शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

हो सकता है

1986 की यह एक और कविता है । मुझे बिलकुल याद नहीं आ रहा है कि यह किस सन्दर्भ में लिखी थी , लेकिन इन दिनों आन्दोलनों और बहस के बीच कई मुद्दे हैं , हो सकता है  कहीं न कहीं इसका सन्दर्भ जुड़ जाए ।


                        हो सकता है

सबूतों और गवाहों को लेकर
शुरू होने वाली
एक स्वस्थ्य बहस
हो सकता है तब्दील हो जाये
किसी खूनी लड़ाई में

हो सकता है
अहंकारों के थकते ही
रेत पर गिरे
आस्था के स्वेदकणों की
तलाशी ली जाये

ढूँढी जाये
मित्रता की परिभाषा
ढूंढा जाये
समाज की प्रयोगशाला में
सम्बन्धों को जोड़ने वाला रसायन

मक्कारी के नाखूनों से
ताज़े ज़ख्मों की परत
उधेड़ने वाले लोग
उन्हें एक दूसरे के खिलाफ ज़हर उगलता देख
अपने होंठ चौड़े कर ले

हो सकता है
स्वार्थ और
बहकावे के
जूतो के तले में चिपका
विश्वास का कुचला चेहरा
सीढियों पर अटका रह जाये

सम्वेदनहीनता की तेज़ हवाएँ
सत्य के आवरण उतारकर
उसे नग्न कर दें
अदालत के कटघरे में

शायद तब भी
अदालत की पिछली बेंच पर बैठा
व्यवस्था का एक छुपा चेहरा
मुस्कराता ही रहे ।

                        - शरद कोकास 

बुधवार, दिसंबर 14, 2011

संगीन की नोंक

1986 की यह एक कविता



संगीन की नोंक


मैने फिर सुनी नींद में
गोलियाँ चलने की आवाज़
एक दो तीन चार
पाँच छह सात आठ
मुझे लगा मेरा बच्चा
गुनगुनी धूप में बैठकर
गिनती याद कर रहा है


मैने देखा सपने में
बिखरा हुआ खून
पाँवों में महावर लगाते हुए
शायद पत्नी के हाथ से
कटोरी लुढक गई है


बम फटने की आवाज़ें
धुएँ का उठता बवंडर
शायद मोहल्ले के बच्चे
दीवाली की आतिशबाज़ी में व्यस्त हैं


फिर ढेर सारी आवाज़ें
भारी भरकम बूटों की
कल मेरा जवान भाई कह रहा था
उसे जाना है सुबह सुबह
परेड की तैयारी में
शायद उसके दोस्त
उसे लेने आये हैं

फिर कुछ औरतें
आँखों में लिये आँसू
पिछले दिनो ही तो मैने
अपनी लाड़ली बहन को विदा किया है
डोली में बिठाकर



मैने चाहा बारबार
खोलकर देखूँ अपनी आँखें
निकल आऊँ बाहर
चेतन अचेतन के बीच की स्थिति से

लेकिन नींद में
सुख महसूसने की लालसा में
सच्चाइयाँ खड़ी रहीं पीछे



यकायक संगीन की तेज़ नोक
मेरी सफेद कमीज़ को
सीने से चीरते हुए
पेट तक चली आई
मेरी खुली आँखों के सामने थी
खून के सैलाब में डूबी हुई
मेरी पत्नी की लाश
पहाड़ों की किताब पर
मासूम खून के छींटे
एन सी सी की वर्दी व बूटों से दबी
जवान भाई की देह
फटी अंगिया से झाँकता
इकलौती बहन का मुर्दा शरीर

चीखने चिल्लाने की कोशिश में
मैने एक बार चाहा
बन्द कर लूँ फिर से अपनी आँखें
और पहुंच जाऊँ कल्पना की दुनिया में

लेकिन मेरा पुरुषत्व
नपुंसकता की हत्या कर चुका था
नोचकर फेंक दी मैने
अन्धे कुएँ में ले जाने वाली अपनी आँखें
सपनो की दुनिया में भटकाने वाली
अपनी आंखें
सब कुछ देख कर भी
शर्म से झुक जाने वाली
अपने आंखें



संगीन की नोक
मेरे पेट तक आकर रुक गई है
और मै नई आँखों से देख रहा हूँ

मेरी कमीज़ का रंग
अब लाल हो चला है ।

- शरद कोकास

गुरुवार, नवंबर 24, 2011

इतिहास से कुछ अलग

1985 के युवा आक्रोश की एक और कविता



इतिहास के पन्नों पर


इतिहास की जर्जर किताब का
अपने हित में
उपयोग करने वालों ने
बिखरा दिया है पन्नों पर
ताज़ा निर्दोष रक्त
जो यकीनन
मेरे तुम्हारे पूर्वजों का रक्त नहीं

इस रक्त के धब्बों में
दब चुकी हैं अनगिनत गाथायें
कानपुर से इलाहाबाद जानेवाली
सड़क के दोनों ओर
पेड़ों पर फाँसी पाने वाले
आज़ादी के दीवानों की
पुत्रों के शीश तश्तरी में रखकर
जिसके आगे पेश किये गये
उस बहादुर शाह ज़फर के अरमानों की
कूका विद्रोह में
तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ाये गये
अनगिनत सिख जवानों की
और उन तमाम इंसानों की
जिनके नाम
शहर के बीच स्थित
शहीद स्मारक पर खुदे हैं


इतिहास के पन्नों पर जमा रक्त
हमारे सगे सम्बन्धियों की रगों का
रक्त न होने के फलस्वरूप
हमारे संकुचित दिमागों में
हलचल मचाने में असमर्थ है
हमारे सामान्य ज्ञान में शामिल है
पाठ्यपुस्तकों में
विवशता वश पढ़े
चन्द महान व्यक्तियों के नाम


हमारी भौगोलिक जानकारी में नहीं है
काशी ,बद्री नाथ ,मक्का, मदीना
और अमृतसर की राह में आने वाले
जालियाँ वाला बाग़ और अगस्त क्रांति मैदान

पानठेलों पर खड़े होकर
प्रकट किया जाने वाला आक्रोश
जनरल डायर व सौंडर्स के देश की
सम्पन्नता के गुणगान के सामने
नपुंसक सिद्ध होता है


रंगबिरंगी पत्रिकाओं के
मख्खनी चेहरों पर अटकी नज़र
देख नहीं पाती
क्रांतिकारियों के अखबार गदर में प्रकाशित
रोज़गार का विज्ञापन
जहाँ मेहनताना थी मृत्यु
पुरस्कार शहादत
पेंशन में आज़ादी
और कार्यक्षेत्र हिन्दुस्तान



ताम्रपत्र गले में लटकाये
सड़कों पर घूमता आवारा मसीहा
चीखता है
पहचानो उन सियारों को
जो तुम्हारी रगों में बहने वाले खून से
अपने आप को रंगकर
तुम्हे तुम्हारे ही घर में
गुलाम बनाने के साजिश रच रहे हैं
तुम्हारे ही भाइयों के हाथों में
बन्दूकें थमाकर
लाशों का व्यापार कर रहे हैं

शायद यही वक़्त है सोचने का
वरना आनेवाली पीढ़ीयाँ
इतिहास के पन्नों पर
देखेंगी
हमारे रक्त के निशान
लेकिन उन पर
गर्व नहीं कर सकेंगी ।

- शरद कोकास


( चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

1985 में बसंत कुछ इस तरह आया था

2 दिसम्बर 1984 की रात भोपाल में ज़हरीली गैस कांड हुआ था और उसके बाद 1985 में पूरे साल इसकी चर्चा रही । बहुत सारे लोगों ने लिखा , कवियों ने कवितायें , लेख , अपना विरोध किसी न किसी तरह दर्ज़ करते रहे । मैं उन दिनों लगभग 2 माह भोपाल में ही था , फिर लौट आया , नौकरी की मजबूरी थी । उस साल जब बसंत ऋतु का आगमन हुआ तो मुझे और कुछ नहीं दिखाई दिया , सिवाय उन चेहरों के जो ज़हरीली गैस का शिकार हुए थे । ज़ाहिर है ..1985 की बसंत की कविता को कुछ इसी तरह होना था ... ।



बसंत क्या तुम उस ओर जाओगे




बसंत क्या तुम उस ओर जाओगे
जहाँ पेड़ देखते देखते
क्षण दो क्षण में बूढ़े हो गये
देश की हवाओं में घुले
आयातित ज़हर से


बीज कुचले गये
अंकुरित होने से पहले
और जहाँ
वनस्पतियाँ अविश्वसनीय हो गईं
जानवरों के लिये भी



जाओ उस ओर
तुम देखोगे और सोचोगे
पत्तों के झड़ने का
अब कोई मौसम नहीं होता



ऊगते हुए
नन्हे नन्हे पौधों की
कमज़ोर रगों में
इतनी शक्ति शेष नहीं
कि वे सह सकें झोंका
तुम्हारी मन्द बयार का



पौधों की आनेवाली नस्लें
शायद अब न कर सकें
तुम्हारी अगवानी
पहले की तरह
खिलखिलाते हुए



आश्चर्य मत करना
देखकर वहाँ
निर्लज्ज से खड़े बरगदों को ।



-शरद कोका
स 

शनिवार, अक्टूबर 22, 2011

आग के बारे में एक युवा कविता

1984 की कविताओं के पश्चात अब आते हैं 1985 की कविताओं पर । आक्रोश तो इन कविताओं में भी है .. स्वाभाविक है .. उम्र ही कुछ ऐसी थी , और इस उम्र में इतना आक्रोश तो जायज़ है ना ?



सोने से दमकते हुए हमारे चेहरे





गूगल से साभार

आग आग है आग कब तक रुकेगी


आग पेट से उठती है
पहुंचती है दिमागों तक
भूख कोसती है परिस्थितियों को
रह जाती है
खाली पेट ऐंठन
आक्रोश सिमटता है मुठ्ठियों में
मुठ्ठियों को
हवा में उछालने की ताकत
मुहैया होती है रोटी से
लेकिन....
रोटी तो तुमने छीन ली है
और खिला दी है
अपने पालतू कुत्तों को



आग आग है
फिर भी बढ़ती है
चिंगारियाँ आँखों से निकलती हुई
ताकत रखती है
तुम्हे भस्म कर देने की
लेकिन....
तुमने चढ़ा लिया है मुलम्मा
अपने जिस्म पर


आग उठती है
होठों से बरसती है
लेकिन तुमने पहन लिये हैं कवच
जिन पर असर नहीं होता
शब्द रूपी बाणों का



आग अब पहुंचती है
हमारे हाथों तक


अब हमारे हाथों में
सिर्फ आग होगी
और उसमें होंगे
सोने से दमकते हमारे चेहरे


तुम्हारी नियति ...?

- शरद कोकास

बुधवार, अक्टूबर 12, 2011

कल का दिन बिगड़ी हुई मशीन सा था

मई 1984 में जबलपुर में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कविता रचना शिविर हुआ था । दस दिनों तक कविता पर लगातार बातचीत होती रही । हम सभी शिविरार्थी युवा थे 20-22 साल की उम्र ,सवाल तो इस तरह करते थे जैसे क्लास में बैठे हों । और जवाब देने वालों में भी साहित्य के बड़े बड़े महारथी थे डॉ. कमला प्रसाद , राजेश जोशी , चन्द्रकांत देवताले , डॉ. मलय , राजेश जोशी , सोमदत्त ।जब मज़दूरों पर कविता लिखने की बात आई तो एक युवा साथी ने सवाल किया .. मज़दूर मेहनत करता है लेकिन कारखाने का मालिक मुनाफा कैसे कमाता है ? उत्तर मिला .. सीधी सी बात है वह 20 रुपये का काम एक दिन में करता है और उसकी मजदूरी 10 रुपये तय की जाती है । इस तरह उसे मजदूरी देने के बाद मालिक के एक दिन में दस रुपये बच जाते है । अब उसके कारखाने मे 1000 मजदूर है तो उसके एक दिन में 10000 रुपये बच जाते हैं । महीने में 30 x 10000 = 300000 और साल में 12 x300000 = 36,00000 .. | अब छत्तीस लाख में नयी फैक्टरी तो डाली जा सकती है ना ।
बहरहाल , अब मजदूर ने तो अर्थशास्त्र पढा नही है न ही उसे यह गणित आता है । उसे तो बस काम करना आता है , वह करता है । उसे तो यह भी नहीं पता होता कि उसका शोषण हो रहा है । लेकिन जो पढ़े लिखे है वे तो जानते हैं ।
हमे पता है इसलिये हम मजदूरों के पक्ष में लिख रहे हैं ..भले ही वे न पढ़ पायें लेकिन हाँ उन मजदूरों को हम यह ज़रूर बतायें कि हम क्या लिख रहे है और क्यों लिख रहे हैं । इन्हे कमज़ोर मत समझिये जिस दिन ये समझ जायेंगे उस दिन अपना छीना हुआ हिस्सा मांग लेंगे ... । फैज़ ने कहा भी है ..
“हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे
एक खेत नहीं एक गाँव नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे “

उस शिविर में मजदूरो पर कविता लिखने की पारी में मैंने भी एक कविता लिखी थी । मुझे पंक्ति मिली थी ..”कल का दिन बिगड़ी हुई मशीन सा था “ मैने क्या लिखा था आप भी पढिये ...1984 में लिखी यह कविता भी आपको अच्छी लगेगी ।



बीता हुआ दिन



कल का जो दिन बीता
बिगड़ी हुई मशीन सा था
कल कितनी प्रतीक्षा थी
हवाओं में फैले गीतों की
गीतों को पकड़ते सुरों की
और नन्हे बच्चे सी मुस्कराती
ज़िन्दगी की

कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन सा था
कल राजाओं के
मखमली कपड़ों के नीचे
मेरे और तुम्हारे
उसके और सबके
दिलों की धड़कनें
काँटे मे फँसी मछली सी
तड़पती थीं


सचमुच प्रतीक्षा थी तुम्हारी
ओ आसमान की ओर बहती हुई हवाओं
तुम्हारी भी प्रतीक्षा थी
लेकिन कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन सा था

कल का वो दिन
आज फिर उतर आया है
तुम्हारी आँखों में
आज भी तुम्हारी आँखें
भेड़िये की आँखों सी चमकती हुई
कल का खेल
खेल रही हैं ।



---शरद कोकास

बुधवार, अक्टूबर 05, 2011

हमारे खून पसीने से पैदा की हुई रोटियाँ


1984 की यह एक और कविता क्या आक्रोश झलकता था उन दिनो.... हाहाहा ..



बची हुई खाल



कल उन्होंने दी थी हमें कुल्हाड़ी
जो उन्होंने छीनी थी हमारे बाप से
जिसे हम अपने पैरों पर मार सकें
और रोटी की तलाश में
टेक दें अपने घुटने
उनकी देहरी पर
रोटी के टुकड़े को फेंकने की तरह
उन्होंने उछाला था आदर्श वाद
रोटी का एक टुकड़ा भी मिले तो
आधा खा कर संतोष करो
और बढ़ते रहो


आज उन्होंने
बिछा लिये हैं कंटीले तार
अपनी देहरी पर
ताकि ज़ख्मी हो सकें
हमारे घुटने

हमारे जैसे
याचकों के लिये
खुला है अवश्य
सामने का द्वार
पिछला रास्ता तो
संसद भवन को जाता है


कंटीली बाड़ के भीतर
वे मुस्काते है
हम कभी हाथ जोड़ते हैं
कभी हम हाथ फैलाते हैं

लेकिन एक दिन आयेगा
जब हमारी दसों उंगलियाँ
आपस में नहीं जुड़ेंगी
वे उस ओर मुड़ेंगी
जहाँ होगी एक मोटी सी गरदन
बाहर निकल आयेगी वह जीभ
जो बात बात पर
आश्वासन लुटाती है

तोड़ देंगे हम
अपने ज़ख्मी पैरों से
वह कँटीली बाड़
और घुस जायेंगे
उन हवेलियों में
जहाँ सजी होगी
चांदी के मर्तबानों में
हमारे खून पसीने से
पैदा की हुई रोटियाँ
छीन लेंगे हम उन्हें और
बाँट लेंगे
अपने सभी भाईयों के बीच


हम बता देंगे
माँस और हड्डियाँ
नुच जाने के बाद भी
बची हुई खाल
अपने बीच से
हमेशा के लिये
विदा कर सकती है
कसाईयों को ।

रविवार, अक्टूबर 02, 2011

रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी

1984 की डायरी से यह एक कविता




क्योंकि हम मूलत: भिक्षावृत्ति के खिलाफ हैं


हमारे सामने फैले हुए हाथ पर
चन्द सिक्के रखने की अपेक्षा
हमने रख दी है कोरी सहानुभूति
और उसके फटे हुए झोले में
डाल दिये हैं कुछ उपदेश
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी ग़रीबी पर
बहाए हैं मगरमच्छ के आँसू
और गालियाँ दी हैं अमीरों को
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी फटेहाली पर
व्यक्त किया है क्षोभ
और कोसा है व्यवस्था को
उसकी ओर उंगली दिखाते हुए
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उससे पूछा है
कोई काम करोगे
उसके काम माँगने पर
उछाल दिया है आश्वासन
नेताओं की तरह
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


फिर हमारी रेल आ जाती है
हम बैठकर चले जाते हैं
चाँवल से भी वज़नी
हमारे उपदेश और सहानुभूति
और आश्वासन
उसके झोले में लगे विवशता
के पैबन्द फाड़ प्लेटफॉर्म पर

जहाँ- तहाँ गिर जाते हैं ।


- शरद कोकास

रविवार, अगस्त 28, 2011

आज जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है ....

अपनी युवावस्था में जगमोहन कोकास 
आज मेरे पिता जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है । आठ वर्ष पूर्व 28 अगस्त 2003
को उन्होंने इस संसार से विदा ली थी ।
जगमोहन कोकास का जन्म मध्यप्रदेश के बैतूल में हुआ था और वे
कवि भवानीप्रसाद मिश्र के शिष्य थे ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने ओवरसीअर की नौकरी त्याग दी थी
और प्रायमरी स्कूल में शिक्षक की नौकरी से
शुरुआत कर अंत में बी एड कॉलेज में
प्राध्यापक बने।
उन्होंने इतिहास व हिन्दी में स्नातकोत्तर के अलावा एम एड और
प्रयाग से साहित्यरत्न भी
किया था ।
वे महाराष्ट्र के भंडारा शहर में रहे
और जीवन भर हिन्दी की सेवा करते रहे ।
यह उनके गुरू का आदेश था ।
आज प्रस्तुत है उनके द्वारा अनुवाद की गई वरवर राव की यह कविता ,
जो मुझे उनके पुराने कागज़ों में मिली ...
इसे पढ़ने के लिये इसे बड़ा करके देखें ...

पिता आज नहीं हैं लेकिन उनकी ढेर सारी तस्वीरेंऔर कुछ लेख मेरे पास हैं ।
इन्हें समय समय पर ब्लॉग पर देता रहूंगा ।
.

आज हम लोग यानि मैं , मेरी छोटी बहन सीमा , पत्नी लता और बिटिया कोपल
यहाँ उन्हें याद कर रहे हैं ..

.

शनिवार, अगस्त 20, 2011

मुझे विश्वास नहीं है सरकारी आँकड़ों पर

1984 के डिब्बे में तलाश की तो कुछ और कवितायें इसी तेवर की मिलीं । यह एक कविता जो उस वक़्त 1984 के भोपाल गैस कांड के बाद व्यवस्था का असली चेहरा दिखाने के प्रयास में लिखी थी । इसे पढ़िये और बताइये इस कविता का सन्दर्भ उस घटना के अलावा किसी और घटना से भी जुड़ता है क्या ?



2 ज़िन्दा चेहरों की तलाश


मेरे सामने है एक अखबार
जिसमें इर्द - गिर्द बिखरीं हैं
कई खबरें
लाशों की तरह
मेरे हाथों में
एक कैल्कुलेटर
जिस पर मैं कर रहा हूँ
मौत का हिसाब
जोड़ रहा हूँ क्रूरता को
घटाते हुए भावनाओं से
गुणा करते हुए बर्बरता से



मुझे विश्वास नहीं है
सरकारी आँकड़ों पर
मैं लेना चाहता हूँ जायज़ा
उन परिस्थितियों का
जिनमें मौत भी काँप उठी थी
उन दरवाज़ों पर
जहाँ धुआँ था
लाशों की गन्ध थी
संतोष का भाव लिये
अनभिज्ञता की नकाब ओढे
कुछ चेहरे
छुपे हुए मज़बूत दीवारों के भीतर
जहाँ माथे का फैला हुआ सिन्दूर था
जहाँ थी कुरआन
गीता और बाइबिल
लुढकी हुई दूध की बोतल
और उन सबके पीछे
अट्टहास करता हुआ
एक घिनौना चेहरा



कैलकुलेटर
केवल मुर्दा चेहरों का
हिसाब बता सकता है
ज़िन्दा चेहरों का नहीं

मुझे तलाश है ज़िन्दा चेहरों की
जो आज व्यवस्था की आड़ लेकर
हमारी परिधि से बाहर हैं


कैलकुलेटर
कल तुम्हारे हाथ में होगा
और तुम लगाओगे
उन चेहरों का हिसाब
जो कल ज़िन्दा नहीं बचेंगे ।


---- शरद कोकास

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

हमें जो कहनी है वह बात अभी बाकी है

कल हमारे एक मित्र मिले कहने लगे यार आजकल आँदोलन का माहौल चल रहा है ,तुम्हारी वह कुत्ते वाली कविता याद आ रही है । हमें याद आया 1984 में जबलपुर के कविता रचना शिविर में , किसान और मजदूरों के आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में वह कविता लिखी थी । और मंच पर बहुत जोश से उस कविता का पाठ भी करते थे । डॉ.कमला प्रसाद को भी मेरी उम्र और इस कविता के तेवर की वज़ह से उस समय यह कविता अच्छी लगी थी । पुरानी ही सही आप भी पढ़ लीजिये इसे ।



हमारे हाथ अभी बाकी हैं


कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे
सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है


1984 में एक आन्दोलन में झंडा उठाए कवि

उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है


हम भी शायद कुत्ते हो गये हैं
इसलिये खड़े हैं उनके दरवाजों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द
उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिये
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिये
उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिये
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है


ज़ुबाने कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं


लेकिन हम आदमी हैं कुत्ते नहीं
आओ उठे दौड़ें
और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर
हमारे हाथ अभी बाकी हैं


हमारे हाथ अभी बाकी हैं ।


- शरद कोकास


शनिवार, अगस्त 06, 2011

बुखार में प्रेम कवितायें

वैसे तो सबसे कम झमेला इस बात में है कि बीमार हुआ ही न जाये.. लेकिन इस कम्बख़्त वायरस का क्या करें , लाख बचना चाहा लेकिन बुखार आ ही गया ... और बुखार के साथ याद आई अपनी यह तीन पुरानी बुखार कवितायें ,हमारे एक मित्र ने इन्हे नाम दिया है , बुखार में प्रेम कवितायें , लीजिये आप भी पढ़िये ....


बुखार-एक

बवंडर भीतर ही भीतर
घुमड़ता हुआ
लेता हुआ रोटी की जगह
पानी को स्थानापन्न करता
रगों में खून नहीं ज्यों पानी
शरीर से उड़ता हुआ ।

 बुखार-दो

बुखार
आग का दरिया
पैर की छिंगुली से लेकर
माथे तक उफनकर बहता हुआ

छूटती कँपकपी सी
बदल जाता चीज़ों कास्वाद
साँसों का तापमान
जीभ खुश्क हो जाती
उतर जाता बुखार
माथे पर तुम्हारा हाथ पड़ते ही ।

बुखार –तीन

अछा लगता है
गिरती हुई बर्फ में खड़े
पेड़ की तरह काँपना
 जड़ों से आग लेना
शीत का मुकाबला करना
अच्छा लगता है
ठिठुरते हुए मुसाफिर का
गर्म पानी के चश्मे की खोज  में
यात्रा जारी रखना  । 

                        शरद कोकास

                      

बुधवार, जुलाई 06, 2011

मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी ?

यह बात हम सभी जानते हैं कि जिस तरह जीवन एक सत्य है ,मृत्यु भी उसी तरह एक सत्य है । फिर भी जब किसी की मृत्यु होती है हम उसे उस तरह स्वीकार नहीं कर पाते जिस तरह जीवन को स्वीकार करते हैं । ऐसा शायद इसलिये होता है कि हमने उस व्यक्ति के अस्तित्व को अपने जीवन में महसूस किया होता है और उसका विछोह हमें दुख देता है । विगत  8 जून को मुम्बई में मेरे चाचाजी का निधन हुआ । वहाँ से लौटा ही था कि समाचार प्राप्त हुआ कि 28 जून को एक और चाचा गुजर गए । परिवार के लिये यह शोक का समय है । पता है कि यह समय भी गुजर जाएगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा । फिर भी जो चला जाता है उसकी कमी तो महसूस होती है । इन दिनों बार बार याद आ रही है अपनी यह कविता जो मैंने 1995 में लिखी थी । हो सकता है मेरी तरह यह सवाल भी कभी आपके मन में आया हो ।


मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी

यह तय है कि
स्वर्ग तो नहीं जाता
नर्क भी नही जाता है आदमी
 
मरने के बाद
यह भी तय है कि
किसी दूसरी देह में
नहीं समा जाती है
आदमी की रूह

और यह तो बिलकुल तय है कि
भूत नहीं बन जाता
अधूरी इच्छायें लिये
मर जाने वाला आदमी

आओ पृथ्वी
आओ आकाश
आओ अग्नि
आओ वायु
आओ जल

सच सच बताओ
मरने के बाद
कहाँ जाता है आदमी ? 

                   - शरद कोकास

शुक्रवार, जून 03, 2011

भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सबा अंजुम के बहाने एक कविता

          
सबा अंजुम जब नन्ही सी थी जब वह हमारे घर के सामने से केलाबाड़ी स्थित सुराना कॉलेज के पीछे वाले मैदान में हॉकी खेलने जाया करती थी । उसके कोच तनवीर अक़ील अपने साथ मोहल्ले के तमाम लड़के लड़कियों को लेकर सुबह सुबह मैदान में पहुँच जाते और लगभग नौ बजे तक वे खिलाड़ियों से प्रैक्टिस करवाते । उन बच्चों को देखकर लगता ही नहीं था कि दुर्ग जैसे एक छोटे से शहर के मोहल्ले की टीम की तरह खेलने वाले इन्ही बच्चों में भविष्य की भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान भी हो सकती है ।
छठवीं कक्षा में वह मोहल्ले के हिन्दी माध्यम के शासकीय आदर्श कन्या शाला में भरती हो गई । उसके बाद वह आगे ही बढ़ती गई । जब भी वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी टीम के साथ स्वर्ण पदक लेकर लौटती उसका स्वागत बहुत ज़ोर शोर से होता । हम लोगों के लिए तो वह मोहल्ले की बेटी ही है और उसकी शिक्षिका श्रीमती लता कोकास के लिये एक प्रिय छात्रा । वह विदेश से लौटती तो मोहल्ले भर में सारे लोगों से मिलती । हमारे घर भी आती ।  ऐसे ही एक बार उसके लिए मैंने यह कविता लिखी थी सन 2002 में , दर असल सिर्फ उसके लिये नहीं बल्कि उसके जैसी तमाम बेटियों के लिये जिनमें प्रतिभा तो होती है लेकिन इस समाज में वह प्रतिभा परवान नहीं चढ़ पाती । आज उसके भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बनने पर उसकी टीचर लता कोकास के आग्रह पर यह कविता … 
आज के अखबार नई दुनिया मेँ छपी खबर 



स्वण॔पदक जीत कर लाने वाली बेटियाँ



घर में उसका आना

आने से पहले जाने में नहीं हो सका

इसलिए होने में रह गया

अपने होने में वह उसी तरह बड़ी हुई

जैसे कि और लड़कियाँ बड़ी होती हैं



अब वह बड़ी हुई तो घर से निकली

स्कूल से निकली

खेल के मैदान से निकली

और जब देश से निकली

तो स्वण॔पदक लेकर ही घर लौटी



यह  पूरा चक्र उसके पिता के चेहरे पर

इस अभिमान से स्थापित  हुआ

सबा के पहले कोच तनवीर अक़ील 
कि विश्वास ही नहीं होता था पहले कभी

वहाँ अपने आप के लिए धिक्कार था

और यह चक्र जो उसके पीछे

ठीक प्रभामंडल की तरह दिखाई देता था

उसके मित्र सहपाठी गुरुजन पड़ोसी

सभी के लिए गर्व का मुखौटा बन गया


और छोटे शहर के अखबारों के लिए

जहाँ एक छोटी सी खबर भी

बहुत दिनों तक बिका करती थी

यह सब कुछ एक बम्पर ऑफर की तरह ही था



जैसा कि उसके छोटे शहर में घट रहा था

अपनी स्थानीयता में एक उपलब्धि लिये

देश के कुछ और शहरों में घट रहा था

ऐसा इसलिये कि वह ऐसे खेल में नहीं थी

जिसमें कोई राष्ट्रीय किस्म का पागलपन शामिल हो

और युद्ध से लेकर चुनावों तक

जिसके अंतर्राष्ट्रीय उपयोग की संभावना हो



बस यहीं तक कहानी है

लता कोकास व सबा अंजुम 

एक असाधारण लड़की के इस किस्से में

और भविष्य के बखान में साधारणीकरण का खतरा है

फिर भी कथ्य के निर्वाह के लिये

यह बतलाना ज़रूरी है

कि यह दहलीज़ उसकी अंतिम दहलीज़ नहीं थी

या कि वह इस दहलीज़ से निकली तो

फिर दूसरी से नहीं निकल पाई

कोई उल्लेखनीय गोल भी नहीं कर पाई

और उसने जीवन भर सहे अत्याचार

इस समाज रूपी रेफरी के इशारों पर



वह चलती रही उसके जैसी अन्य बेटियों की तरह

भारतीय महिला हॉकी टीम 
धीरे धीरे तब्दील होती गई

माँ ,चाची .फूफी और दादी में

खेल भावना से सहती रही जीवन भर हार

लड़ती रही पुरुष के पारम्परिक दम्भ से

जिनके गिरने में ही उसका उठना और

उठने में गिर जाना था

और हौसला सिर्फ बच्चों को समझाने लायक शेष था



फिर कोई ग्लैमर नहीं रहा ज़िन्दगी में

सोने से कीमती औरतपन की कोई कीमत नहीं रही

पदक पुरस्कार ममता के तराजू पर तौले जाते रहे

जीवन भर चलती रही ज़द्दोज़हद

एक अच्छी बहू अच्छी पत्नी अच्छी माँ का

प्रमाणपत्र पाने के लिये ।

                  
                              -  शरद कोकास 




( समाचार , अखबार नई दुनिया रायपुर से साभार )  
                                                                                 

                                   


मंगलवार, मई 24, 2011

चलती हुई रेल में कवितायें

इन दिनों यात्राओं का मौसम है । शादी ब्याह , घूमना फिरना ... । मैं भी पिछले दिनों रेल में यात्राएँ करता रहा । याद आती रहीँ अपनी कुछ पुरानी कवितायें ....


चलती रेल में कविता –एक

चलती हुई रेल में
खिड़कियों के शीशे चढ़े हों
कैद हो रोशनी डिब्बे के भीतर
उस पार हो गहरा अंधेरा
काँच पर उभरते है
अपने ही धूमिल अक्स

बस इसी समय
मन के शीशे पर
उभरता है कोई चेहरा
जो मौजूद नहीं होता
चलती हुई रेल में ।

रेल में कविता –दो

सो जायें जब सब के सब
गहरी नींद में
मैं जागती हूँ उनींदी
नींद में ढ़कलते  सिर के लिये
कोई कांधा नहीं होता
कोई नहीं होता
जिससे कह सकूँ
मन की तमाम बातें

दिल की धड़कनों की
चलती हुई रेल में
साथ चलते हो तुम
लिये अपनी बातों का पिटारा ।

चलती हुई रेल में कविता –तीन
 
ठीक इसी वक्त
घड़ी ने तीन बजायें हैं
ठीक इसी वक्त
उचटी है मेरी नींद
ठीक इसी वक्त
चलती हुई रेल
ठिठकी होगी
यादों के किसी
छोटे से स्टेशन पर ।

                        शरद कोकास