गुरुवार, जुलाई 26, 2012

1989 की कवितायें - बचपन

बचपन के बारे में जब भी सोचता हूँ तो याद आता है कि हम बचपन में ही अपने होने की कल्पना कर लिया करते हैं । हर एक बच्चा अपने ताकतवर होने की कल्पना तो करता है लेकिन किसी राक्षस की तरह नहीं । राक्षस यहाँ एक बिम्ब है ।


52 बचपन

बच्चों की दुनिया में शामिल हैं
आकाश में
पतंग की तरह उड़ती उमंगें
गर्म लिहाफ में दुबकी
परी की कहानियाँ
लट्टू की तरह
फिरकियाँ लेता उत्साह

वह अपनी कल्पना में
कभी होता है
परीलोक का राजकुमार
शेर के दाँत गिनने वाला
नन्हा बालक भरत
या उसे मज़ा चखाने वाला खरगोश

लेकिन कभी भी
वह अपने सपनों में
राक्षस नहीं होता ।

            - शरद कोकास 

बुधवार, जुलाई 18, 2012

1989 की कवितायें - कबाड़

घर के सामने से जब भी कोई रद्दीवाला या कबाड़ी गुजरता है ,आवाज़ देता हुआ ..लोहा, टीना ..प्लास्टिक .. रद्दी पेपर .. तो मुझे लगता है काश कोई कबाड़ी ऐसा भी होता जो इस पुरानी सड़ी - गली व्यवस्था को ले लेता और बदले में कोई नई व्यवस्था दे देता .. । लेकिन ऐसा भी कभी होता है ? पुरानी व्यवस्था के बदले नई व्यवस्था इतने आसान तरीके से आ जाती तो क्या बात थी । कुछ ऐसे ही विचारों को प्रतिबिम्बित करती 1989 की एक और कविता ..


51 कबाड़

व्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर
देश के नाम दौड़ने वालों के
घिसे हुए पुर्ज़े
मरम्मत के लायक नहीं रहे

मशीनी जिस्म के
ऊपरी खाने में रखा
मस्तिष्क का ढाँचा
मरे जानवर की तरह
सड़ांध देता हुआ

वैसे ही जैसे दाँतों और तालू को
लुभावने वादों के
निश्चित स्थान पर छूती
शब्दों के दोहराव में उलझी जीभ
और 
पूजाघर के तैलीय वस्त्रों से
पुनरुत्थानवादी विचार
फटे पुराने बदबूदार

सड़क से गुजरता है
आवाज़ देता हुआ कबाड़ी
पुराना देकर नया ले लो ।
                        शरद कोकास  

रविवार, जुलाई 15, 2012

1989 की कवितायें - बूढ़ा हँसता है

यह कविता बूढ़े पर है या बच्चे पर , झोपड़ी पर या खाट पर , बादल पर भी हो सकती है और सूरज पर ..या फिर आग पर ...सीधे सीधे कह दूँ कि यह कविता भूख पर है ...


50 . बूढ़ा हँसता है

झोपड़ी के बाहर
झोलंगी खाट पर पडा बू
अपने और सूरज के बीच
एक बड़े  से बादल को देख
बच्चे की तरह हँसता है

उसकी समझ से बाहर है
सूरज का भयभीत होना
सूरज की आग से बड़ी
एक आग और है
जो लगातार धधकती है
उसके भीतर
सूरज ऊगने से पहले भी
सूरज ऊगने के बाद भी ।
                        शरद कोकास  

शनिवार, जुलाई 14, 2012

1989 की कवितायें - मुर्दों का टीला

सन 2005 में पहल पुस्तिका के अंतर्गत प्रकाशित 53 पृष्ठों की अपनी लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " लिखने के बहुत पहले यह कविता लिखी थी ..शायद इस कविता में उस कविता का विचार चल रहा था , स्वर इसमें भी आक्रोश का था , मेरी उन दिनों की अन्य कविताओं की तरह यह भी एक राजनीतिक व्यंग्य की कविता है । मोहेंजोदड़ो का एक अर्थ मुर्दों का टीला भी होता है ।



49. मुर्दों का टीला

टीले पर उमड़ आया है
पूरा का पूरा गाँव
गाँव देख रहा है
पुरातत्ववेत्ताओं का तम्बू
कुदाल फावड़े रस्सियाँ
निखात से निकली मिट्टी
छलनी से छिटककर गिरते
रंगबिरंगे मृद्भाण्डों के टुकड़े
मिट्टी की मूर्तियाँ
टेराकोटा
मिट्टी के बैल
हरे पड़ चुके ताँबे के सिक्के

गाँव हैरान है
बाप-दादाओं से सुनी
कहानियाँ क्या झूठी थीं
ज़मीन में दबी
मोहरों से भरी सन्दूकों की
सोने के छल्लों से टकराने वाली
लौह कुदालों की
खज़ाने पर फन फैलाये
बैठे हुए काले नाग की
सुना तो यही था
उसे स्वर्णयुग कहते थे
चलन में थे सोने-चान्दी के बर्तन
उसके घर के मिट्टी के बर्तनों जैसे हैं

श्रुतियों का विश्वास
बलगम के साथ थूकते हुए
वह याद करता है
अपने उस अँगूठे के निशान को
पिछले चुनाव के दौरान
टीले के नीचे दबे खज़ाने को
गाँववालों के बीच बँटवाने का आश्वासन देकर
ऐसे ही चित्रोंवाले कागज़ पर
मुहर लगवाकर कोई चला गया था

एक बच्चा
ज़ोरों से चीखता हुआ
गाँव की ओर भागता है
अँगूठा लगाने वालों जागो ।

                        शरद कोकास  

मंगलवार, जुलाई 10, 2012

1989 की कवितायें -सौदागरों की खोज

इस कविता के बारे में मुझे सिर्फ इतना कहना है ...

 सौदागरों की खोज

महाजन की बही से
अपना नाम कटवाने की खातिर
बैल खेत बहन बेटियों का सौदा करने वाले
विवश लोगों के लिये
सोच सोच कर दुखी होने से बेहतर है
रोटी की लड़ाई में अपनी भागीदारी दर्ज करना
खुद भूखे रहकर
उनका पेट भरने के
आदर्शवाद से बेहतर है
समस्याओं के समन्दर में गोता लगाकर
उन कारणों को ढूँढ लाना
जो जीवन से अधिक
मौत की महत्ता प्रतिपादित करते हैं

एक से दिखने वाले चेहरों के बीच
उन सौदागरों की खोज
साँपों के झुंड में
जहरीली प्रजाति खोजना है

हमारे हाथों के दायरे में हैं
हरे भरे खेत छीन कर
दरारों भरा आकाश थमाने वाले सौदागर
हम अपनी मुठ्ठियों में संजोई
ताकत का वास्ता देकर
उनसे माँगेंगे
अपने खेत
अपने पेड़
और सारा आकाश ।
                        शरद कोकास 

सोमवार, जुलाई 09, 2012

1989 की कवितायें - काले शीशों के भीतर


नेताओं के साथ चलते कारों के काफिले देखकर उस समय भी बहुत गुस्सा आता था .. पता नहीं क्यों ..। लोग समझाते थे कि भाई उनकी सुरक्षा के लिये यह ज़रूरी है । मैं कुछ समझना ही नहीं चाहता था । आज फेसबुक पर एक तस्वीर में हॉलैंड के प्रधानमंत्री की साइकल पर दफ्तर जाते हुए देखा तो फिर वह बात याद आई । एक बार तो स्कूल में अपने शिक्षक से सवाल कर दिया  कि जब नेताओं का काफिला निकलता है तो बच्चों को झंडा लेकर क्यों खड़ा कर दिया जाता है सड़क के किनारे ?  मुझे कोई जवाब नहीं मिला था । यह उन्हीं दिनों की कविता है जब जेहन में ऐसे बहुत सारे सवाल मचलते थे । 

 काले शीशों के भीतर

प्रशंसा के प्यालों में परोसी
चाटुकारिता की शराब
सुविधा सम्पन्न लोगों की पहुँच से लम्बी
आँतों में पहुँचकर
न्यूटन के तीसरे नियमानुसार
शीघ्र प्रतिक्रिया करती है

साइकल के फटे टायर से 
झाँकती ट्यूब की तरह
झाँकता है उदारवाद
आधी मुन्दी पलकों से
टपकने लगती हैं
नाटकीय संवेदनायें
वातानुकूलित कारों के
काले शीशों के भीतर
वे वमन करते हैं
जीवन के मूल राग
नैतिकता का अवरोध तोड़
कूटनीति के मंच पर पहुँचते ही
निचले स्तर के विरोधियों की तरह
वे उछालते हैं
कुछ इंकलाबी नारे
मोतियाबिन्द पालने वाली आँखों को
दिखाते हैं दिल्ली के तारे

सड़क से दूर खड़े बच्चों की तरह
झंडे हिलाते रह जाते हैं
कुछ खाली पेट

यह खाली पेट
सब कुछ समझ जाने पर
एक दिन सड़कों पर बिछ जायेंगे
आखिर कब तक अनदेखा करेंगे उन्हें
कारों के यह काफ़िले ।
                        शरद कोकास 

मंगलवार, जून 26, 2012

1989 की कवितायें - सूरज को फाँसी

बेंजामिन मोलाइस , अफ्रिका के क्रांतिकारी कवि थे जिन्हें फाँसी दी गई थी । उनके लिये यह कविता ।


सूरज को फाँसी

रात्रि के अंतिम पहर में
कारपेट घास पर बैठ
सूरज को फाँसी देने की
योजना बनने वालों से
इतना कहना है
एक बार वे
योजना के गर्भ में झाँककर
सूरज और जल्लाद के
सम्बन्धों की
खुफिया जानकारी ले लें

जल्लाद दूर गाँव से बुलाया गया है
फाँसी के बाद पैसों के अलावा
इंटरव्यू छापने का आश्वासन है

उन्होने तय कर लिया है
किस तरह सूरज को बान्धकर
तख़्त तक ले जाया जायेगा
चेहरा ढाँकने के लिये
काले कपड़े की ज़रूरत होगी
ताकि उसकी नज़रों से निकलने वाली
 क्रांति की चिनगारियाँ
किसी के दिमाग़ में जज़्ब न हो

फन्दे के आकार पर भी बात जारी है
ताकि सूरज की नाक
बराबर दूरी पर
दायें या बायें रह सके

सूरज से उसकी अंतिम इच्छा पूछना
योजना में शामिल नहीं है
फाँसी से पूर्व की
सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत
शामिल है
सूरज मुखी पौधों को जड़ से नष्ट करना
ताकि विद्रोह अंकुरित न हो

सूरज की लाश
उसके परिजनों को सौंपी जाये या नहीं
या कर दिया जाये उसका अंतिम संस्कार
सरकारी खर्चे पर
विचार इस पर भी जारी है

सूरज के आरोपपत्र में लिखा है अपराध
रोशनी और उष्मा के सन्दर्भ में
उसने महलों की नहीं
झोपड़ों की तरफदारी की है ।

                        शरद कोकास 

शनिवार, जून 23, 2012

1989 की कवितायें - संगीत की तलाश

चलिये 1988 की कवितायें हो गईं अब 1989 की कविताओं पर आते हैं । यह पहली कविता - संगीत की तलाश । संगीत किसे बुरा लगता है ? यह निहायत फालतू सा सवाल होगा ना । बचपन में स्कूल में पढ़ा था संगीत और कोलाहल में अंतर । उन दिनों जब मेरी उम्र दस साल थी मैंने भंडारा के भारतीय संगीत विद्यालय में गायन की कक्षा में प्रवेश लिया था । कुछ कारण ऐसे रहे कि मैं आगे अध्ययन नहीं कर पाया लेकिन संगीत की दीवानगी बनी रही । यह दीवानगी ऐसी थी कि मैं हर कहीं संगीत तलाशता था । इस तरह इस कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों ने जन्म लिया लेकिन तब यह कविता नहीं बन पाई । यह कविता बनी अपनी अंतिम पंक्तियों में जाकर । आप स्वयं देख लीजिये । यहीं जाकर मुझे समझ में आया कि संगीत और कोलाहल में क्या अंतर होता है ।


संगीत की तलाश

मैं तलाशता हूँ संगीत
गली से गुजरते हुए
तांगे में जुते घोड़े की टापों में

मैं ढूँढता हूँ संगीत
घन चलाते हुए
लुहार के गले से निकली हुंकार में

रातों को किर्र किर्र करते
झींगुरों की ओर
ताकता हूँ अन्धेरे में
कोशिश करता हूँ सुनने की
वे क्या गाते हैं

टूटे खपरैलों के नीचे रखे
बर्तनो में टपकने वाले
पानी की टप-टप में
तेली के घाने की चूँ-चूँ चर्र चर्र में
चक्की की खड़-खड़ में
रेलगाड़ी की आवाज़ में
स्वर मिलाते हुए
गाता हूँ गुनगुनाता हूँ

टूट जाता है मेरा ताल
लय टूट जाती है
जब अचानक आसमान से
गुजरता है कोई बमवर्षक
वीभत्स हो उठता है मेरा संगीत
चांदमारी से आती है जब
गोलियाँ चलने की आवाज़
मेरा बच्चा इन आवाज़ों को सुनकर
तालियाँ बजाता है
घर से बाहर निकलकर
देखता है आसमान की ओर
खुश होता है

वह सचमुच अभी बच्चा है ।

             -- शरद कोकास 

मंगलवार, जून 19, 2012

1988 की कवितायें - नीन्द न आने की स्थिति में लिखी कवितायें - पाँच

नीन्द के बारे में कहीं कोई लिखित नियम नहीं होता । कभी ऐसा भी होता है कि बेहद थके होने के बावज़ूद नीन्द नहीं आती और कभी ऐसा भी होता है कि दिनभर सोते रहने के बावज़ूद भी नीन्द आ जाती है । लोग कहते हैं कि दिनभर मेहनत करने वाले मज़दूरों को रात जल्दी नीन्द आ जाती है लेकिन मैंने देखा है जब चिंतायें सर पर सवार हों तो मज़दूरों को भी नीन्द नहीं आती ।
किसी को किताब पढ़ते ही नीन्द आ जाती है तो किसी की नीन्द किताब पढ़ते हुए गायब हो जाती है । किसी को चाय पीने से नीन्द आ जाती है किसी की नीन्द चाय पीने से उड़ जाती है । जितना हम नीन्द के बारे में सोचते हैं उतना ही वह नहीं आती ।
खैर ऐसी कितनी ही बाते हैं जो मैं नीन्द न आने की स्थिति में सोचता हूँ । कभी कभी कोई कविता रात भर दिमाग में चलती रहती है । सुबह जागने के बाद कुछ भी याद नहीं रहता । ऐसा लगता है , लिख लेता तो कितना अच्छा होता । एक बार कोशिश भी की कागज और कलम लेकर सोने की । सुबह जब जागा तो एक दो अक्षरों के बाद कागज पर केवल लकीरें थीं ।
छोड़िये .. यह सब बातें तो चलती रहेंगी । फिलहाल पढ़िये नीन्द ना आने की स्थिति में लिखी एक छोटी सी प्रेम कविता । जी हाँ प्रेम कविता ही है .. पढ़िये तो सही ।

 नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –पाँच

कितना मुश्किल होता है
नींद के बारे में सोचना
और नींन्द का न आना

नींद के स्थान पर
तुम्हे रखूँ
तब भी यही बात होगी

मैने
नींद न आने का कारण
खोज लिया है
मैं नींद से बहुत प्यार करता हूँ ।

                        शरद कोकास   

बुधवार, जून 13, 2012

1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –चार


नींद ना आने की स्थिति में एक चित्र और देखिये 

नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –चार

नींद आखिर  उड़कर कहाँ जाती होगी
शहर बीच खड़ी अट्टालिकाओं में
या बाहरी सीमा पर बसी
गन्दी बस्तियों में

सहमी खड़ी रहती होगी चुपचाप
बेटी के ब्याह की फिक़्र में जागते
बूढ़े बाप की देहरी पर

कोशिश करती होगी
बेटी के बिछौने पर जाने की
जो जाग रही होगी
बाप की छाती पर  ।
                        शरद कोकास 

शुक्रवार, जून 08, 2012

1988 की कवितायें नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –तीन

और यह एक छोटी सी कविता , जो दर असल छोटी नहीं है -

नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –तीन



नींद न आने की स्थिति में
तारे गिनने का उपदेश देने वाले
खुद कभी तारे नहीं गिनते

उनके और तारों के बीच
हमेशा एक छत होती है
हमारी मिहनत से बनाई हुई ।

                        शरद कोकास 

सोमवार, जून 04, 2012

1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता - 2

नींद न आने की स्थिति में लिखी कविताओं में से यह दूसरी कविता । यह कविता भी कुछ हल्के- फुल्के मूड में ही लिखी गई थी और व्यंग्य इसका केन्द्रीय भाव था । आगे चलकर इस विषय पर कुछ गम्भीर कवितायें आई हैं । लीजिये फिलहाल तो इसे पढ़िये और इसका मज़ा लीजिये ।


 नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता – दो

नींद को कहीं
नज़र न लग गई हो
चचा ग़ालिब की
उन्हें मौत का ख़ौफ था
हमे ज़िन्दगी का है

आश्चर्य !
पीने के बावज़ूद
उन्हें नींद नहीं आती थी

आसमान की ओर देखते हुए
कोशिश में हूँ
बूझने की
चचा ग़ालिब ने यह शेर
शादी से पहले लिखा था
या बाद में ।
                        शरद कोकास 

शुक्रवार, जून 01, 2012

1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता - एक

यह उन दिनों की बात है जब सचमुच रातों को नींद नहीं आती थी । नींद न आने पर मैं कविता लिखता था और कविता लिखते ही नींद आ जाती थी । इस तरह जब पाँच - सात कवितायें बन गईं तो मैंने इस श्रंखला को नाम दिया ' नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता । इस श्रंखला की यह पहली कविता जो कथाकार मित्र मनोज रूपड़ा को बेहद पसन्द थी । वह इसे पढ़ता था और ज़ोर ज़ोर से हँसता था । अब क्यों हँसता था पता नहीं ?
लीजिये आप भी पढ़िये ।

 नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –एक

मुझे नींद नहीं आ रही है
आ रहे हैं विचार
ऊलजलूल
कितना मिलता है यह शब्द
उल्लुओं के नाम से

क्या उल्लू दिन को सोता है
उसे नौकरी नहीं करनी पड़ती होगी
मेरी तरह शायद

उल्लू तो ख़ैर
उल्लू ही होता है
उल्लू का नौकरी से क्या
लेकिन क्या उल्लू प्रेम भी करता है
क्या पता
शायद नहीं
उल्लू तो आखिर
उल्लू ही होता है ना
लेकिन फिर क्यों
वह जागता है रात भर

मैं भी कितना उल्लू हूँ
उल्लू और आदमी के बीच
खोज रहा हूँ
एक मूलभूत अंतर ।

                        शरद कोकास  

गुरुवार, मई 31, 2012

1988 की कवितायें- झील से प्यार करते हुए

" झील मुझसे प्रेम तो करती है /लेकिन हवाओं पर उसका कोई वश नहीं है । " रश्मि जी ने इन पंक्तियों को पढ़कर पूछा ......आखिर कब तक ये हवायें नावें डुबोती रहेंगी । यह हवाएँ समाज की हवाएँ हैं . परम्पराओं की हवाएँ , प्रेम के दुश्मनों की हवाएँ .. जब तक ये हैं तब तक ये नाव डुबोती ही रहेंगी । लेकिन कभी न कभी तो बगावत के स्वर जन्म लेंगे । इसलिये कि ऐसी हवाएँ भी यहाँ उपस्थित हैं जो एक दोस्त की तरह कानों में फुसफुसाती है और सही राह दिखाती हैं ...शायद इसी विचार को प्रकट कर रही है इस श्रंखला की यह अंतिम कविता ।


 झील से प्यार करते हुए –तीन

झील की सतह से उठने वाले बादल पर
झील ने लिखी थी कविता
मेरी उन तमाम कविताओं के ऐवज में
जो एक उदास दोपहरी को
झील के पास बैठकर
मैने उसे सुनाई थीं
कविता में थी
झील की छटपटाहट

मुझे याद है झील डरती थी
मेरे तलवार जैसे हाथों से
उसने नहीं सोचा होगा
हाथ दुलरा भी सकते हैं

अपने आसपास
उसने बुन लिया है जाल संस्कारों का
उसने मनाही दी है अपने बारे में सोचने की
जंगल में बहने वाली हवा
एक अच्छे दोस्त की तरह
मेरे कानों में फुसफुसाते हुए गुज़र जाती है
दोस्त ! प्रेम के लिये सही दृष्टि ज़रूरी है

मैं झील की मनाही के बावज़ूद
सोचता हूँ उसके बारे में
और सोचता रहूंगा
उस वक़्त तक
जब तक झील
नदी बनकर नहीं बहेगी
और बग़ावत नहीं करेगी
आदिम संस्कारों के खिलाफ ।

मंगलवार, मई 29, 2012

1988 की कवितायें

प्रस्तुत है ' झील से प्यार करते हुए ' श्रंखला  की यह दूसरी कविता । रश्मि रविजा जी को इस श्रंखला की तीनो कवितायें बेहद पसन्द हैं और एक बार उन्होंने इसे फेसबुक पर शेयर भी किया था । उनके प्रति आभार के साथ ।इस कविता के बारे में आलोचक डॉ. कमला प्रसाद ने कहा था कि इस प्रेम कविता में दफ्तर के बिम्बों का प्रयोग अद्भुत है ।


झील से प्यार करते हुए –दो

वेदना सी गहराने लगती हैं जब
शाम की परछाईयाँ
सूरज खड़ा होता है
दफ्तर की इमारत के बाहर
मुझे अंगूठा दिखाकर
भाग जाने को तत्पर

फाइलें दुबक जाती हैं
दराज़ों की गोद में
बरामदा नज़र आता है
कर्फ्यू लगे शहर की तरह

ट्यूबलाईटों के बन्द होते ही
फाइलों पर जमी उदासी
टपक पड़ती है मेरे चेहरे पर

झील के पानी में होती है हलचल
झील पूछती है मुझसे
मेरी उदासी का सबब
मैं कह नहीं पाता झील से
आज बॉस ने मुझे गाली दी है

मैं गुज़रता हूँ अपने भीतर की अन्धी सुरंग से
बड़बड़ाता हूँ चुभने वाले स्वप्नों में
कूद पड़ता हूँ विरोध के अलाव में
शापग्रस्त यक्ष की तरह
पालता हूँ तर्जनी और अंगूठे के बीच
लिखने से उपजे फफोलों को

झील रात भर नदी बनकर
मेरे भीतर बहती है
मै सुबह कविता की नाव बनाकर
छोड़ देता हूँ उसके शांत जल में
वैदिक काल से आती वर्जनाओं की हवा
झील के जल में हिलोरें पैदा करती है  
डुबो देती है मेरी कागज़ की नाव

झील बेबस है
मुझसे प्रेम तो करती है
लेकिन हवाओं पर उसका कोई वश नहीं है ।

रविवार, मई 27, 2012

1988 की कवितायें

1988 में कवितायें कम लिखीं ।  तीन प्रेम कवितायें जो 1987 में लिखी थीं उन्हें फाइनल किया और उसके अलावा " नीन्द न आने की स्थिति में लिखी कुछ कवितायें " चलिये पहले यह तीन प्रेम कवितायें .. " झील से प्यार करते हुए "

झील से प्यार करते हुए – एक

झील की ज़ुबान ऊग आई है
झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की
झील के मन में है ढेर सारी नफरत
उन कंकरों के प्रति
जो हलचल पैदा करते हैं
उसकी ज़ाती ज़िन्दगी में
झील की आँखें होती तो देखती शायद
मेरे हाथों में कलम है कंकर नहीं
           
झील के कान ऊग आये हैं
बातें सुनकर
पास से गुजरने वाले
आदमकद जानवरों की
मेरे और झील के बीच उपजे
नाजायज प्रेम से
वे ईर्ष्या करते होंगे

वे चाहते होंगे
कोई इल्ज़ाम मढना
झील के निर्मल जल पर
झील की सतह पर जमी है
खामोशी की काई
झील नहीं जानती
मै उसमें झाँक कर
अपना चेहरा देखना चाहता हूँ

बादलों के कहकहे
मेरे भीतर जन्म दे रहे हैं
एक नमकीन झील को
आश्चर्य नहीं यदि मैं एक दिन
          नमक के बड़े से पहाड़ में तब्दील हो जाऊँ ।  

गुरुवार, अप्रैल 26, 2012

1988 की एक कविता


1988 मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष है , इस साल मेरा विवाह हुआ था और मुझे घर की पकी - पकाई रोटी मिलने लगी थी । कुछ प्रेम कवितायें भी लिखीं इस साल और शिल्प और कथ्य में भी कुछ परिवर्तन हुआ । प्रस्तुत है उस समय की यह एक कविता । 

रोटी की गन्ध

ओसारे में बैठकर
मैं जब लिख रहा होता हूँ कोई कविता
झाँककर देखता हूँ
यादों की खपच्चियों से बना
अनुभूतियों का पिटारा
संवेदनाएँ बचाना चाहती हैं
मस्तिष्क को अनचाही फांस से
लेकिन उंगलियों से टटोलकर
बिम्ब ढूँढना तो सम्भव नहीं

यकायक सजग हो उठती है
तथाकथित नश्वर शरीर की इन्द्रियाँ
नासापुटों तक आ पहुंचती है
पकती हुई रोटी की ताज़ा गन्ध
कान के पर्दे से टकराती है
कपड़े पटकने फींचने की आवाज़ें
पाठ पढते हुए बच्चों की आवाज़ें सुनकर
जेहन में उभरता है उनके हिलते शरीर का बिम्ब
यह गन्ध और यह आवाज़ें
आहत करने लगती हैं मेरी संवेदनायें
गरम तवे पर गिरी पानी की बून्द की तरह
उड़ जाती है मेरी कविता
मेरे और कविता के बीच
आई बाधा के दौरान
मै सोचता हूँ
गोलियों बमों की आवाज़ों
चीखों –चित्कारों की तुलना में
कितनी स्वाभाविक हैं यह आवाज़ें
यकीनन बारूद की गन्ध की अपेक्षा
रोटी की गन्ध अधिक प्रिय है मुझे

उतार लेना चाहता हूँ मैं हू ब हू इनको
अपनी कविता में ।