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शुक्रवार, जून 08, 2012

1988 की कवितायें नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –तीन

और यह एक छोटी सी कविता , जो दर असल छोटी नहीं है -

नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –तीन



नींद न आने की स्थिति में
तारे गिनने का उपदेश देने वाले
खुद कभी तारे नहीं गिनते

उनके और तारों के बीच
हमेशा एक छत होती है
हमारी मिहनत से बनाई हुई ।

                        शरद कोकास 

सोमवार, जून 04, 2012

1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता - 2

नींद न आने की स्थिति में लिखी कविताओं में से यह दूसरी कविता । यह कविता भी कुछ हल्के- फुल्के मूड में ही लिखी गई थी और व्यंग्य इसका केन्द्रीय भाव था । आगे चलकर इस विषय पर कुछ गम्भीर कवितायें आई हैं । लीजिये फिलहाल तो इसे पढ़िये और इसका मज़ा लीजिये ।


 नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता – दो

नींद को कहीं
नज़र न लग गई हो
चचा ग़ालिब की
उन्हें मौत का ख़ौफ था
हमे ज़िन्दगी का है

आश्चर्य !
पीने के बावज़ूद
उन्हें नींद नहीं आती थी

आसमान की ओर देखते हुए
कोशिश में हूँ
बूझने की
चचा ग़ालिब ने यह शेर
शादी से पहले लिखा था
या बाद में ।
                        शरद कोकास 

शुक्रवार, जून 01, 2012

1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता - एक

यह उन दिनों की बात है जब सचमुच रातों को नींद नहीं आती थी । नींद न आने पर मैं कविता लिखता था और कविता लिखते ही नींद आ जाती थी । इस तरह जब पाँच - सात कवितायें बन गईं तो मैंने इस श्रंखला को नाम दिया ' नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता । इस श्रंखला की यह पहली कविता जो कथाकार मित्र मनोज रूपड़ा को बेहद पसन्द थी । वह इसे पढ़ता था और ज़ोर ज़ोर से हँसता था । अब क्यों हँसता था पता नहीं ?
लीजिये आप भी पढ़िये ।

 नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता –एक

मुझे नींद नहीं आ रही है
आ रहे हैं विचार
ऊलजलूल
कितना मिलता है यह शब्द
उल्लुओं के नाम से

क्या उल्लू दिन को सोता है
उसे नौकरी नहीं करनी पड़ती होगी
मेरी तरह शायद

उल्लू तो ख़ैर
उल्लू ही होता है
उल्लू का नौकरी से क्या
लेकिन क्या उल्लू प्रेम भी करता है
क्या पता
शायद नहीं
उल्लू तो आखिर
उल्लू ही होता है ना
लेकिन फिर क्यों
वह जागता है रात भर

मैं भी कितना उल्लू हूँ
उल्लू और आदमी के बीच
खोज रहा हूँ
एक मूलभूत अंतर ।

                        शरद कोकास  

मंगलवार, मई 29, 2012

1988 की कवितायें

प्रस्तुत है ' झील से प्यार करते हुए ' श्रंखला  की यह दूसरी कविता । रश्मि रविजा जी को इस श्रंखला की तीनो कवितायें बेहद पसन्द हैं और एक बार उन्होंने इसे फेसबुक पर शेयर भी किया था । उनके प्रति आभार के साथ ।इस कविता के बारे में आलोचक डॉ. कमला प्रसाद ने कहा था कि इस प्रेम कविता में दफ्तर के बिम्बों का प्रयोग अद्भुत है ।


झील से प्यार करते हुए –दो

वेदना सी गहराने लगती हैं जब
शाम की परछाईयाँ
सूरज खड़ा होता है
दफ्तर की इमारत के बाहर
मुझे अंगूठा दिखाकर
भाग जाने को तत्पर

फाइलें दुबक जाती हैं
दराज़ों की गोद में
बरामदा नज़र आता है
कर्फ्यू लगे शहर की तरह

ट्यूबलाईटों के बन्द होते ही
फाइलों पर जमी उदासी
टपक पड़ती है मेरे चेहरे पर

झील के पानी में होती है हलचल
झील पूछती है मुझसे
मेरी उदासी का सबब
मैं कह नहीं पाता झील से
आज बॉस ने मुझे गाली दी है

मैं गुज़रता हूँ अपने भीतर की अन्धी सुरंग से
बड़बड़ाता हूँ चुभने वाले स्वप्नों में
कूद पड़ता हूँ विरोध के अलाव में
शापग्रस्त यक्ष की तरह
पालता हूँ तर्जनी और अंगूठे के बीच
लिखने से उपजे फफोलों को

झील रात भर नदी बनकर
मेरे भीतर बहती है
मै सुबह कविता की नाव बनाकर
छोड़ देता हूँ उसके शांत जल में
वैदिक काल से आती वर्जनाओं की हवा
झील के जल में हिलोरें पैदा करती है  
डुबो देती है मेरी कागज़ की नाव

झील बेबस है
मुझसे प्रेम तो करती है
लेकिन हवाओं पर उसका कोई वश नहीं है ।

रविवार, मई 27, 2012

1988 की कवितायें

1988 में कवितायें कम लिखीं ।  तीन प्रेम कवितायें जो 1987 में लिखी थीं उन्हें फाइनल किया और उसके अलावा " नीन्द न आने की स्थिति में लिखी कुछ कवितायें " चलिये पहले यह तीन प्रेम कवितायें .. " झील से प्यार करते हुए "

झील से प्यार करते हुए – एक

झील की ज़ुबान ऊग आई है
झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की
झील के मन में है ढेर सारी नफरत
उन कंकरों के प्रति
जो हलचल पैदा करते हैं
उसकी ज़ाती ज़िन्दगी में
झील की आँखें होती तो देखती शायद
मेरे हाथों में कलम है कंकर नहीं
           
झील के कान ऊग आये हैं
बातें सुनकर
पास से गुजरने वाले
आदमकद जानवरों की
मेरे और झील के बीच उपजे
नाजायज प्रेम से
वे ईर्ष्या करते होंगे

वे चाहते होंगे
कोई इल्ज़ाम मढना
झील के निर्मल जल पर
झील की सतह पर जमी है
खामोशी की काई
झील नहीं जानती
मै उसमें झाँक कर
अपना चेहरा देखना चाहता हूँ

बादलों के कहकहे
मेरे भीतर जन्म दे रहे हैं
एक नमकीन झील को
आश्चर्य नहीं यदि मैं एक दिन
          नमक के बड़े से पहाड़ में तब्दील हो जाऊँ ।  

गुरुवार, अप्रैल 26, 2012

1988 की एक कविता


1988 मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष है , इस साल मेरा विवाह हुआ था और मुझे घर की पकी - पकाई रोटी मिलने लगी थी । कुछ प्रेम कवितायें भी लिखीं इस साल और शिल्प और कथ्य में भी कुछ परिवर्तन हुआ । प्रस्तुत है उस समय की यह एक कविता । 

रोटी की गन्ध

ओसारे में बैठकर
मैं जब लिख रहा होता हूँ कोई कविता
झाँककर देखता हूँ
यादों की खपच्चियों से बना
अनुभूतियों का पिटारा
संवेदनाएँ बचाना चाहती हैं
मस्तिष्क को अनचाही फांस से
लेकिन उंगलियों से टटोलकर
बिम्ब ढूँढना तो सम्भव नहीं

यकायक सजग हो उठती है
तथाकथित नश्वर शरीर की इन्द्रियाँ
नासापुटों तक आ पहुंचती है
पकती हुई रोटी की ताज़ा गन्ध
कान के पर्दे से टकराती है
कपड़े पटकने फींचने की आवाज़ें
पाठ पढते हुए बच्चों की आवाज़ें सुनकर
जेहन में उभरता है उनके हिलते शरीर का बिम्ब
यह गन्ध और यह आवाज़ें
आहत करने लगती हैं मेरी संवेदनायें
गरम तवे पर गिरी पानी की बून्द की तरह
उड़ जाती है मेरी कविता
मेरे और कविता के बीच
आई बाधा के दौरान
मै सोचता हूँ
गोलियों बमों की आवाज़ों
चीखों –चित्कारों की तुलना में
कितनी स्वाभाविक हैं यह आवाज़ें
यकीनन बारूद की गन्ध की अपेक्षा
रोटी की गन्ध अधिक प्रिय है मुझे

उतार लेना चाहता हूँ मैं हू ब हू इनको
अपनी कविता में ।