रविवार, मई 10, 2026

अनामिका की कविता ‘अनब्याही औरतें’




अनामिका हिंदी की प्रतिष्ठित कवि हैं उनके संकलन हैं गलत पते की चिट्ठी (कविता), बीजाक्षर (कविता), अनुष्टुप (कविता), अब भी वसंत को तुम्हारी जरूरत है (कविता)(2004); दूब-धान (कविता)(2007)’टोकरी में दिगन्त’ कविता-संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (2021)। रूसी भाषा में कविताओं के अनुवाद। ख़ुद भी अंग्रेज़ी से लगातार अनुवाद। पुरस्कार/सम्मान : राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान द्विजदेव सम्मान केदार सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित


अनामिका की कविता ‘अनब्याही औरतें’

"माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की, माई री!"
जब भी सुनती हूँ मैं गीत, आपका मीरा बाई,
सोच में पड़ जाती हूँ, वो क्या था
जो माँ से भी आपको कहते नहीं बनता था,

हालांकि संबोधन गीतों का
अकसर वह होती थीं!

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल में पिछवाड़े का ढाबा!
दस बरस का छोटू प्यालियाँ धोता-चमकाता
क्या सोचकर अपने उस खटारा टेप पर
बार-बार ये ही वाला गीत आपका बजाता है!

लक्षण तो हैं उसमें
क्या वह भी मनमोहन पुरुष बनेगा,
किसी नन्ही-सी मीरा का मनचीता.
अड़ियल नहीं, ज़रा मीठा!

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल की हम सब औरतें
ढूँढती ही रह गईं कोई ऐसा
जिन्हें देख मन में जगे प्रेम का हौसला!

लोग मिले - पर कैसे-कैसे -
ज्ञानी नहीं, पंडिताऊ,
वफ़ादार नहीं, दुमहिलाऊ,
साहसी नहीं, केवल झगड़ालू,
दृढ़ प्रतिज्ञ कहाँ, सिर्फ जिद्दी,
प्रभावी नहीं, सिर्फ हावी,
दोस्त नहीं, मालिक,
सामजिक नहीं, सिर्फ एकांत भीरु
धार्मिक नहीं, केवल कट्टर


कटकटाकर हरदम पड़ते रहे वे
अपने प्रतिपक्षियों पर -
प्रतिपक्षी जो आखिर पक्षी ही थे,
उनसे ही थे.
उनके नुचे हुए पंख
और चोंच घायल!

ऐसों से क्या खाकर हम करते हैं प्यार!
सो अपनी वरमाला
अपनी ही चोटी में गूंथी
और कहा खुद से -
"एकोहऽम बहुस्याम"

वो देखो वो -
प्याले धोता नन्हा घनश्याम!
आत्मा की कोख भी एक होती है, है न!
तो धारण करते हैं
इस नयी सृष्टि की हम कल्पना

जहाँ ज्ञान संज्ञान भी हुआ करे,
साहस सद्भावना!

रविवार, मई 03, 2026

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको







अदम गोंडवी साहब की रचना 


आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

गुरुवार, अप्रैल 30, 2026

अंजू शर्मा की कविता - चालीस साला औरतें

                   मित्रों के साथ अंजू शर्मा 

आज ब्लॉग पर प्रस्तुत है इस दौर की महत्वपूर्ण कवि कथाकार अंजू शर्मा की यह चर्चित कविता "चालीस साला औरतें" अंजू शर्मा दिल्ली में रहती हैं । उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

चालीस साला औरतें


इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर

बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि

वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,

ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं

ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है
जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें,
ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,
पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,

जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं...



---अंजू शर्मा

बुधवार, अप्रैल 22, 2026

नासिर अहमद सिकंदर-विफल प्रेम की कविताएँ – -चार


शरद कोकास के कंप्यूटर पर नासिर अहमद सिकंदर

चार

जब स्कूल में
बच्चों को तुम पढ़ाती होगी

पहला अक्षर अनार
तो याद आता होगा
तुम्हारे गालों को
मैंने कभी कहा था- अनार
गिनती सिखाते वक्त बच्चों को

जब छब्बीस में पहुंचती होगी तुम .
हो याद आता होगा |
तुम्हारी इसी उम्र में
मुलाकात हुई थी अपनी

बच्चों को तुम
प्रेम का समानार्थी शब्द
न बता पाती होगी अब

या जीत का विरुद्धार्थी शब्द
मुश्किल से बता पाती होगी

प्रस्तुति :शरद कोकास

नासिर अहमद सिकंदर -विफल प्रेम की कविताएँ – -तीन














तीन

चांद कहाना 
पसंद न था उसे

फूल कहता
तब भी चिढ़ जाती

कोयल कहता
तो कहती..उंह
काली काली कोयल
उफ़ चिड़िया
तब भी चुप

थक हारकर अपना कहता
यही कहना - कहाना
पसंद था उससे.

नासिर अहमद सिकंदर -विफल प्रेम की कविताएँ- दो

 

दो

समुद्र के पास जाऊंगा एक दिन 

तुम्हारी आंखों के लिये
भीख में मांगूगा
उसके जल का नीलापन

चांद के पास जाऊंगा एक दिन
उससे कहूँगा
उतर आये तुम्हारे चेहरे में
अपने जिस्म से
नसें निकालूंगा एक दिन
उनमें पिरोऊंगा तारे
और चेन की जगह
डाल दूँगा गले में

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नासिर अहमद सिकंदर - विफल प्रेम की कविताएँ – -एक






एक 


मुझे उसके बाल बहुत पसंद थे
उसके बाल इतने घने और लंबे थे
कि उन्हें फैलाकर और तानकर
बनाया जा सकता था
एक आसमान

उसके बालों से
बनाई जा सकती थी एक छत
और रहा जा सकता था उम्र भर

फांसी का फंदा भी तो हो सकते थे बाल

उसके बाल इतने नर्म और मुलायम थे
कि यह हो ही नहीं सकता था

मुझे उसके बाल बहुत पसंद थे


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