रविवार, मई 03, 2026

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको







अदम गोंडवी साहब की रचना 


आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

गुरुवार, अप्रैल 30, 2026

अंजू शर्मा की कविता - चालीस साला औरतें

                   मित्रों के साथ अंजू शर्मा 

आज ब्लॉग पर प्रस्तुत है इस दौर की महत्वपूर्ण कवि कथाकार अंजू शर्मा की यह चर्चित कविता "चालीस साला औरतें" अंजू शर्मा दिल्ली में रहती हैं । उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

चालीस साला औरतें


इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर

बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि

वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,

ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं

ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है
जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें,
ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,
पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,

जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं...



---अंजू शर्मा

बुधवार, अप्रैल 22, 2026

नासिर अहमद सिकंदर-विफल प्रेम की कविताएँ – -चार


शरद कोकास के कंप्यूटर पर नासिर अहमद सिकंदर

चार

जब स्कूल में
बच्चों को तुम पढ़ाती होगी

पहला अक्षर अनार
तो याद आता होगा
तुम्हारे गालों को
मैंने कभी कहा था- अनार
गिनती सिखाते वक्त बच्चों को

जब छब्बीस में पहुंचती होगी तुम .
हो याद आता होगा |
तुम्हारी इसी उम्र में
मुलाकात हुई थी अपनी

बच्चों को तुम
प्रेम का समानार्थी शब्द
न बता पाती होगी अब

या जीत का विरुद्धार्थी शब्द
मुश्किल से बता पाती होगी

प्रस्तुति :शरद कोकास

नासिर अहमद सिकंदर -विफल प्रेम की कविताएँ – -तीन

तीन


चांद कहाना
पसंद न था उसे

फूल कहता
तब भी चिढ़ जाती

कोयल कहता
तो कहती..उंह
काली काली कोयल
उफ़ चिड़िया
तब भी चुप

थक हारकर अपना कहता
यही कहना - कहाना
पसंद था उससे.

नासिर अहमद सिकंदर -विफल प्रेम की कविताएँ- दो

 दो

समुद्र के पास जाऊंगा एक दिन 

तुम्हारी आंखों के लिये
भीख में मांगूगा
उसके जल का नीलापन

चांद के पास जाऊंगा एक दिन
उससे कहूँगा
उतर आये तुम्हारे चेहरे में
अपने जिस्म से
नसें निकालूंगा एक दिन
उनमें पिरोऊंगा तारे
और चेन की जगह
डाल दूँगा गले में

x

नासिर अहमद सिकंदर - विफल प्रेम की कविताएँ – -एक






एक 


मुझे उसके बाल बहुत पसंद थे
उसके बाल इतने घने और लंबे थे
कि उन्हें फैलाकर और तानकर
बनाया जा सकता था
एक आसमान

उसके बालों से
बनाई जा सकती थी एक छत
और रहा जा सकता था उम्र भर

फांसी का फंदा भी तो हो सकते थे बाल

उसके बाल इतने नर्म और मुलायम थे
कि यह हो ही नहीं सकता था

मुझे उसके बाल बहुत पसंद थे


x

बुधवार, जून 10, 2020

देवताओं के वंशज


समुद्र मंथन के बाद
बचे हुए देवताओं के
तथाकथित वंशज
मानवता को मथते हुए
हवस के हाथों
बटोर रहे हैं
सोना- चांदी, महल - सिंहासन
अधिकार और कानून

उंडेल रहे हैं
आम आदमी के सपनों में
धर्म का खौफ़
भविष्य का भटकाव
भाग्यवाद का गरल

पुराणकथाओं से
उद्ध्रत करते हुए
दानवी अत्याचारों के प्रसंग
घूम रहे हैं खुले आम
आदमी के भेष में

वे जिनके उपदेशों की रोटी
बत्तीस बार चबाने पर
मीठी लगती है
वे जिनके पाँव
स्वार्थ की पूजा में
सिन्दूर लगे पत्थरों से बड़े हो जाते हैं

देवता का मुखौटा पहने
मायावी राहु केतुओं की
भीड़ बढ़ रही है
मनुष्य की कतारों में ।

-  शरद कोकास