मंगलवार, सितंबर 22, 2009

मुझे एक बलात्कारी से गर्भ धारण करना है

नवरात्रि पर्व पर विशेष कविता श्रंखला -समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें-चौथा दिन  


नीलेश रघुवंशी की कविता “हंडा” के विषय में अशोक कुमार पाण्डेय कहते हैं “औरत के पूरे सामाजिक आर्थिक परिवेश में स्थान तलाशने की जद्दोज़ेहद कविता के पूरे सौष्ठव में उपस्थित है।वहीं अजय कुमार झा का कहना है “कवयित्री ने हंडे में नारी जीवन का सारा सारांश समेट कर रख दिया है । “शोभना चौरे और निर्मला कपिला इसे ग्रामीण महिला का जीवन दर्शन मानती है ।लोकेन्द्र इस हंडे में पूरा नारित्व देखते हैं । हेम पाण्डेय का कहना है “यह स्थिति के बदलाव हेतु सार्थक शुरुआत है । चन्द्र कुमार जैन का  कहना है “यह प्रस्तुति कविता में बची हुई गंध जैसी प्रतीत हो रही है । “ मुकेश कुमार तिवारी ने कहा “कविता हंडे में रचे बसे हुये संसार में स्त्री देहमुक्त हो अपने वुजूद को तलाशती विवश है।“ ललित शर्मा ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे छत्तीसगढ़ी में हंडे की की नियति बताते हुए कहा है कि ” शरद भाई,अब जमाना बदल गे भाई पहिली जैसे नई ये कड़हा,रहे के कनवा रहय सबे बेचा जाये। “ अमलेन्दु अस्थाना,योगेश स्वप्न और राज भाटिया जी को जहाँ यह कविता पसन्द आई है वहीं रवि रतलामी जी ने पहली बार मेरे इस ब्लॉग पर कदम रखकर मेरे ब्लॉग बुखार को नियंत्रित करने के लिये मुझे आवश्यक तकनीकी सलाह दी है । मै उनके प्रति आभारी हूँ ।
            आज नवरात्र के चौथे दिन प्रस्तुत है कवयित्री शुभा की यह कविता जो मैने अनामिका द्वारा सम्पादित संकलन “ कहती हैं औरतें “ से ली है । साभार –  शरद कोकास                                                                                               


                                                              मै हूँ एक स्त्री                                              
मै हूँ एक स्त्री                                                                                                  
कौन कह सकता है मैं शर-विध्या सीखना चाहती  हूँ                                                  
मैं उस धूर्त और दयनीय ब्राह्मण दोणाचार्य की मूर्ति भी नहीं बना सकती                           
क्योंकि वह पर पुरुष है                                                                                       
मैं एकलव्य नहीं बन सकती                                                                                 
मेरा अंगूठा है मेरे पति का                                                                                  
                                                                                                                                               
मैं शम्बूक भी नहीं बन सकती                                                                              
क्योंकि मुझे एक बलात्कारी से गर्भ धारण करना है                                                   
एकलव्य और शम्बूक मैं तुम्हारे एकांत से                                                                
ईर्ष्या करती हूँ                                                                                               
क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ और ब्राह्मणों की दुनिया                                                         
भंग करना चाहती हूँ                                                                                       
                                                                                                                                             

                      शुभा                                                                                     

17 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं उस धूर्त और दयनीय ब्राह्मण दोणाचार्य की मूर्ति भी नहीं बना सकती
    क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ और ब्राह्मणों की दुनिया भंग करना चाहती हूँ"

    शरद जी यहाँ कविता में निर्दिष्ट ब्रह्मण शब्द का उपयोग मैं स्पस्ट रूप से नहीं समझ पा रहा हूँ,
    ये ठीक हैं की छल एवं उत्पीडन के विरुद्ध आक्रोश पूर्ण प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक हैं, हाँ एक समय था इतिहास में जब समाज के भाग्य की विधाता तीन शक्तियां होती थी. मठ+सेठ+शठ(शासक) इन तीनो का गठ बंधन ही समाज की दिशा तय करता था, आज भी यही हैं,सिर्फ नाम बदले हैं,
    बहुत सुन्दर सारगर्भित शब्दों को पिरोया हैं इस कविता में (काव्यं करोति कविनाम,अर्थ जानति पंडितः)

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  2. ये एक आक्रोश से जन्मी बहुत भावमय कविता है।

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  3. shubha ki kavita ativaad ke garbh se paida hui hai isliye uske chintan me ek tarah ki arajkta bhi nazar aati hai. kavita jab ghrina paida karti hai ya aatmsamarpan karti huee prateet hoti hai to vah chhoti ho jati hai, jab vah peeda aur moolyjanit vidroh ke saath abhivyakt hoti hai to badi ho jati hai. balaatkari se garbh dharan karne ki khwahish balatkar ke viruddha aakrosh ke sampreshan me to safal deekati hai lekin kavita ko kavita bana pane me vifal lagti hai. anamika aur katyayani jaisi shili aur bhavabiyakti iss kavita me nazar nahi aati, fir bhi kavita ka swagat karoonga ki kavyitri gusse me hi sahi, hastakshep to kar hi rahi hai.

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  4. sharad ji, maine padha, shabd bahut achche pryog kiye hai aapne ..bhav bhi achche par mere samajh me jyada nahi aaya...aapki lekhani me koi shaq nahi..isliye aapko badhayi..main agali lekh ka intzaar karunga...

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  5. अद्भुत कविता
    हज़ार साल का गुस्सा अपनी पूरी स्वाभाविक तुर्शी के साथ सामने आया है। ब्राह्मण शब्द का प्रयोग स्पष्टतः सत्ता से नाभिनाल्बद्ध उस पुरोहित वर्ग के लिये है जिसने न जाने कितने एकलव्यों के अंगूठे कटवा लिये ( संकोच पूर्वक बताना चाहता हूं कि पिछले दिनों असुविधा पर पोस्ट की गयी एक कविता में यह संन्दर्भ आया था) इसमें ना समझने वाली क्या बात है मै नही समझ पाया!!! वह पुरोहित वर्ग सामंतवाद की विदाई के बाद पूंजीवादी युग में भी नष्ट नहीं हुआ बल्कि मूलाधारों में सुरक्षित रहा और आज नव साम्राज्यवादी रूप में दक्षिणपंथ के उभार के साथ फिर सर उठा रहा है अन्यान्य रूपों में।

    यह कविता उसका सार्थक प्रतिरोध करती है।
    आभार अनामिका जी का और आपका और बधाई शुभा जी को

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  6. क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ और ब्राह्मणों की दुनिया भंग करना चाहती हूँ
    शरद जी कविता हमे समझ नही आई, आक्रोश ब्राह्मणों से है, या पुरषो से, या समाज से, वेसे ही कविता समझ नही आती ओर उपर से इतनी कठीन, कृप्या कुछ रोशनी जरुर डाले
    धन्यवाद

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  7. आक्रोश जब ज्वालामुखी की तरह फटता है, तब ऐसी कविता का जन्म होता है.

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  8. बस इतना ही कहूँगी.....अतिप्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति....आभार आपका..

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  9. राज जी वास्तव में इस कविता को नहीं समझ पाए।
    कविता अच्छी है। 'ब्राह्मणों की दुनिया' एक दम नवीनतम प्रयोग है। लोगों को इसे आत्मसात करने में समय लगेगा।

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  10. आक्रोश की अभिव्यक्ति शायद इस प्रकार ही होती है, पूरा पूरा और शुद्ध शुद्ध कहने के लिए दिल और दिमाग स्थिर नहीं रहते...

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  11. पूरी तरह दिग्भ्रमित करने वाली कविता है. इसकी हर पंक्ति भावार्थ में दूसरे के उलट है. मिथकों का इस्तेमाल बिना उनका अर्थ समझे करने पर यही नतीजा निकलता है. आक्रोश वगैरह ठीक बात है.

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  12. आक्रोश के शब्द ..............
    पढ़ कर सर शर्म से झुक गया.
    इन्सान होने पर लानत महसूस हुई.

    हे भगवान ये किस समाज का अंग बना दिया हमें.
    अव्रात्रि के चार दिन में ही आँख खुल गयी, शायद माँ दुर्गे की कृपा का प्रतिफल है....

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  13. क्या करें ....शरीर पर मरहम लगता है तो
    आत्मा छिलती है ....यही कारन है ..
    की स्त्री को शम्बूक से इर्ष्या होती है !
    शम्बूक के लिए कितने प्रश्नचिंह रहे होंगे ,
    मरते दम तक ! बलात्कार का प्रश्न तो उठता ही
    रहेगा ! धन्यवाद शुभा ! धन्यवाद कोकास जी

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