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शनिवार, जुलाई 22, 2017

हर कवि अपने पूर्वज कवियों का ऋणी होता है

सुप्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण से लवली गोस्वामी की मुलाकात



कवि कुँवर नारायण के साथ लवली गोस्वामी 
 19 सितम्बर 1927 को जन्मे हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण नई कविता आन्दोलन के अग्रणी कवियों में से रहे हैं . कविता के अलावा कहानी ,लेख ,समीक्षाएँ साथ ही सिनेमा व् रंगमंच पर भी उन्होंने काफी लिखा है .उन्होंने कवासी और बोर्खेस की कविताओं के अनुवाद भी किये हैं .
कुँवर नारायण जी इन दिनों काफी बीमार हैं उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ है और वे कोमा में हैं . लगभग दो माह पहले  हमारी मित्र और हिंदी की युवा कवि लवली गोस्वामी उनसे मिलने उनके निवास पर गईं थीं . प्रस्तुत है उनकी कलम से इस मुलाकात का विवरण, जो संस्मरण भी है ,साक्षात्कार भी और अपने प्रिय कवि से मुलाकात के बहाने अपने साहित्यिक पुरखों के ऋण से उऋण होने का एक प्रयास भी - शरद कोकास

“ मैं  दिग्भ्रमित नहीं, एक जानकार की उदासीनता हूँ.” (कुँवर नारायण)


मैं उनके घर के सामने से गुजरने वाली गली में खड़ी थी. मुझे घर नंबर तो सही दिख रहा था,  लेकिन मैंने “बेल” गलत वाली दबाई। वहां मौजूद दो स्विचों में से मुझे निचली मंजिल की घंटी वाली स्विच दबानी थी। अक्सर ऐसा होता है, पता नहीं किन विचारों में घिरी रहती हूँ कि उजबक और हास्यास्पद गलतियां दोहराती रहती हूँ। जैसे जिस दरवाजे पर साफ़ "पुश " लिखा हो उसे अपनी तरफ खींचकर खुद को और लोगों को परेशां करना फिर माफ़ी मांगना और खुद को कोसना।

उपरी मंजिल से एक महिला की आकृति मुझे सवालिया निगाहों से देखती पूछती है – “..यस ?”
"जी, मुझे कुँवर नारायण जी से मिलना है" मैं जवाब देती हूँ.
“ग्राउंड फ्लोर ”वह नीचे की तरफ इशारा करती है. शायद तब तक उनके पुत्र अपूर्व नारायण जी जिन्हे मैंने फोन करके अपने आने की सूचना दी थी और कुंवर जी से मिलने का वक़्त लिया था, मेरी आवाज सुन लेते हैं। बीसेक साल का एक युवक कुछ क्षणों में मेरे सामने प्रकट होता है और विनम्रता पूर्वक कहता है - "आइए... ". मैं उसके पीछे चलती हूँ। वह एक दरवाजा पार करके मुझे एक छोटे  कमरे तक ले जाता है. वहां मुझे अपूर्व खड़े  मिलते हैं. मैं उन्हें नमस्ते कहती हूँ। खिड़की के पास कोने में पड़े एक सोफे एक सौम्य महिला आकृति विराजमान है. ये भारती जी होंगी ऐसा मैंने अंदाजा लगाया। उन्हें नमस्ते कहा.

थोड़ी देर बाद कुँवर जी को सहारा देकर बैठकी में लाया जाता है। मुझे बताया गया था वे एक कान से सुनने में पूरी तरह असमर्थ है और अभी– अभी डाक्टर से चेकअप करा कर लौटे हैं। दो दिनों से वे एक कान से सुनने में असमर्थ हैं , देख तो वे बहुत दिनों से नहीं पाते। उन्हें मेरे आने के बारे में पहले से मालूम है। वे मेरी हथेलियाँ थामने के लिए दोनों हाथ आगे करते हैं, मेरा नाम लेकर बुलाते है, मैं उनकी कुर्सी के पास बैठती हूँ, भारती जी मुझे एक छोटा स्टूल देती हैं। मैं अन्दर – अन्दर भींग रही थी, करुणा, आदर और प्रेम से, या इन सब के मिले –जुले से किसी अन्य भाव से।

वे मेरा नाम भर जानते हैं। थोडा रुककर परिचय पूछते हैं,मैं कुछ बताती हूँ अपने बारे में। वे सुन नहीं पा रहे थे या, शायद मैं बोल नहीं पा रही थी। उनसे बातें करने के लिए मुझे बार – बार भारती जी की मदद लेनी पड़ती है। मुझे स्वीडिश कवि टॉमस ट्रांस्त्रोमर से जुडी एक घटना याद आती है। जीवन के अंतिम सालों में उन्हें पक्षाघात की समस्या हो गई थी जिससे उनके शरीर के दाहिने भाग ने काम करना बंद कर दिया था। उस वक़्त टॉमस ठीक से बोल नहीं पाते थे किसी से संवाद करने के लिए उन्हें पत्नी मोनिका की सहायता लेनी पड़ती थी। जीवन के कई साल मोनिका ही उनकी आवाज बनी रहीं। वे संगीत के बहुत अच्छे जानकार थे। उन्होंने ऐसी धुनें बनायीं जिन्हें एक हाथ से बजाया जा सके। वे अक्सर अपने भाव संप्रेषित करने के लिए संगीत का सहारा लेते थे। आयरिस नोबल विजेता कवि सेमस हेनी ने एक बार टॉमस पर टिप्पणी करते हुए कहा था,  जब वे बोल पाने में असमर्थ थे, उन्होंने अपनी बात मुझ और मोनिका तक प्रेषित करने के लिए कई बार संगीत का सहारा लिया। सच ही लगता है, जब आपका भावबोध इतना परिष्कृत हो की शब्दों की ज़रूरत न पड़े तो यह बात बहुत अजीब नही लगती। लेकिन मुझे संगीत बुनना नहीं आता है, और बोलना या कम से कम अपनी भावना संप्रेषित करना मेरे लिए इसलिए भी ज़रूरी है कि कुंवर जी मुझसे पहली बार मिल रहे हैं. मैं जानती हूँ कि संगीत न सही दुनिया की सबसे आदिम भाषा अब भी उतनी ही सटीक है, स्पर्श की भाषा। मैं उनकी उंगलियों के पोर और नाख़ून हलके – हलके से स्पर्श करती हूँ। उनके पास बैठी कुछ बोलने की, अपने कुछ शब्द उन तक पहुँचाने की कोशिश करती हूँ, जिसमे भारती जी मेरी हर संभव मदद करती हैं। भारती जी को इन कोशिशों में मुब्तिला देखते - सुनते मेरे मन में कुँवर जी की पंक्तियाँ कौंधती हैं.

“ स्त्री - पुरुष के संबंधों का अर्थ
साधना में विघ्न डालती अप्सरायें ही नहीं
एक ऋषि की सौम्य गृहस्थी भी हो सकती है.”

ऐसा ही मुझे ट्रांस्त्रोमर के साथ उनकी पत्नी मोनिका को वीडियो में देखकर लगा था.

“ सादगी अभाव नहीं
एक संस्कृति की परिभाषा है... “


एक बार मैंने लिखा था – “ भव्यता निस्तब्धता से भर देती है.  भव्यता संक्रमित भी करती है.ऊँचे पहाड़ उंचाई के अकेलेपन से आक्रांत करके आपको स्थिर कर देते हैं. श्मशान अपनी नीरवता, अपनी मनहूसियत का कुछ हिस्सा आपको निराशा के रूप में सौंप देता है.चंचल नदियाँ आपके अंतर में तरल कुछ छेड़ जाती हैं. भव्य ईमारतें आप में संभ्रात और पुरातन स्मृतियाँ जीवित कर देती हैं असीम   समुद्र आपको गहरे चिंतन में धकेल देता है और आकाश का विस्तार आप में शून्य भर देता है. यह सब भव्यताएँ हैं , संक्रमित करने वाली भव्यताएं.आप में खुद को भरने वाली भव्यताएं. ” 

इस वक्त जिस इन्सान के सामने मैं बैठी हूँ वह भी मेरे लिए ऐसी ही एक सकारात्मक भव्यता है. मैं भव्यताओं के समक्ष अक्सर शब्दहीन हो जाती हूँ. मेरा “कम बोलना” “न बोलने” में बदल जाता है.
  
**
“तुम्हे मेरी कविता में क्या पसंद है ?”
वे मुझसे सवाल करते हैं, जब मैं उन्हें बताती हूँ कि मैंने आपको लगभग पूरा पढ़ा है। लगभग इसलिए कि यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक उनका संग्रह “चक्रव्यूह” और सिनेमा पर लिखी उनकी नयी किताब “लेखक का सिनेमा ” मेरे पास नहीं हैं। मैंने सिर्फ यही दो किताबें नहीं पढ़ीं हैं। मैंने कहा मुझे आपकी “सरलता” पसंद है। वे सुन न सके। भारती जी ने मेरा जवाब दोहराया। फिर बातें होती रही. दर्शन, साहित्य, इतिहास और कला के समकालीन और ऐतिहासिक सन्दर्भ, व्यक्ति, स्थान और किताबें हमारे बीच आते – जाते रहे। मैं उन्हें देखती उनकी कविता की स्मृतियों में डूब रही थी. मैं उनके हाथ देखती हूँ.

“अब मेरे हाथों को छोड़ दो
गहरे पानी में
वे डूबेंगे नहीं
उनमे समुद्र भर आएगा  ...”

मैं उस कवि से बात कर रही थी, जो कवि की मासूमियत से नहीं, एक द्रष्टा के दर्प से, दर्शन की वस्तुगतता से मनुष्यता की कोमलता की तरफ लौटता है. साथ ही साथ मैं उनकी कविता से भी बात कर रही थी। जब एक कवि की वाणी में द्रष्टा का दर्प मौजूद हो तो यह समझाना चाहिए कि इस दर्प की जड़ें जीवनानुभाव की अथाह गहराइयों में सुदूर कहीं गड़ी होंगी। कविता, जलीय पौधे के फूल की तरह होती है जो सतह तक जीवित रहने के सामर्थ्य और जिद का कलात्मक सुन्दर रूप बनकर पहुँचती है. फूल को सतह तक पहुचने के लिए प्रकाश की अदम्य चाह होनी चाहिए। इसके साथ ही उसकी रीढ़ में, गहराइयों में व्याप्त अँधेरे और जल के अथाह दबाव से लड़ने का सामर्थ्य भी होना चाहिए। कविता वह जलीय फूल है, जो दुखों, प्रश्नों और विकलता के उन बीजों से पैदा होती है जो हमारे मन में, अनुभवों में, गहरे कहीं दफ्न होते जाते हैं. असमंजस और कई तरह के दूसरे मानसिक दबावों से जूझती कवि के अथाह अंधकार से निकलकर कविता  वैसे ही काग़ज तक पहुँचती है, जैसे कोई फूल पानी की सतह से उपर तक। अधिकतर पढ़ने वाले सिर्फ उसका दृश्य रूप या “साकार” होना पढ़ पाते हैं, जो पीडाएं कविता की जननी होती है उसे कितने लोग समझ पाते हैं ?

“ किसी के सामने टूटने से बेहतर है
अपने अन्दर टूटना ..”

बीज का अस्तित्व भी नवांकुर पौधे  के दो-पहले पत्तों और जड़ोंका आकर लेने में “टूटता” ही है।

--

कुंवर नारायण, जो इंगित करते हैं कि “वहां विभाजित स्वार्थों के जाल बिछे दिखते/ जहाँ अर्थपूर्ण संधियों को होना चाहिए”, संतुलन के कवि है, सरलता के कवि है, दार्शनिकता के कवि है, तीनों वाक्यों को मिलाकर कहा जाए तो एक संतुलित दार्शनिक - सरलता के कवि है। अपनी ही कविता में वे स्पष्ट कहते हैं “अति को जानो/ वहां ठहरो मत/ लौटो/ अपने अन्दर उसी संतुलन बिंदु पर/ जहाँ संभव है समन्वय..” ये समन्वय, ये संतुलन ही, बार –बार उनकी दर्पिली ध्वनि का मूलभाव बनकर उनके कवितार्थों को आलोकित करता है। वे कठिन कटु सत्यों को कहते हुए भी अतिशय तिक्त नहीं होते. क्योंकि वे तीक्ष्णता को जानकर उसे अस्वीकार करके लौट चुके हैं.

“मैं उन चेष्टाओं की
शेष पूंजी हूँ
जिसे तुम नहीं समय प्राप्त करेगा “

कोई भी कविता सिर्फ कवि की अपनी चेतना की उपज नहीं होती। कई प्रकार से वह पूर्वज कवियों का ऋणी होता है। कोई साधारण मनुष्य भले ही कविता की भूमिका को अपने जीवन में नकार दे लेकिन कोई भी पढ़ा – लिखा मनुष्य इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि जो  शब्द, वाक्य- रचना,कहावत, भावाभिव्यक्ति के औजार अथवा बिम्ब वह अपनी सामान्य बातचीत में इस्तेमाल कर रहा है वे कहीं न कहीं साहित्य की देन हैं। इस तरह जो भी कविता नयी लिखी जाती है उसमे गुजर चुके या गुजर रहे कई कवियों की ध्वनि होती है. यह ध्वनि सिर्फ तब ही होगी जब आप कविता की परम्परा का अध्ययन करेंगे, ऐसा नहीं है। जानते न जानते, चाहते न चाहते हम अपनी भाषा में कविता लेकर आते ही हैं, भले ही वह लोकप्रिय सिनेमा के असर से आये या सदियों से चली आ रही मिथकीय अथवा लोक – साहित्य की वाचिक परम्परा से. इस समय में लिखी जा रही हर कविता अपनी पूर्वज कविताओं की संतान है. अपने पितरों का आभार प्रकट करना उसका विनम्र कर्तव्य है. वैसे तो यह  पुनीत कर्तव्य समाज का भी है कि वह भाषा को बनाने के लिए साहित्यकारों का आभार प्रकट करे।
 
जब कोई कवि भाषा में कविता रच रहा होता है, ठीक उसी समय कविता अपने रचे जाने के समानांतर उस भाषा को भी रच रही होती है, और तो और कविता “कवि” को भी रच रही होती है.

**
“ मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ
अपनी नास्तिकता में अधिक धार्मिक
अपने अकेलेपन में अधिक मुक्त
अपनी उदासी में अधिक उदार “
(आत्मजयी)

कुँवर नारायण जी के तीनों प्रबंध काव्यों में “सरलता” एक अंतरिम लय की तरह बहती है, कुछ – कुछ विवाल्दी के संगीत की तरह। जिसमे नरम ढलान से नीचे की ओर बहते पानी की धार की अटूट लय होती है. साथ ही साथ एक विनम्र वेग भी होता है। इस सौम्य कलकल में उन बूंदों का तादात्म्य भी मौजूद है जो ढलान की समरूपता टूटने से उछलती शेष जलराशि से अलग होती सी लगाती है लेकिन वेग इतना प्रचंड नहीं होता कि कोई भी बूंद छिटक कर उतनी दूर जा गिरे कि खुद को अनाथ महसूसे। विवाल्दी का संगीत भी मुझे ऐसा ही लगता है. सौम्य, लयात्मक, भव्य और एकसार। कुँवर नारायण जी का व्यक्तिव भी ऐसा ही है लयात्मक और सौम्य लेकिन अपनी विनम्रता में भव्य।
 
मैं उन्हें इस अवस्था में अधिक परेशां नहीं करना चाहती, इसलिए लौटती हूँ,इस निश्चय के साथ कि जो अब लौटी तो कृतज्ञतर लौटूंगी ।
-
लवली गोस्वामी

( लेख में जो कविता पंक्तियाँ उपयोग की गयी हैं. कुँवर नारायण की कविताओं से ली गयी हैं. )

शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2016

लवली गोस्वामी की कविताएँ

लवली गोस्वामी मूलतः दर्शन और मिथक शास्त्र की स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं कवयित्री  हैं . पिछले साल प्रकाशित उनकी पुस्तक ' प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता ' काफ़ी चर्चा में रही . लवली बहुत दिनों से सैद्धांतिक लेखन में सक्रिय हैं . वे कविताएँ भी लिखती हैं . इस बार प्रस्तुत है उनकी तीन कविताएँ जो साहित्यिक पत्रिका 'सदानीरा ' में प्रकाशित हैं ,पत्रिका से साभार - शरद कोकास 



मेरी कल्पना में तुम

थकान की पृथ्वी का बोझ पलकों पर उठाए
पुतलियाँ  अतल अंधकार में डूब जाना चाहती हैं
पर देह एक अंतहीन सुगबुगाहट के साथ जागना चाहती है
बारिश के बाद हरियाती पीली फूस  जैसे  सर उठाते
दरदरी मिट्टी के कण स्नेह से झटक देती है
ठीक वैसे ही  रोम - रोम कौतुक से ऊँचककर तुम्हें देखता है  

आत्मा की आँखें त्वचा पर दस्तक देती हैं
शताक्षी की देह में उगी पलकों की तरह 
प्रत्येक रोमकूप में आँखे उगी हैं
अवश देह रोओं की लहलहाती फसल बीच
तुम्हारी उपस्थिति बो रही है
स्मृतियों के तमाम हरकारे कानों में धीरे से फुसफुसाते हैं
तुम देह का कोलाहल नहीं हो, कलरव हो
तुम मन की प्रतीक्षा नहीं हो, सम्भव हो 

अवसाद के नर्क के सातवें तले में
तुम्हारे मन के प्रवेश -  कपाट खुलते हैं
देहरी से आते धर्मग्रंथों के उजाले के विरुद्ध सर झुकाये तुम
देवदूत गैब्रियल की शक्ल लिए दिखाई देते हो

कुँवारी मैरी तक ईश्वर का सन्देश पहुँचाने के एवज में तुम पर
धर्मधिकारियों  द्वारा पवित्रता नाशने का अभियोग लगाया गया है
बतौर सजा तुम्हारे पंख नुचवा लिए गए हैं
पँखों की लहूलुहान कतरने लेकर तुम 
सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी में वहाँ चढ़ जाते हो
जहाँ से निर्बल असहाय पक्षी आत्महत्या करते हैं

दुखी मन से शेष बचे सफ़ेद पंख नोचकर
तुम उन्हें पहाड़ से नीचे उछाल देते हो
वे पंख नभ की आँखों से झरने वाले पानी के बादल बन जाते हैं
हर वर्षा ऋतु सृष्टि तुम्हारी पीड़ा का शोक मनाती है

अंधकार अब घटित हो रहा है
पलकें अब स्वप्नों का दृश्य - पटल है
मेरी कल्पना में तुम पद्मासन लगाये सिद्धार्थ में तब्दील गए हो
इस दृश्य में तुम बोध प्राप्ति के ठीक पहले के बुद्ध हो
मैं तुम्हारी गोद में पड़ी अर्धविकसित अंडे में बदल गई हूँ

तुम्हारी देह की ऊष्मा से पोषण पाकर 
अपने प्रसव की आश्वस्ति में नरमी से मुस्कुराती मैं
अपनी कोशिकाओं को निर्मित होता देखती हूँ
उठकर जाने की बाध्यता से डरकर तुम
मेरे सकुशल जन्म तक बोध - प्राप्ति की अवधि बढ़ाते जाते हो

मैं मुलमुलाती अधखुली पलकों से देखती हूँ
तुम सफ़ेद रौशनी की तरह दिखते हो
अर्धविकसित धुंधले मन से सोचती हूँ
तुम दुःख के कई प्रतीकों में ढल जाते हो

मैं देखती हूँ हर प्रतीक्षा दरअसल एक अभ्यास है
अभिसार की प्रतीक्षा प्रेम का अभ्यास है
प्रसव की प्रतीक्षा मातृत्व का अभ्यास है
बुद्धत्व की प्रतीक्षा मोहबद्धता का अभ्यास है.


नींद के बारे में

वह मुझसे पहले सोने जाता और मुझसे पहले जागता था
मैं अक्सर लिखते - लिखते सर उठा कर कहती तुम सो जाओ
मैं बाद में आकर तुम्हारे पास सो जाउंगी

मैं उसके साथ सोती थी
जैसे दरारों में देह को दरार का ही आकार दिए जोंक सोती है
संकीर्ण दुछत्तियों  में थककर चंचल बिल्लियाँ सोती है  
धरती की देह पर शिराओं का - सा आकार लिए नदियाँ सोती है
नाल काटे जाने के ठीक बाद नाक से साँस लेने का अभ्यास करता शिशु सोता है
जैसे धरती आकाश के बीच लटके मायालोक में त्रिशंकु सोता होगा

सोने की क्रिया
हमेशा मेरे लिए एक प्रकार की निरीहता रही
पराजय रही
जागना एक सक्रियता
एक आरोहण

वह ताउम्र मुझसे कहता रहा
"
कभी सोया भी करो बुरी बात नहीं"
मैं इस अच्छी बात को रोज उसके चेहरे पर होता देखने के लिए जागती रही
मैं कहती रही किसी को सोते देखना सुख देता है
वह समझदार मेरी इस समझ को नासमझी कहकर
मुझे सुलाने की कोशिश करता रहा  

वैसे तो सोया हुआ आप रात को तालाब के जल को भी कह सकते हैं
उसके भीतर आसमान गतिमान रहता है
सब तारे उस पर झुक - झुक कर अपना चेहरा देखते हैं
मैं भी उसे सोते हुए मुस्कुराते देखकर
उसकी आत्मा में अपनी उपस्थिति देखती थी

मेरे अंतस में वह ऊर्जा के केंद्र के जैसा ही था
पृथ्वी के कोर में पिघले खनिज की तरह
महावराह की तरह जब वह जल के सीमाहीन विस्तार पर
मुझे हर जगह तलाश रहा था
मैं उसके अंतस में जलप्लावित पृथ्वी सी समाधिस्थ थी
आप कह सकते हैं वह दिपदिपाता गतिमान मेरे अंदर सो  रहा था
मैं अनवरत घूमती दिन -रात के चक्कर काटती उसके अंदर जाग रही थी

अगर देह ब्रह्माण्ड है तो प्रत्येक नींद प्रलय है
जो स्वप्न अगली सुबह स्मृति में शेष रह जाते हैं
वे नूह की नौका में बचे जीवित पशु - पक्षी हैं
यही स्मृतियाँ हमें आने वाले कल्प से दिन में
जीने के लिए माकूल कोलाहल बख़्शती है

पलकें नियामत हैं
(
आप पर्दे भी पढ़े तो चलेगा )
वरना जरा सोचिये कैसा लगता होगा
जब नींद में मगरमच्छ को आते देखकर भी मछलियों की नींद नहीं टूटती होगी
वह अंतिम भयानक सपना तो याद होगा आपको
जिसने आपको न जाग पाने की विवशता का परिचय दिया होगा
वही आपके मन के सबसे अँधेरे कोने में छिपे डर का सपना
जो नुकीले दातों से आपको कुतर देता है पर आपकी नींद नही खुलती
नींद आश्वस्ति है
जागना अविश्वास है
तो बताइये आप मछलियों को क्या देना चाहेंगे
आश्वस्ति या अविश्वाश ?

मछलियाँ खुली आँखों से सच्ची निरीह नींद सोती हैं
बगुले सोने का अभिनय करके झपट कर शिकार पकड़ते हैं
दुनिया के तमाम घोड़े खड़े – खड़े सोते हैं
जबकि उल्लू दिन की रौशनी को अनदेखा करके सोते हैं
सोना कतई सामान्य प्रक्रिया भर नहीं है
एक चुनी हुई आदत है 
उससे भी बढ़कर एक साधा हुआ अभ्यास है.



मेरे लिए प्रेम मौन के स्नायु में गूंजने वाला अविकल संगीत है
तुम्हारा मौन प्रेम के दस्तावेजों पर तुम्हारे अंगूठे की छाप है

रात का तीसरा प्रहर कलाओं के संदेशवाहक का प्रहर होता  है 
जब सब दर्पण तुम्हारे चित्र में बदल जाते हैं
मैं श्रृंगार छोड़ देती हूँ
जब सुन्दर चित्रों की सब रेखाएं
तुम्हारे माथे की झुर्रियों का रूप ले लेती हैं  
मैं उष्ण सपनों के रंगीन ऊन पानी में बहाकर
सर्दी की प्रतीक्षा करती हूँ 

सर्दियाँ यमराज की ऋतु है
सर्दियाँ पार करने के आशीर्वाद हमारी परम्परा हैं
*
पश्येम शरदः शतम्
**
जीवेम शरदः शतम्
मृत्यु का अर्थ देह से उष्णता का लोप है
तो शीत प्रेम का विलोम है 
अक्सर सर्दियों में बर्फ के फूलों सा खिलता तुम्हारा प्रेम मेरी मृत्यु है

तुम मृत्यु के देवता हो
तुम्हारे कंठ का विष अब तुम्हारे अधरों पर है
तुम्हारे बाहुपाश यम के पाश हैं
सर्दियों में साँस - नली नित संकीर्ण होती जाती है
आओ कि  आलिंगन में भर लो और स्वाँस थम जाये
न हो तो बस इतने धीरे से छू लो होंठ ही
कि प्राणों का अंत हो जाये

तुम मेरी बांसुरी हो
प्रकृतिरूपा दुर्गा की बाँसुरी
तुममे सांसों  से सुर फ़ूँकती मैं
जानकर कितनी अनजान हूँ
छोर तक पहुंचते मेरी यह सुरीली साँस
संहार का निमंत्रण बन जायेगी

 
मेरे बालों में झाँकते सफ़ेद रेशम
जब तुम्हारे सीने पर बिखरेंगे
गहरे नील ताल के सफ़ेद राजहंसों में बदल जायेगे
ताल, जिसे नानक ने छड़ी से छू दिया कभी न जमने के लिए
हंस, जो लोककथा में बिछड़ गए कभी न मिलने के लिए
मेरे प्रिय अभागे हरश्रृंगार इसी प्रहर खिलते हैं
सुबह से पहले झरने के लिए
सृष्टि के सब सुन्दर चित्र मेरा - तुम्हारा वियोग हैं

मेरे मोर पँख, कहाँ हो
मेरा जूडा अलंकार विहीन है
मेरी बांसुरी, मेरी सृष्टि लयहीन है.
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-लवली गोस्वामी 


# "पश्येम शरदः शतम्" -हम सौ शरदों तक देखें, सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे.
#"
जीवेम शरदः शतम् "  -हम सौ शरदों तक जीवित रहें .

- लवली गोस्वामी