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गुरुवार, अप्रैल 30, 2026

अंजू शर्मा की कविता - चालीस साला औरतें

                   मित्रों के साथ अंजू शर्मा 

आज ब्लॉग पर प्रस्तुत है इस दौर की महत्वपूर्ण कवि कथाकार अंजू शर्मा की यह चर्चित कविता "चालीस साला औरतें" अंजू शर्मा दिल्ली में रहती हैं । उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

चालीस साला औरतें


इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर

बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि

वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,

ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं

ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है
जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें,
ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,
पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,

जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं...



---अंजू शर्मा

शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2014

शरद कोकास का नया कविता संग्रह " हमसे तो बेहतर हैं रंग

शरद कोकास का नया कविता संग्रह " हमसे तो बेहतर हैं रंग " दख़ल प्रकाशन ,दिल्ली द्वारा प्रकाशित ।
collection of poem - ' Hamse To Behatar Hain Rang '  By - Sharad Kokas , Published By Dakhal Prakashan Delhi

रविवार, अक्टूबर 02, 2011

रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी

1984 की डायरी से यह एक कविता




क्योंकि हम मूलत: भिक्षावृत्ति के खिलाफ हैं


हमारे सामने फैले हुए हाथ पर
चन्द सिक्के रखने की अपेक्षा
हमने रख दी है कोरी सहानुभूति
और उसके फटे हुए झोले में
डाल दिये हैं कुछ उपदेश
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी ग़रीबी पर
बहाए हैं मगरमच्छ के आँसू
और गालियाँ दी हैं अमीरों को
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी फटेहाली पर
व्यक्त किया है क्षोभ
और कोसा है व्यवस्था को
उसकी ओर उंगली दिखाते हुए
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उससे पूछा है
कोई काम करोगे
उसके काम माँगने पर
उछाल दिया है आश्वासन
नेताओं की तरह
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


फिर हमारी रेल आ जाती है
हम बैठकर चले जाते हैं
चाँवल से भी वज़नी
हमारे उपदेश और सहानुभूति
और आश्वासन
उसके झोले में लगे विवशता
के पैबन्द फाड़ प्लेटफॉर्म पर

जहाँ- तहाँ गिर जाते हैं ।


- शरद कोकास

शनिवार, अगस्त 20, 2011

मुझे विश्वास नहीं है सरकारी आँकड़ों पर

1984 के डिब्बे में तलाश की तो कुछ और कवितायें इसी तेवर की मिलीं । यह एक कविता जो उस वक़्त 1984 के भोपाल गैस कांड के बाद व्यवस्था का असली चेहरा दिखाने के प्रयास में लिखी थी । इसे पढ़िये और बताइये इस कविता का सन्दर्भ उस घटना के अलावा किसी और घटना से भी जुड़ता है क्या ?



2 ज़िन्दा चेहरों की तलाश


मेरे सामने है एक अखबार
जिसमें इर्द - गिर्द बिखरीं हैं
कई खबरें
लाशों की तरह
मेरे हाथों में
एक कैल्कुलेटर
जिस पर मैं कर रहा हूँ
मौत का हिसाब
जोड़ रहा हूँ क्रूरता को
घटाते हुए भावनाओं से
गुणा करते हुए बर्बरता से



मुझे विश्वास नहीं है
सरकारी आँकड़ों पर
मैं लेना चाहता हूँ जायज़ा
उन परिस्थितियों का
जिनमें मौत भी काँप उठी थी
उन दरवाज़ों पर
जहाँ धुआँ था
लाशों की गन्ध थी
संतोष का भाव लिये
अनभिज्ञता की नकाब ओढे
कुछ चेहरे
छुपे हुए मज़बूत दीवारों के भीतर
जहाँ माथे का फैला हुआ सिन्दूर था
जहाँ थी कुरआन
गीता और बाइबिल
लुढकी हुई दूध की बोतल
और उन सबके पीछे
अट्टहास करता हुआ
एक घिनौना चेहरा



कैलकुलेटर
केवल मुर्दा चेहरों का
हिसाब बता सकता है
ज़िन्दा चेहरों का नहीं

मुझे तलाश है ज़िन्दा चेहरों की
जो आज व्यवस्था की आड़ लेकर
हमारी परिधि से बाहर हैं


कैलकुलेटर
कल तुम्हारे हाथ में होगा
और तुम लगाओगे
उन चेहरों का हिसाब
जो कल ज़िन्दा नहीं बचेंगे ।


---- शरद कोकास

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

हमें जो कहनी है वह बात अभी बाकी है

कल हमारे एक मित्र मिले कहने लगे यार आजकल आँदोलन का माहौल चल रहा है ,तुम्हारी वह कुत्ते वाली कविता याद आ रही है । हमें याद आया 1984 में जबलपुर के कविता रचना शिविर में , किसान और मजदूरों के आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में वह कविता लिखी थी । और मंच पर बहुत जोश से उस कविता का पाठ भी करते थे । डॉ.कमला प्रसाद को भी मेरी उम्र और इस कविता के तेवर की वज़ह से उस समय यह कविता अच्छी लगी थी । पुरानी ही सही आप भी पढ़ लीजिये इसे ।



हमारे हाथ अभी बाकी हैं


कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे
सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है


1984 में एक आन्दोलन में झंडा उठाए कवि

उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है


हम भी शायद कुत्ते हो गये हैं
इसलिये खड़े हैं उनके दरवाजों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द
उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिये
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिये
उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिये
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है


ज़ुबाने कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं


लेकिन हम आदमी हैं कुत्ते नहीं
आओ उठे दौड़ें
और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर
हमारे हाथ अभी बाकी हैं


हमारे हाथ अभी बाकी हैं ।


- शरद कोकास


शनिवार, अगस्त 06, 2011

बुखार में प्रेम कवितायें

वैसे तो सबसे कम झमेला इस बात में है कि बीमार हुआ ही न जाये.. लेकिन इस कम्बख़्त वायरस का क्या करें , लाख बचना चाहा लेकिन बुखार आ ही गया ... और बुखार के साथ याद आई अपनी यह तीन पुरानी बुखार कवितायें ,हमारे एक मित्र ने इन्हे नाम दिया है , बुखार में प्रेम कवितायें , लीजिये आप भी पढ़िये ....


बुखार-एक

बवंडर भीतर ही भीतर
घुमड़ता हुआ
लेता हुआ रोटी की जगह
पानी को स्थानापन्न करता
रगों में खून नहीं ज्यों पानी
शरीर से उड़ता हुआ ।

 बुखार-दो

बुखार
आग का दरिया
पैर की छिंगुली से लेकर
माथे तक उफनकर बहता हुआ

छूटती कँपकपी सी
बदल जाता चीज़ों कास्वाद
साँसों का तापमान
जीभ खुश्क हो जाती
उतर जाता बुखार
माथे पर तुम्हारा हाथ पड़ते ही ।

बुखार –तीन

अछा लगता है
गिरती हुई बर्फ में खड़े
पेड़ की तरह काँपना
 जड़ों से आग लेना
शीत का मुकाबला करना
अच्छा लगता है
ठिठुरते हुए मुसाफिर का
गर्म पानी के चश्मे की खोज  में
यात्रा जारी रखना  । 

                        शरद कोकास

                      

बुधवार, जुलाई 06, 2011

मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी ?


यह बात हम सभी जानते हैं कि जिस तरह जीवन एक सत्य है ,मृत्यु भी उसी तरह एक सत्य है । फिर भी जब किसी की मृत्यु होती है हम उसे उस तरह स्वीकार नहीं कर पाते जिस तरह जीवन को स्वीकार करते हैं । ऐसा शायद इसलिये होता है कि हमने उस व्यक्ति के अस्तित्व को अपने जीवन में महसूस किया होता है और उसका विछोह हमें दुख देता है । विगत  8 जून को मुम्बई में मेरे चाचाजी का निधन हुआ । वहाँ से लौटा ही था कि समाचार प्राप्त हुआ कि 28 जून को एक और चाचा गुजर गए । परिवार के लिये यह शोक का समय है । पता है कि यह समय भी गुजर जाएगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा । फिर भी जो चला जाता है उसकी कमी तो महसूस होती है । इन दिनों बार बार याद आ रही है अपनी यह कविता जो मैंने 1995 में लिखी थी । हो सकता है मेरी तरह यह सवाल भी कभी आपके मन में आया हो ।


मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी

यह तय है कि
स्वर्ग तो नहीं जाता
नर्क भी नही जाता है आदमी
 
मरने के बाद
यह भी तय है कि
किसी दूसरी देह में
नहीं समा जाती है
आदमी की रूह

और यह तो बिलकुल तय है कि
भूत नहीं बन जाता
अधूरी इच्छायें लिये
मर जाने वाला आदमी

आओ पृथ्वी
आओ आकाश
आओ अग्नि
आओ वायु
आओ जल

सच सच बताओ
मरने के बाद
कहाँ जाता है आदमी ? 

                   - शरद कोकास

मंगलवार, मई 24, 2011

चलती हुई रेल में कवितायें


इन दिनों यात्राओं का मौसम है । शादी ब्याह , घूमना फिरना ... । मैं भी पिछले दिनों रेल में यात्राएँ करता रहा । याद आती रहीँ अपनी कुछ पुरानी कवितायें ....


चलती रेल में कविता –एक

चलती हुई रेल में
खिड़कियों के शीशे चढ़े हों
कैद हो रोशनी डिब्बे के भीतर
उस पार हो गहरा अंधेरा
काँच पर उभरते है
अपने ही धूमिल अक्स

बस इसी समय
मन के शीशे पर
उभरता है कोई चेहरा
जो मौजूद नहीं होता
चलती हुई रेल में ।


रेल में कविता –दो

सो जायें जब सब के सब
गहरी नींद में
मैं जागती हूँ उनींदी
नींद में ढ़कलते  सिर के लिये
कोई कांधा नहीं होता
कोई नहीं होता
जिससे कह सकूँ
मन की तमाम बातें

दिल की धड़कनों की
चलती हुई रेल में
साथ चलते हो तुम
लिये अपनी बातों का पिटारा ।

चलती हुई रेल में कविता –तीन
 
ठीक इसी वक्त
घड़ी ने तीन बजायें हैं
ठीक इसी वक्त
उचटी है मेरी नींद
ठीक इसी वक्त
चलती हुई रेल
ठिठकी होगी
यादों के किसी
छोटे से स्टेशन पर ।

                        शरद कोकास

मंगलवार, मार्च 01, 2011

कवियों की उम्र और मित्रता वर्षॉं मे नहीं नापी जाती - नरेश चन्द्रकर



 नरेश चन्द्रकर से मेरी मित्रता को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ है । लेकिन कवियों की मित्रता वर्षों में नापी नहीं जाती न ही इसे किसी कालखण्ड में बान्धा जा सकता है । नरेश का कविता संग्रह " बहुत नर्म चादर थी जल से बुनी " जब परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रहा था तो उसने कहा , " शरद यह कविता संग्रह तुम्हे समर्पित कर रहा हूँ । " मैं चौंका .. " यार अभी समर्पण करने लायक उम्र तक नहीं पहुँचा हूँ मैं । " नरेश ने एक कहकहा लगाया और कहा .पागल ...उम्र से नहीं काम से नापी जाती है कवियों की उम्र । तुम्हारी लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " तुम्हे लम्बी उम्र दे चुकी है । 
आज एक मार्च नरेश चन्द्रकर का जन्मदिन है । ढेर सारी बधाई और प्यार के साथ नरेश की यह कविता उनके इसी संग्रह से । 
 
 बातचीत



यह आयातीत चीज़ नहीं है

इसे किसी की मिल्कियत में शुमार न करें
इसके पेटेण्ट होने के खतरे भी नहीं हैं

इसे कौन चुरा ले जा सकता है सात समुन्दर पार
किसकी मजाल जो हमें बोलने से रोके
यह तो तिलिस्मी पुड़िया है
इसे खोलें



जज़्बातों की लगाम टूट जाएगी

इसमें जीने की हज़ार नेमतें मिलेंगी

राह न सूझती हों , तो सूझेंगी

हज़ार दुश्वारियाँ हों , सुलझेंगी


इसे छोटी बात न समझें


हमारे वक़्त को इतना ख़राब बताने वाले
ज्ञानरंजन जी व नरेश चन्द्रकर की बातचीत 
ख़ुद ख़ौफ़ज़दा हैं


हमारे मिलने - मिलाने को लेकर !!


- नरेश चन्द्रकर  


( सभी चित्र शरद कोकास के कैमरे से ) 

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

जिसे बार - बार भूल जाता है अड़तालीस साल का आदमी ।



कल कवि कुमार अम्बुज का फोन आया...”  कैसे हो शरद ? बहुत दिनों से तुम्हारा कोई समाचार नहीं मिला ? “ कुमार भाई की इस चिंता ने मुझे द्रवित कर दिया । इस उम्र में जब सब लोग अपनी अपनी चिंता में व्यस्त रहते हैं किसी को इतनी चिंता कहाँ होती है कि पूछे कोई किस  हाल में जी रहा है । कुमार अम्बुज जी पिछले दिनों नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी की दूसरी पारी खेलने के लिये कमर कस रहे हैं । लेकिन यह कवि ही हो सकता है जो अपनी चिंता के साथ ज़माने भर की चिंता करे । प्रस्तुत है श्री कुमार अम्बुज की यह कविता उनके संग्रह “ क्रूरता “ से ।

अड़तालीस साल का आदमी

अपनी सबसे छोटी लड़की के हाथ से
पानी का गिलास लेते हुए
वह उसका बढ़ता हुआ कद देखता है
और अपनी सबसे बड़ी लड़की की चिंता में डूब जाता है

नाइट लैम्प की नीली रोशनी में
वह देखता है सोई हुई बयालीस की पत्नी की तरफ
जैसे तमाम किए- अनकिए की क्षमा माँगता है

नौकरी के शेष नौ - दस साल
उसे चिड़चिड़ा और जल्दबाज़ बनाते हैं
किसी अदृश्य की प्रत्यक्ष घबराहट में घिरा हुआ वह
भूल जाता है अपने विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ

अड़तालीस का आदमी
घूम- फिर कर घुसता है नाते - बिरादरी में
मिलता है उन्ही कन्दराओं उन्हीं सुरंगों में
जिनमें से एक लम्बे युद्ध के बाद
वह बमुश्किल आया था बाहर

इस तरह अड़तालीस का न होना चुनौती है एक
जिसे बार - बार भूल जाता है
अड़तालीस साल का आदमी ।  

                   -- कुमार अम्बुज  

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

एक नये रास्ते की सम्भावना भी यहीं से शुरू होती है


मेरे कवि मित्र एकांत श्रीवास्तव ने जब पहली बार यह कविता सुनी थी तो उन्हे यह कविता बहुत पसन्द आई  थी .. सो यह कविता एकांत के लिये , और आप सभी के लिये ..जो जीवन की राहों पर चल रहे हैं और सामना कर रहे हैं हर आने वाले मोड़ का .. 

 मोड़

मोड़ बहुत हैं
जीवन की राह पर
अनदेखे अनचीन्हे मोड़

सपाट रास्तों से उपजी
ऊब तोड़ते हैं मोड़
मोड़ पर साफ दिखाई देता है
तय किया रास्ता
आनेवाला दृश्य
मोड़ पर बदल जाती है
हवा की दिशा
बदल जाता है
धूप का पहलू
बारिश का कोण

कभी अचानक आते हैं मोड़
कभी मिल जाता आभास
कभी कोई दिशा संकेत
सावधान करते हैं मोड़

मोड़ पर अक्सर ठिठक जाते लोग
गति हो जाती कम
टूट जाती लय
रुकने की सम्भावना होती मोड़ पर
टकरा जाने की भी
थक जाने की सम्भावना होती है
भटक जाने की

एक नये रास्ते की सम्भावना भी
यहीं से शुरू होती है ।

                        - शरद कोकास  

( चित्र गूगल से साभार )

शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010

वह सचमुच अभी बच्चा है ।


सर्दियों की रात में अजीब सी खामोशी सब ओर व्याप्त होती है । टी.वी. और कम्प्यूटर और पंखे बंद हो जाने के बाद बिस्तर पर लेटकर कुछ सुनने की कोशिश करता हूँ ।  हवा का कोई हल्का सा झोंका कानों के पास कुछ गुनगुना जाता है । गली से गुजरता है कोई शख्स गाता हुआ ...आजा मैं हवाओं में उठा के ले चलूँ ..तू ही तो मेरी दोस्त है । मैं सोचता हूँ मेरा दोस्त कौन है ..यह संगीत ही ना जो रात दिन मेरे कानों में गूँजता रहता है । संगीत के दीवानों के लिये  दुनिया की हर आवाज़ में शामिल होता है संगीत .. ऐसे ही कभी दीवाने पन में मैंने भी कोशिश की थी इस संगीत को तलाशने की । मेरी वह तलाश इस कविता में मौज़ूद है जो मैंने शायद युद्ध के दिनों में लिखी थी ... 

 

संगीत की तलाश

 

मैं तलाशता हूँ संगीत

गली से गुजरते हुए

तांगे में जुते घोड़े की टापों में

 

मैं ढूँढता हूँ संगीत

घन चलाते हुए

लुहार के गले से निकली हुंकार में

 

रातों को किर्र किर्र करते

झींगुरों की ओर

ताकता हूँ अन्धेरे में

कोशिश करता हूँ सुनने की

वे क्या गाते हैं

 

टूटे खपरैलों के नीचे रखे

बर्तनो में टपकने वाले

पानी की टप-टप में

तेली के घाने की चूँ-चूँ चर्र चर्र में

चक्की की खड़-खड़ में

रेलगाड़ी की आवाज़ में

स्वर मिलाते हुए

गाता हूँ गुनगुनाता हूँ

 

टूट जाता है मेरा ताल

लय टूट जाती है

जब अचानक आसमान से

गुजरता है कोई बमवर्षक

वीभत्स हो उठता है मेरा संगीत

चांदमारी से आती है जब

गोलियाँ चलने की आवाज़

मेरा बच्चा इन आवाज़ों को सुनकर

तालियाँ बजाता है

घर से बाहर निकलकर

देखता है आसमान की ओर

खुश होता है

 

वह सचमुच अभी बच्चा है ।

 

             -- शरद कोकास

vv