कविता ही ज़िन्दगी हो जहाँ ऐसी एक दुनिया है यहाँ...शरद कोकास कोश में पढ़िए शरद कोकास और मित्रों की कविताएँ और लेख
शुक्रवार, जून 08, 2012
1988 की कवितायें नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –तीन
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
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सच मे बडी बात कही। कैसे हैं कोकास जी? बहुत दिनो बाद आने के लिये क्षमा चाहती हूँ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद निर्मला जी । अच्छा हूँ । आप की कुशलता की कामना करता हूँ ।
हटाएंसच है, हमारा पूर्वश्रम ही तारे गिनने में होने वाला श्रम बचा लेता है।
जवाब देंहटाएंयह तो एकदम नई व्याख्या है भाई !
हटाएंसुन्दर कविता, और सच मे एक दम नई व्याख्या / बल्कि नया थॉट !! प्रवीण पाण्डेय संक्षिप्त लेकिन प्रेरक टिप्पणियाँ देते हैं .
जवाब देंहटाएंलेकिन हमारी छत के कारण ही वे तारों के सौन्दर्य से भी वंचित रहते हैं । सुन्दर प्रयोग ।
जवाब देंहटाएं"उनके और तारों के बीच
जवाब देंहटाएंहमेशा एक छत होती है
हमारी मेहनत से बनाई हुई।"
बहुत खूब...!
तब तो हम सब इस अपराध के भागी हुए । ऐसी छत के नीचे तो हम भी सोते हैं खास कर अब जब छत पे सोना दूर की बात हो गई ङै ।
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