,दुनिया को पलटने की ताकत तो हैं,नि:संदेह, जया जी को बधाई,

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  2. जैसे हाशिये पर लिख देते हैं
    बहुत फालतू शब्द और
    कभी नहीं पढ़ते उन्हे
    ऐसे ही वह लिखी गई और
    पढ़ी नहीं गई कभी
    जबकि उसी से शुरू हुई थी
    पूरी एक किताब ।

    इस से अधिक एक औरत का सच और कुछ हो ही नहीं सकता ..बहुत बहुत शुक्रिया आपका शरद जी इनको पढ़वाने के लिए

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  3. वह पलटती है रोटी तवे पर
    और बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया
    खड़ी रहती है वहीं की वहीं
    स्त्री
    तमाम रोटियाँ सिंक जाने के बाद भी ।
    in panktiyo me smuchi stri ka astitv aa gya hai .bete ki noukri lg gai hotal ka khana khayega shadi kar do ,beta shahr me pdhta hai roti kha hotal me khyga ak choti grhsthi lkekar maa chal di roti bnane ,roti ke ird gird ghumti stri .
    sashkt rachna .

    उत्तर देंहटाएं
  4. ले गया कपड़े सब मेरे
    दूर.... बहुत दूर
    काल बहती नदी में
    मैं निर्वसना
    तट पर
    स्वप्न देखती देह का ।
    jayaji ko bhut bhut badhai aourt ke antman ko hubhu ukerne ke liye .
    behd prbhavi abhivykti.

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  5. har abhivyakti aisi ki shabd kho jayein magar satya ko na pakad payein..........kitni gahanta hai ek -ek abhivyakti mein..........sach kaha ek stri ka jeevan aur uska darshan dono ko bahut hi saral tarike se bhavon ki gahanta ke sath ujagar kiya hai..........naman hai aapke lekhan ko.har abhivyakti itni shandar hai ki kisi ek ki tarif karna doosri ke sath anyaay ho jayega.

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  6. bahut hi sundar rachana hai.....
    आप अब देते है भी किसी ब्लॉग पर अपनी कमेंट्स देंगे तो आप अपने फोटो को भी जोड़ सकेगें , ब्लॉगर के दसवे जन्मदिवस पर मिलने वाले इस तोहफे से ब्लॉगर बहुत खुश है। इस मसले पर जब मैंने एक ब्लॉगर से इमेल के जरिये ये पूछा की यह सुविधा कैसी है तो उन्होंने ये कहा की यह जानकारी तो उन्हें मुझसे पहले ही हो चुकी है
    Read More >>

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  7. एकदम भभक कर बुझने से पहले

    मैं बचा लूंगी उसे

    हाथों की ओट से

    ऐसे कैसे जायेगा प्रेम

    मेरी असमाप्त कविता छोड़कर ।



    स्नोवा की कविताएं ?

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  8. शरद जी, सभी कविताओं का चयन आपने पूरे मन से किया है,
    इनमे से एक कविता मुझे बहुत पसंद आई
    एक पीले पड़ गये पत्ते पर .....
    और ये सभी कवितायेँ, किसी महिला के बारे में बहुत बताती हैं , नज़दीक लाती है
    बहुत बहुत धन्यवाद

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  9. सभी कविताये बेहद पसंद आई.
    प्रत्येक कविता से कुछ- कुछ चुरा कर कुछ यूँ देख रहा हूँ.........

    उठाती हूँ जल
    अंजलि में
    एकदम भभक कर बुझने से पहले
    मैं बचा लूंगी उसे
    वह पलटती है रोटी तवे पर
    और बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया
    कोई दरवाज़ा खटखटाके माँगने आया है
    ले गया कपड़े सब मेरे
    दूर.... बहुत दूर

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  10. alag rang ki kavita. jaya ki apni shaili me. lekin abhi bhi us kavita ki talash hai, jo vavratr ke naya arth de sake. stri ko bhi.

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  11. निःशब्द हूँ । मौन ही बेहतर हूँ ।

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  12. सभी कवितायेँ लाजवाब हैं ...
    कुछ सम्मानित ब्लोगर्स बहुत अकड़ कर कहते रहे हैं..हम तो कविताओं के ब्लॉग की ओर झांकते भी नहीं.. महिलाएं सिर्फ कहानियां और कवितायेँ ही लिखती हैं इसलिए मैं उनके ब्लॉग पर जाता ही नहीं ..
    यदि महिलाएं सिर्फ ऐसी कवितायेँ ही लिख सकती हैं ...तो बेहतर होगा की वे कविताओं के सिवा और कुछ लिखें भी नहीं ...महज कुछ पंक्तियों में इतनी बेहतर अभिव्यक्ति लेखन की किस विधा में होगी ...ईश्वर ही जाने
    लेखन की हर विधा में धाक ज़माने ब्लॉगजगत के महापुरुष श्री शरद कोकस महिलाओं की कवितायेँ पढ़ा रहे है ...कविताओं की इससे बेहतर सार्थकता कहाँ होगी ..!!

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  13. आभार बडे भाई, मैं जया जादवानी जी की कहानियों से ही परिचित था. आज उनकी कवितायें पढ कर, उनकी कविताई चिंतन से परिचित हुआ.

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  14. बहुत गहरी बात कही गई है रचना के माध्यम से.. आभार इस प्रस्तुति के लिए
    हैपी ब्लॉगिंग

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  15. एक पीले पड़ गये पत्ते पर
    लिखती हूँ तुम्हारा नाम
    देती हूँ उसे हरियाली
    कोई दरवाज़ा खटखटाके माँगने आया है
    उम्र मेरी ।


    sharad bhaiya.......... in lines ne to poora antarman hila diya......

    bahut hi khoobsoorat collections hain.......

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  16. sabhi ki sabhi rachnayein bahut ucch koti ki lagi..
    Sharad ji hriday se dhnyawaad inhen padhwaane ke liye.

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  17. उठाती हूँ जल
    अंजलि में
    वरती हूँ खुद को
    खुद से । nice

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  18. छोटी-छोटी सुन्दर कविताएँ......मन में कहीं गहरे उतर जाती हैं......जया की कविताएँ पढवाने के लिए तो शरद का धन्यवाद करना ही होगा..

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  19. jaya kyu baar baar meri hi baat keh jati ho....yehi khoobsoorti hai tumhari rachna mein.

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  20. jAYA JE KI KAVITAYE SACHMUCH EK BARGI VICHARNE KO UKSATI HAI...

    SHARAD JI SANKAAN KA ABHAAR SWEEKAREN.

    SATYA.

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  21. tum hi tum ho is is jivan me .tabhi to kavitaye bhi hai hum jaise pathak bhi hai jo kalam uthane ko majaboor ho jate hai .kavita tum me samai hai ya kavita me tum alag karna jurm se kum n hoga. sarad is kam ki jitani bhi tarif ki jai kum hi hai .subh janmadin subh dasahara .

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  22. एकदम भभक कर बुझने से पहले

    मैं बचा लूंगी उसे

    हाथों की ओट से

    ऐसे कैसे जायेगा प्रेम

    मेरी असमाप्त कविता छोड़कर ।

    atyant sunder abhivyakti....is kavita ko padne ke baad kahne ko kuchh nahi rahta....

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  23. आप ने तो गम्भीर व करूण भावों को उन गहरे अर्थों में लिख दिया जिसए समझनें में मुझे शायद बहुत वक्त लगे!

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  24. सभी रचनाओं का स्तर बहुत अच्छा लगा. भावों में ताज़गी है.

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