रविवार, नवंबर 22, 2009

हम सभी खानाबदोश है...


            हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी जड़ों से उखड़कर  नई जगहों पर जमने की कोशिश कर रहे हैं ..। खानाबदोशों की तरह हमारे पूर्वज जाने कहाँ से भटकते हुए आये और कहीं किसी जगह पर स्थायी हो गये । फिर उस पीढ़ी से कुछ लोग निकले रोजी-रोटी की तलाश में और नई जगह स्थापित हो गये । फिर अगली पीढ़ी में भी ऐसा ही हुआ । यह सिलसिला अभी भी चल रहा है और जाने कब तक चलता रहेगा !
             मेरे परदादा स्व. विश्वेश्वर प्रसाद रायबरेली ज़िले के एक गाँव लाऊपाठक का पुरवा से निकले और फतेहपुर आ गये ,तीस वर्ष वहाँ रहने के बाद सन 1900 के आसपास मध्यप्रांत में  बैतूल  आ गये जहाँ उनके पाँच पुत्र हुए  बाबूलाल बृजलाल,कुन्दनलाल,सुन्दरलाल व चन्दनलाल । फिर मेरे पिता श्री जगमोहन रोजी –रोटी के लिये बैतूल से निकले और महाराष्ट्र के भंडारा नामक स्थान पर आ गये । वीरेन्द्र चाचा मुम्बई में, रमेश चाचा नागपुर में और मनोहर चाचा भिलाई आ गये । और मै अपना घर छोड़कर निकला तो छत्तीसगढ़ के इस शहर दुर्ग में आ गया । मेरे और भी कई दादाओं,चाचाओं और भाइयों की यही कहानी है ।
            हम में से बहुत से लोग हैं जो विस्थापन का यह दर्द भोग रहे हैं । इस देश के हर शहर में ऐसे लोग हैं जिनकी जड़े कहीं और थी और वे अब नई जगहों पर जमने की कोशिश कर रहे हैं । हाँलाकि समय के साथ वे उस नई जगह की संस्कृति में रच-बस गये हैं लेकिन उनके मन की व्यथा कौन समझ सकता है ..उस स्थिति में तो और भी नहीं जब 3-4 पीढ़ियाँ गुजर जाने के बाद भी उन्हे बाहरी समझा जाता है ।उन्हे बार- बार यह अहसास दिलाया जाता है कि उनके कारण स्थानीय लोगों की उपेक्षा हो रही है । उनका अपमान किया जाता है । और ऐसा कहने वाले यह भी नहीं सोचते कि बरसों पहले उनके पूर्वज भी कहीं बाहर से ही आये होंगे ।
            हर साल देखता हूँ मैं .. छत्तीसगढ़ से न जाने कितने मजदूर रेल में बैठकर खाने-कमाने देश के सुदूर हिस्सों में जाते हैं । उनमें से कितने ही होते हैं जो फिर कभी लौटकर नहीं आते । रेल से यात्रा करते हुए जब भी मैं खिड़की से बाहर झाँकता हूँ तो उन हरे-भरे पेड़ों की ओर देखता हूँ जिनके बीज जाने कहाँ से आये होंगे और अब जो इस मिट्टी में स्थायी हो गये हैं ..। अब यही ज़मीन उनका घर है । फिर यह खयाल भी आता है कि यदि इन्हे इस जगह से उखाड़ कर कहीं और लगा दिया जाये तो क्या वे फिर पनप सकेंगे ? क्या उन्हे उनकी जड़ों से उखाड़ने का यह खेल उन्हे जीवन दे सकेगा ? क्या उन्हे हम वही सब कुछ दे सकेंगे ? वे डूब से विस्थापित हुए लोग हों ,चाहे आतंक से ,चाहे नये कारखाने बसाने के नाम पर उन्हे हटाया जा रहा हो ,चाहे रोजी-रोटी की मजबूरी से वे घर छोड़ रहे हों ..यह सवाल तो उन सभी के लिये है । इसी प्रश्न पर सोचते हुए 15 वर्ष पूर्व इस कविता ने जन्म लिया था ।
              
                                     लोहे का घर-तीन

किसी पौधे को
जड़ से उखाड़कर
कहीं और रोपने से
और उम्मीद मात्र से
क्या वह बन सकेगा
एक छायादार वृक्ष...?


क्या उसे दे सकेंगे हम
वही मिट्टी वही जल
वही धूप धरती और आकाश
क्या उसे हासिल होंगे
दुलारने वाले वही हाथ
और बच्चों और चिड़ियों की
वही चहचहाहट

क्या उसे हम बचा सकेंगे
दीमक ,कीट-पतंगों से
कुल्हाड़ियों से और
विकास के बुलडोज़रों से

लोहे के इस घर में बैठकर
सुरक्षित यात्रा करते हुए
मैं अक्सर सोचता हूँ...

खिड़की से दिखाई देते पेड़
कभी नहीं जान सकते
उखड़े पौधों का दर्द ।

                  -- शरद कोकास   (चित्र गूगल से साभार )
                                                                                           



शुक्रवार, नवंबर 20, 2009

सुविधा के दिनों में गर्दिश के दिनों की याद पैदा करती है रूमानियत



यह जीवन भी रेल में की गई यात्रा की तरह है जहाँ एक स्टेशन से हम यात्रा प्रारम्भ करते है और किसी एक स्टेशन पर समाप्त करते हैं । प्रारम्भ का स्टेशन तो हमें पता होता है लेकिन गंतव्य के स्टेशन का हमें पता नहीं होता  वह कब आयेगा ..हम सशंकित होकर हर किसी से पूछते हैं , जब यह जवाब मिलता है कि अरे ..अभी तो आपका अंतिम स्टेशन बहुत दूर है तो हम खुश हो जाते हैं । और अगर कोई कह दे कि बस आपका अंतिम स्टेशन आने ही  वाला है तो हम दुखी हो जाते हैं । कई लोग सोचते हैं कि अभी तो हमें बहुत दूर तक यात्रा करनी है वे अचानक किसी स्टेशन पर उतर जाते हैं ..हम सोचते ही रह जाते हैं ..अरे यह तो कहता था बहुत दूर का सफर है बीच में ही उतर गया । कुछ लोग यात्रा करते करते ऊब जाते हैं और सोचते हैं कि यह अंतिम स्टेशन कब आयेगा ? और कुछ अंत तक यात्रा में नहीं ऊबते और खुशी-खुशी आखरी स्टेशन पर उतर जाते हैं ।                                                  
सोचकर देखिये कितना कुछ सोचा जा सकता है इस “लोहे के घर” में यात्रा करते हुए .. इस यात्रा में हम सभी हम सफर हैं । किसीने यात्रा जल्दी शुरू कर दी है किसीने देर से । कोई बीस स्टेशन देख चुका है कोई अठ्ठाइस कोई पचास कोई सत्तर  । जैसे जैसे स्टेशन आयेंगे नये मुसाफिर भी शामिल होते जायेंगे कोई पहले उतर जायेगा कोई देर तक यात्रा करता रहेगा । सबसे महत्वपूर्ण होगा साथ बिताया हुआ समय ..।जब एक न एक दिन आखरी स्टेशन पर उतरना ही है तो  क्यों न करें ऐसा कि हम यह समय इस तरह साथ बितायें कि हमारे स्टेशन पर उतर जाने के बाद भी बचे हुए वे सहयात्री हमे याद रख सकें ।
 अरे.. मैं जिस कविता को यहाँ देने जा रहा था उसका सन्दर्भ तो यह कतई नहीं था .. आप सोच रहे होंगे .. रूमानी होते होते पटरी बदलकर यह  दार्शनिक कैसे हो गया ?, अब क्या करूँ ...लोग सलाह ही इतनी गम्भीर देते हैं । खैर .. इस कविता का सन्दर्भ देने की ज़रूरत ही नहीं आप पढ़ेंगे तो खुद समझ जायेंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ ।और यह भी कि इस कविता और पिछली कविता की “रूमानियत “ में क्या फर्क है?

   
लोहे का घर - दो

 
फुटबोर्ड पर लटककर                           
यात्रा करते हुए
याद आती हैं
सुविधाजनक स्थान पर बैठकर
की गई यात्राएँ


आरक्षित बर्थ पर लेटे हुए
याद आती हैं
फुटबोर्ड पर लटक कर
सही जगह की तलाश में
की गई यात्राएँ


उसी तरह जैसे
सुविधाओं से युक्त जीवन में
गर्दिश के दिनों की याद
पैदा करती है रूमानियत ।
             
                -- शरद कोकास 

(चित्र गूगल से साभार )



मंगलवार, नवंबर 17, 2009

स्वप्न देखने के लिये टिकट लेना कतई ज़रूरी नहीं है ।


रात के सन्नाटे में  दूर कहीं किसी रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनाई देती है । एक रेल धड़धड़ाते हुए किसी पुल से गुजर जाती है ..हवा में तैर जाता है एक हल्का सा कम्पन और सन्नाटे में गूंजता है दुश्यंत का यह शेर... ‘तू किसी रेल सी गुजरती है..मै किसी पुल सा थरथराता हूँ ।“
यह थरथराहट अवचेतन में बसे उन तमाम बिम्बों को सतह पर ले आती है जो अपनी बैचलर लाइफ में यात्राएँ करते हुए मैने सहेजे थे । एक रेल थी जो मुझे अपने शहर से दूर ले जाती थी  और फिर कभी वापस लेकर नहीं आती थी । कभी आती भी थी तो फकत छुट्टियों में ..फिर वापस ले जाने के लिये ।
            उन दिनों की स्मृतियों को सहेजता हूँ तो आज भी रेल में बैठते ही रेल का वह डिब्बा मुझे घर जैसा लगने लगता है , मै इसीलिये उसे “ लोहे का घर “ कहता हूँ । आपने भी इस बात को महसूस किया होगा कि यात्रा में जाने कितने परिवार मिल जाते है, कितने मित्र बन जाते है। हम उनसे कितना बतियाते हैं  । बातें करते हुए  अक्सर इतनी अंतरंगता हो जाती है कि जो बातें हम कभी किसी से नहीं कहते ट्रेन में मिले अपने सफर के साथी से कह देते हैं । यह जानते हुए भी हम दोबारा शायद ही कभी मिलें .. लेकिन अपने सुख-दुख बाँटना ,यही तो मनुष्य होना है ।
ऐसी अनेक रेल यात्राएँ मैने की हैं और इन यात्राओं में  अनेक  कवितायें लिखी हैं । “लोहे का घर “ शीर्षक से अलग अलग बिम्बों और चित्रों को लेकर यह कवितायें मेरे कविता संग्रह “गुनगुनी धूप में बैठकर “ में संग्रहित हैं । इस श्रंखला की यह पहली कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ..कविता ज़रा रूमानी है ..लेकिन मेरी उन दिनों की उम्र का खयाल करके बर्दाश्त कर लीजिये .. और हर्ज़ क्या है आप भी ज़रा सा रूमानी हो जायें ..प्रेम करने और स्वप्न देखने की भी कोई उम्र होती है .भला .?

                        लोहे का घर

सुरंग से गुजरती हुई रेल
बरसों पीछे ले जाती है
उम्र के साथ

बीते सालों के
फड़फड़ाते पन्नों को
खिड़की से आया
पहचानी हवा का झोंका
किसी एक खास पन्ने पर
रोक देता है

एक सूखा हुआ गुलाब का फूल
दुपट्टे से आती भीनी भीनी महक
रात भर जागकर बतियाने का सुख
उंगलियों से इच्छाओं का स्पर्श 

स्वप्न देखने के लिये 
          टिकट लेना 
          कतई ज़रूरी नहीं है । 


               - शरद कोकास


(पिछले दिनो की गई एक यात्रा का चित्र ,इस यात्रा में अचानक बचपन के दो दोस्त मिल गये थे  ..चन्द्रपाल और सूरजपाल दोनों सगे भाई ,मेरी यह तस्वीर चन्द्रपाल ने अपने मोबाइल से ली है )








रविवार, नवंबर 08, 2009

आसान नहीं है किसी जवान मौत को बर्दाश्त कर लेना


 बस बीस –इक्कीस साल उम्र थी अनिकेत की । मेरे  मित्र अशोक कृष्णानी का बेटा जो अभी चार दिन पहले एक छोटे से स्टेशन पर न जाने किस उहापोह में रेल की पटरी पार करते हुए तेज़ गति से आती हुई रेल से टकरा गया । अच्छा खासा निकला था घर से और एक दिन बाद उसकी यह खबर आई । खबर के सदमे  से उबर नहीं पाये थे कि बैंडेज में लिपटी उसकी मृत देह आ गई । बगैर उसका चेहरा देखे उसका अंतिम संस्कार ..उफ.. इतनी बड़ी सज़ा ? कल्पना भी जिस दृश्य की असम्भव उसे सच होते हुए देखना ? कठिन है ।
एक भयावह सी शांति पसरी हुई है उस घर में ,मौत जहाँ दस्तक दे चुकी है । सब जानते हैं कि उसके जीवन की यात्रा बीच में ही समाप्त  हो चुकी  है लेकिन माँ –बाप और दो छोटी बहनों को क्या कहें ..उनकी निगाहें अभी भी सड़क की ओर लगी है ,उन्हे अभी भी आस है कि शायद वह घर लौटकर आ जाये ।
            अपने मित्र के आँसू पोंछकर चार दिनों बाद लौटा हूँ तो कुछ सूझ नहीं रहा है । याद आ रहे हैं अनिकेत जैसे बहुत सारे युवा जो घर से पिकनिक मनाने निकले और किसी नदी ,बावड़ी में डूब गये । कुछ जो तेज़ गति से चलने वाली बाइक पर सवार होकर हवा से बातें करते हुए निकले और किसी ट्रक से टकरा कर हवा में विलीन हो गये । कुछ जिन्होंने जीवन को खेल समझ लिया और नादानी में मौत के साथ यह खेल खेल गये  । कुछ युवा जो देश की रक्षा के लिये निकले और मोर्चे पर शहीद हो गये ।
फिर याद आये वे ढेर सारे बच्चे ,भूख और बीमारियाँ  जिन्हे निगल गई , और दंगे, बाढ़ ,भूकम्प ,अकाल और बम धमाकों में असमय काल के गाल में समा जाने वाले अनेक बच्चे,युवा और बुज़ुर्ग ।
आसान नहीं है ,मौत को इस तरह से स्वीकार कर लेना । सारे उपदेश .नीतिवाक्य ,और समझाने बुझाने की बातें धरी रह जाती हैं जब किसी बाप के कन्धे पर जवान बेटे की अर्थी दिखाई देती है ।
मै क्या कहूँ ... इतना ही कह पाया यह क्या कम है । एक कविता जो शायद मेरी भावनाओं को और आप की सम्वेदनाओं को शब्द दे सके ....



                                                           कठिन है

आसान नहीं है
किसी बच्चे की मौत का
दुख बर्दाश्त कर लेना
अनदेखे सपनों की पिटारी को
डेढ़ हाथ की कब्र में दफना आना

आसान तो नहीं है
किसी बरगद बुज़ुर्ग की मौत पर
आँसू पी जाना
यकायक छाँव गायब पाना
अपने सर से

आसान नहीं है
बिलकुल भी
किसी जवान मौत को
सदमे की तरह
बर्दाश्त कर लेना
ज़िम्मेदारियों के पहाड़ों से
मुँह चुराकर निकल जाना

बहुत कठिन है
बहुत बहुत कठिन
उनकी छोड़ी हुई
दुनियाओं के बारे में सोचना
और..


चट्टानों की तरह
अपनी जगह पर टिके रहना ।

                        - शरद कोकास

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009

आखिर हम घर किसके लिये बनाते हैं ?

मेरे पिता स्व.जगमोहन कोकास ,मध्यप्रदेश के बैतूल शहर से शिक्षक की नौकरी करने के लिये निकले और महाराष्ट्र के भंडारा नामक शहर में आ बसे । अपने से बड़े दो किसान भाईयों की मदद और अपना परिवार पालने  की ज़द्दोज़हद में कुछ इस तरह फँसे रहे कि रिटायरमेंट से पहले अपना मकान नहीं बना पाये । तनख्वाह इतनी कम थी कि कर्ज़ भी नहीं मिला । जब तक मकान बना तब तक  बेटी की शादी हो चुकी थी और दोनो बेटे अपनी नौकरी के लिये दूसरे शहर जा चुके थे । एक मेहनतकश,ईमानदार और ज़िम्मेदारियों के बोझ से लदे मध्यवर्गीय के साथ  ऐसा हो सकता है । परिवार के साथ रहने का सुख हर इंसान जीवन भर ढूँढता रहता है।माता-पिता भी जीवन भर कोशिश करते है कि बच्चों को बेहतर परिवेश  दे रहने के लिये और अन्य सुविधायें भी लेकिन जब सुविधायें मिलती है तब तक  रोजी-रोटी की कश्मकश बच्चों को उनसे दूर कर देती  है। आजकल बच्चे भी उच्च शिक्षा के लिये कम उम्र में ही घर से निकल जाते हैं और फिर नौकरी काम-धन्धे में ऐसे उलझते हैं कि कभी घर लौट नहीं पाते । बेटियों का विवाह के पश्चात अपने माँ-बाप से दूर चले जाना तो उनकी नियति है ।आम मध्यवर्गीय की इस  व्यथा को उतारने की कोशिश की है मैने इस कविता में । यह कविता उन सभी माता-पिता के लिये और उन सभी बच्चों के लिये जो एक दूसरे से दूर हैं । शायद एक पिता का दर्द भी आपको इसमें नज़र आये .....।

                    
                                   रिटायरमेंट के बाद बना मकान



  घने होते शहर में 
  चिड़िया ने देखा
  घोंसले का स्वप्न
  पिता ने जुटाई थोड़ी सी पूंजी
  तिनका तिनका हिम्मत
  उमीदों की नींव पर
  बन गया एक मकान
  रिटायरमेंट के बाद

 छत ढलने से पहले ही
 ढलने लगे थे स्वप्न
 यहाँ बिराजेंगे देवता
 यहाँ महकेगी रसोई
 यहाँ खिलेगा गुलमोहर
 यहाँ बसेंगे बहू-बेटे

 दीवार नहीं थे बच्चे
 जिनसे पिता चाहते थे सुरक्षा
 छत भी नहीं थे बच्चे
 जिनसे बुढ़ापे में हो छाँव की अपेक्षा




 बूढॆ पिता नहीं जानते थे
 बच्चे दीवार और छत की तरह
 एक जगह टिके नहीं रहते
 बच्चे पंछियों की तरह बढ़ते हैं
 पर फैलाते हैं
 एक दिन उड़ जाते हैं
 दाने-पानी की खोज में



 आंगन में अकेले बैठे पिता
 सुनते हैं
 परदेस जाते बेटे के कदमों की आवाज़
 झाड़ते हैं 
बिटिया के गुड्डे-गुड़ियों पर जमी धूल
 बन्द पड़े सूने कमरे की ओर ताकते हुए
 वे याद करते हैं
 किराये के छोटे से मकान में बिताये
 चहल पहल भरे दिन ।

             --- शरद कोकास
(चित्र :मेरे निर्माणाधीन मकान का जो होम लोन की मदद से काफी पहले बन चुका है , दूसरा व तीसरा चित्र बाबूजी के बनाये हुए मकान और बाग़ीचे का जिसके लिये यह कविता लिखी गई , जो मैने बाबूजी को कभी नही सुनाई इस लिये कि यह सुनकर उन्हे दुख होता )

शनिवार, अक्टूबर 24, 2009

यह अक्तूबर का चमकदार उतार है


आज 24 अक्तूबर है .. हवा में कल रात थोड़ी ठंडक महसूस की मैने .. खिड़की से हवा का एक झोंका आया और उसने कहा .याद है तुम्हे, तुम्हारे मित्र कुमार अम्बुज ने इन्ही  दिनों के लिये एक कविता लिखी थी ..‘ अक्तूबर का उतार ‘.. अरे हाँ ,मुझे याद आया , मैने रैक से अम्बुज का वह संग्रह निकाला “ किवाड़ “ उसीमें से यह कविता पढ़ रहा हूँ .जो कुमार अम्बुज  ने 1988 में लिखी थी ....आप भी पढ़िये मेरे साथ..

                                                            अक्तूबर का उतार

छतों पर स्वेटरों को धूप दिखाई जा रही थी
और हवा में
ताज़ा धुले हुए चूने की गन्ध
झील में बतख़ की तरह तैर रही थी
यह एक खजूर की कूची थी जिसके हाथों
मारी जा चुकी थी बरसात की भूरी काई
और पुते हुए झक्क-साफ मकानों के बीच
एक बेपुता मकान
अपने उदास होने की सरकारी-सूचना के साथ
सिर झुकाये खड़ा था
टमाटरों की लाली शुरू होकर
चिकने भरे हुए गालों तक पहुंच रही थी
अंडे और दूध का प्रोटीन जेब खटखटा रहा था
खली और नमक की खुशबू
पशुओं की भूख में मुँह फाड़ रही थी
आदम-इच्छाओं में शामिल हो रहा था
हरे धनिये का रंग और अदरक का स्वाद
बाज़ार में ऊन और कोयले के भाव बढ़ रहे थे

रुई धुनकने वाले की बीवी के खुरदरे हाथ
सुई-डोरे के साथ
रज़ाई-गद्दों पर तेज़ी से चल रहे थे
( यही वह जगह होती है जहाँ सुई तलवार से
और डोरा रस्सी से बड़ा हो जाता है )
बढ़ई की भुजाओं की मछलियाँ
लकड़ी को चिकना करते हुए
खुशी से उछल रही थीं
तेज़ हो रही थी लोहा कूटने की आँच
खुल रहे थे बैलगाड़ियों के रास्ते
आलू की सब्ज़ी शाम तक चल जाने लायक इन दिनों में
एक मटमैली चिड़िया अपनी चोंच से
बच्चे की चोंच में दाना डाल रही थी

रावण का पुतला सालाना जश्न में जल चुका था
मगर आसमान में बारूद और आवाज़ें बाकी थीं
बाकी थी रोशनी और सजावट के लिये कुछ जगह
थोड़ी सी जगह
बच्चों के खेल के लिये निकल आई थी
और थोड़ी-सी पेड़ के नीचे एक बेंच पर

इस रोनी दुनिया में
मुस्कराये जाने की गुंजाइश के साथ
इमली का पेड़ लगातार हिल रहा था

यह सर्दियों की चढ़ाई थी
जब मकड़ियों के घर उजड़ रहे थे
और अक्तूबर का यह चमकदार उतार था
जिस पर से एक पूरा शहर फिसल रहा था

जैसे रिसक-पट्टी से फिसलता है
एक बच्चा  !

- कुमार अम्बुज

तो आप भी बक्सों से स्वेटर रज़ाई,कम्बल निकाल लीजिये और उन्हे धूप दिखाइये । और हाँ ..एक बात और कुमार अम्बुज कवि होने के अलावा एक चिंतक भी है । विगत दिनों धर्म को लेकर ब्लॉग्स पर एक बहस चली थी । शायद इसका सार्थक जवाब यहाँ मौजूद हो .. इस ब्लॉग कुमार अम्बुज में ।- आपका शरद कोकास
 (चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, अक्टूबर 19, 2009

मुँह ढाँककर सो जाने के लिये नहीं आती हैं छुट्टियाँ ।

दीवाली के कुछ दिनो बाद छुट्टियाँ समाप्त हो जायेंगी । त्योहार पर घर आये शहरों में पढ़ने वाले बच्चे, फौजी जवान , शहर में रहकर नौकरी करने वाले गाँव के युवक और रोज़ी-रोटी की तलाश में शहर दर शहर भटकते मजदूर फिर लौट जायेंगे । छुट्टियों में घर लौटना क्या होता है यह वही जान सकता है मजबूरियों ने जिसे घर से दूर कर दिया हो । लेकिन छुट्टियाँ भी जीवन का एक हिस्सा होती हैं , घर में कुछ समय रहने का सुख तो होता है लेकिन चिंतायें ,परेशानियाँ ज़िम्मेदारियाँ यहाँ भी कहाँ पीछा छोड़ती हैं । इस दृश्य को एक कवि की दृष्टि से देखा है मैने अपनी इस कविता ” छुट्टियाँ “ में ।

                                              छुट्टियाँ


मशीन के पुर्जे सी ज़िन्दगी में 

तेल की बून्द बनकर आती हैं छुट्टियाँ
गाँव में बीमार माँ की आँखों में 
जीने की अंतिम आस बनकर
उतर आती हैं छुट्टियाँ 

बहन की सूनी कलाईयों में चूड़ियाँ 
पिता के नंगे जिस्म में कुर्ता 
भाई की आँखों में 
आगे पढ़ने की ललक 
रूप बदलती जाती हैं छुट्टियाँ 

पत्नी की देह पर अटके चीथड़ों में 
परिवर्तन की आस बन जाती हैं छुट्टियाँ 
तुलसी के बिरवे के लिये जलधारा 
लक्ष्मी गाय मोती कुत्ते के लिये 
स्पर्श की चाह बन जाती हैं छुट्टियाँ 

बाग-बगीचों खेत खलिहान 
नदी पहाड़ अमराईयों के लिये 
गुजरे कल की याद 
बन जाती है छुट्टियाँ




आने का इंतज़ार करते हैं हम  
न खत्म होने की कामना
हमारी सोच की सीमा से पहले ही

अचानक खत्म हो जाती हैं छुट्टियाँ

सच पूछो तो 

मुँह ढाँककर सो जाने के लिये
नहीं आती हैं छुट्टियाँ ।

                   -शरद कोकास 


(चित्र गूगल से और रजनीश के. झा के ब्लॉग 'कुछ अनकही सी' से  साभार )

सोमवार, अक्टूबर 12, 2009

पैसे से क्या क्या तुम यहाँ खरीदोगे ...?


सुबह देखा तो सारे अखबार विज्ञापनों से भरे हुए हैं । पुष्य नक्षत्र में दिनभर खरीदारी कीजिये ,सोना,चान्दी,हीरा,मूंगा,नीलम,ज्वेलरी,एलेक्ट्रोनिक सामान ,टीवी फ्रिज,कार,बाइक ,ज़मीन-ज़ायदाद। ऐसा कहा जा रहा है कि इस दिन यह सब खरीदने से घर में लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी इसलिये लोग बिना ज़रूरत भी अनाप – शनाप गैरज़रूरी सामान खरीद रहे है । और कुछ इसलिये भी कि उन्हे ज़रूरत का अहसास दिलाया जा रहा है । अरे ..आपके  घर में यह नये तरह का टीवी नहीं है ? कैसे आधुनिक हैं आप ? अरे आप अभी तक पुराने किस्म की ज्वेलरी पहन रही हैं ,आपको शर्म नहीं आती ? क्या भाईसाहब अभी तक वही पुराना स्कूटर ? 
जिस देश में करोड़ों लोगों को ठीक से दो वक़्त की रोटी नहीं मिलती उस देश में उन्हे बताया जा रहा है फलाने ऑवन में खाना जल्दी पकता है इसलिये यह तो आपके यहाँ होना ही चाहिये । इसकी आपको सख़्त ज़रूरत है ।
ठीक है जिनकी क्षमता है वे खरीद सकते हैं और बाक़ी लोगों से कहा जा सकता है जो है उसीमें खुश रहो ,संतोष ही सबसे बड़ा धन है । हाँलाकि अब तो यह बात भी नहीं है ,कहा जा रहा है खरीदो खरीदो चाहे कर्ज़ लेकर खरीदो ।लेकिन यह तो  हद हो गई कि अब बाज़ार हमें बतला रहा है कि हमें किस चीज़ की ज़रूरत है ।
बाज़ार हमे बतला रहा है कि पत्नी से प्यार करने के लिये उसे क्या देना चाहिये ।भाई बहन को उपहार में क्या दे कि वह आपको भाई माने ? किस उपहार के देने से आपका बच्चा आपकी इज़्ज़त करेगा ? 
घरेलू और नितांत उपयोगी वस्तुओं तक तो ठीक है ,प्रेम,सौहार्द्र,भाईचारा, हँसी-खुशी भी अब हमें बाज़ार की सलाह से खरीदना होगा ? क्या हमें बतलाना होगा कि इन सबकी हमारे जीवन में ज़रूरत क्यों है ? और इन्हे हासिल करने के लिये हमारी संस्कृति में क्या प्रावधान है ? जीवन के मूल राग तो हमे पुरखों से मिले हैं। 
इन्ही भावों पर बिम्बों के माध्यम से कुछ कहने की कोशिश की है इस  छोटी सी कविता में  ।
                                   
                                                            ज़रूरत                                                      

क्या ज़रूरी है
दिया जाए कोई बयान
ज़रूरतों के बारे में


पेश की जाए कोई फेहरिस्त
हलफनामा दिया जाए


चिड़िया से पूछा जाए

क्यों ज़रूरी है अनाज का दाना
चूल्हे से तलब की जाए
आग की ज़रूरत
पशुओं से मांगा जाए
घास का हिसाब
कपड़ों से कपास का
छप्पर से बाँस का
हिसाब मांगा जाए


हल्दी से पूछी जाए
हाथ पीले होने की उमर
दवा की शीशी से पूछा जाए
दवा का असर


फूलों से रंगत की
बच्चों से हँसी की ज़रूरत पूछी जाए


क्या ज़रूरी है
हर ज़रूरी चीज़ के बारे में
किया जाए कोई सवाल ।

                        - शरद कोकास 
(इस चित्र में जबलपुर की यह एक कॉस्मेटिक्स की दुकान है जहाँ एक गरीब चायवाला चाय देने आया है , दुकान के मालिक सुनील विश्वकर्मा चाय पीते हुए  प्रसन्न हैं क्योंकि उन्हे इस वक़्त चाय की सख़्त ज़रूरत जो है . यह चित्र ऑफ सीज़न का है ,इन दिनो  तो उनके यहाँ भारी भीड़ है । इस चित्र को देखकर क्या क्या सोच सकते हैं आप ? )  


बुधवार, अक्टूबर 07, 2009

मेरी आँखों के जल में झिलमिलाता चांद

नवरात्र के बाद शरद पूर्णिमा भी आकर चली गई ,फिर अब करवा चौथ ,रात पूर्णिमा और चांद यह शब्द युग्म अपने आप में एक कविता की तरह लगता है , सभी तरफ चांद की ही बातें हैं । खिड़की से बाहर देखो तो चांद , सड़क पर चलते हुए देखो तो चांद । मुझे याद आ रही है बरसों पहले लिखी एक प्रेम कविता । सफल प्रेम की या असफल प्रेम की ..? यह तो आप को तय करना है ।

                                                  तफरीह                                                          

तफरीह चल रही थी                       
चांद की आसमान में                     
ज़मीन पर हमारी            
बैठी थी वह                       
दुपहिये की पिछली सीट पर     


बेनकाब था चांद आसमान में      
यहाँ थी मुखौटों की भीड़               
मुश्किल था असल चेहरा पहचानना  


मैने कहा चांद को देखो     
हमारे साथ चल रहा है         
उसने कहा
तुम सड़क पर निगाह रखो                                                 
तुम्हारा क्या मुझे तो जीना है   


मै नहीं देख पाया                                
उसकी निगाहें                                                         
चांद पर थी या नहीं                                                            
वह भी कहाँ देख पाई                                                                  
मेरी आँखों के जल में                                                                      
झिलमिलाता हुआ चांद ।                               

- शरद कोकास                                                                                         
(चित्र में दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात भिलाई की एक व्यस्त सड़क )