1984 की कविताओं के पश्चात अब आते हैं 1985 की कविताओं पर । आक्रोश तो इन कविताओं में भी है .. स्वाभाविक है .. उम्र ही कुछ ऐसी थी , और इस उम्र में इतना आक्रोश तो जायज़ है ना ?
सोने से दमकते हुए हमारे चेहरे
गूगल से साभार
आग आग है आग कब तक रुकेगी
आग पेट से उठती है पहुंचती है दिमागों तक भूख कोसती है परिस्थितियों को रह जाती है खाली पेट ऐंठन आक्रोश सिमटता है मुठ्ठियों में मुठ्ठियों को हवा में उछालने की ताकत मुहैया होती है रोटी से लेकिन.... रोटी तो तुमने छीन ली है और खिला दी है अपने पालतू कुत्तों को
आग आग है फिर भी बढ़ती है चिंगारियाँ आँखों से निकलती हुई ताकत रखती है तुम्हे भस्म कर देने की लेकिन.... तुमने चढ़ा लिया है मुलम्मा अपने जिस्म पर
आग उठती है होठों से बरसती है लेकिन तुमने पहन लिये हैं कवच जिन पर असर नहीं होता शब्द रूपी बाणों का
आग अब पहुंचती है हमारे हाथों तक
अब हमारे हाथों में सिर्फ आग होगी और उसमें होंगे सोने से दमकते हमारे चेहरे
सुबह सुबह मुँह खोलो तो निकलती है ढेर सारी भाफ़ ..ऐसा लगता है कोई चाय की केटली रखी हो दिल के भीतर । आलिंगन के लिये बढ़ते हुए हाथ गर्म कम्बल की तरह दिखाई देते हैं , सुबह की गुनगुनी धूप में मफलर से लिपटा हुआ कोई चेहरा गाज़र के हलुवे की प्लेट सा लगता है ।दोपहर , जल्दी बाय बाय कहकर चली जाने वाली प्रेमिका की तरह और शाम नकाब पहनकर आती किसी खातून की तरह लगती है । रात पेट भरने के बाद रज़ाई में घुसते समय सुख के अहसास में इतनी उछल कूद होती है मानो कोई ज़लज़ला आ गया हो ।
माफ कीजियेगा ..यह सारे सुविधाभोगी जीवन के बिम्ब हैं ।.लेकिन उन करोड़ों लोगों का क्या जिन्हे कड़कड़ाती ठंड में भी यह सब नसीब ही नहीं है । अभी उस दिन एक दोस्त ने कहा कि उसे ठंड अच्छी नहीं लगती ..सुबह सुबह अखबार में ठंड से मरने वालों की संख्या देखकर वह काँप जाता है ।
लेकिन कोई तो है ..जो इस भयानक ठंड से लड़ने के लिये तैयार बैठा है ..वह मेरे देश का आम आदमी है जिसे उसका दुश्मन नज़र तो आ रहा है ऐसा दुश्मन जिसके चेहरे पर शोषक की एक ठंडी मुस्कान है ..लेकिन इस ग़रीब आदमी के पास उसका मुकाबला करने के लिये कुछ नहीं है ..कुछ है तो बस दिमाग़ में विद्रोह की एक आग और समूह की ताकत .. लीजिये ..कविता पढ़िये ..