बुधवार, अप्रैल 06, 2011

चैत्र नवरात्रि कविता उत्सव 2011 - ममांग दाई की कविता



ममांग दाई केवल पूर्वोत्तर  बल्कि समकीन भारतीय  अंग्रेजी लेखन की  एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर है। वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी अब स्वतंत्र लेखन उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है और इसी वर्ष साहित्य सेवा के लिए  वे  पद्मश्री सम्मान से नवाजी गई हैं।  प्रस्तुत हैं  ममांग दाई की तीन कवितायें जो उनके के संग्रह `रिवर पोएम्स´ से साभार ली गई हैं :

०१- बारिश

 
बारिश के अपने नियम हैं
अपने कायदे,
जब दिन होता है खाली - उचाट
तब पहाड़ की भृकुटि पर उदित होता है
स्मृति का अंधड़।

हरे पेड़ होने लगते हैं और हरे -और ऊंचे।

०२- सन्नाटा

कभी - कभी मैं झुका  लेती हूँ अपना शीश
और विलाप करती हूँ
कभी - कभी मैं ढँक लेती हूँ अपना चेहरा
और विलाप करती हूँ
कभी - कभी मैं मुस्कुराती हूँ
और तब भी
विलाप करती हूँ।

लेकिन तुम्हें नहीं आती है यह कला।

०३-वन पाखी
मैंने सोचा कि प्रेम किया तुमने मुझसे
कितना दुखद है यह
कि इस वासंती आकाश में
सब कुछ है धुंध और भाप।

आखिर क्यों रोए जा रहे हैं वन पाखी?
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( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

नवरात्रि कविता उत्सव २०११ द्वितीय दिवस - सुकृता पॉल की कवितायेँ

                                   
नवरात्रि के प्रथम दिवस रानी जयचंद्रन की कविता पर अनेक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई . मैं आभारी हूँ , सभी पाठकों का . साथ ही मैं सभी पुराने पाठकों को भी आवाज़ दे रहा हूँ . 

आज प्रस्तुत है सुकृता पॉल कुमार की यह कविता जिसका अंग्रेजी से अनुवाद किया है सिद्धेश्वर सिंह ने . 
 
                                     उजला होता जा रहा है अधिक उज्ज्वल

सुकृता ( सुकृता पॉल कुमार ) कथा साहित्य की गंभीर अध्येता और अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापक हैं। वह चित्रकार , अनुवादक , संपादक तथा सामाजिक सरोकारों से सक्रिय जुड़ा़व रखने वाली कार्यकर्ता हैं। वह अमेरिका के आयोवा विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम शामिल हो चुकी हैं और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला की फेलो भी रह चुकी हैं। एक कवि के रूप में वह केवल सुकृता के नाम से जानी जाती हैं। दिल्ली निवासिनी  हिमालय प्रेमी  सुकृता जी का जन्म और पालन पोषण केन्या में हुआ है। पिछले कई दशकों से वह अपनी कविताओं के जरिए अपनी जड़ों की तलाश के क्रम में रत हैं। उनके चार कविता संग्रह Oscillations, Apurna, Folds of Silence और Without Margins प्रकाशित हो चुके हैं।  प्रस्तुत हैं उनके चौथे संग्रह में संकलित दो कवितायें :

सुकृता पॉल कुमार
01 . नीरवता को तोड़ते हुए



शब्द झरते हैं

सुमुखि के मुख से

बारिश की तरह



रेगिस्तानों पर ।

*

अंतस में आड़ोलित

आँधियों और चक्रवातों के पश्चात



शब्द गिरते हैं

शिलाखंडों की तरह।

*

अटक गए हैं शब्द

जमी हुई

बर्फ़ की तरह



प्रेमियों के कंठ में।

*

विचारों में पिघलते हुए

मस्तिष्क में उतराते हुए



एकत्र हो रहे हैं शब्द

अनकहे वाक्यों में।



02. परिज्ञान



रोशनी के उस वृत्त के

ठीक मध्य में

उभर रहा है

अनुभवों की सरिता में

हाँफता -खीजता

सिद्धेश्वर सिंह
मेरे जीवन का सच



इतना उजला

कि देख पाना मुमकिन नहीं मेरे वास्ते।



गड्ड मड्ड हो गए हैं सारे रंग

जिन्दगियाँ एक दूजे में सीझ रही हैं

उजला होता जा रहा है अधिक उज्ज्वल

और मैं

पहले से अधिक दृष्टिहीन।
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( कविता : सुकृता पॉल कुमार)
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )



सोमवार, अप्रैल 04, 2011

नवरात्रि प्रथम दिवस - रानी जयचंद्रन की कविता


रानी जयचंद्रन मलयालम और अंग्रेजी की युवा कवि हैं जो केरल के एक छोटे से कस्बे वर्कला  में रहती हैं।  समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता में यह एक नया और अलग - सा स्वर है जिसे हिन्दी कविता के पाठकों और प्रेमियों से अवश्य परिचित कराया जाना चाहिए। रानी जयचंद्रन की इस कविता - पुस्तक में कुल 22 कवितायें संकलित हैं जो कवितायें समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता के उस रूप - स्वरूप से परिचित कराती हैं जो अपनी जड़ों से गहराई तक संबद्ध है. ये कवितायें अपने निकट की प्रकृति तथा परिवेश से मात्र रागात्मकता और रुमानियत ही ग्रहण नही करतीं बल्कि जीवन - जगत की चुनौतियों व संघर्षों से टकराने के लिए भरपूर ऊर्जा और उत्साह भी हासिल करती दिखाई देती हैं और ऐसा करते हुए वे न तो सपाटबयानी पर उतरती नजर आती हैं और न ही कोई वक्तव्य या सूत्रवाक्य बन कर रह जाती हैं. लयात्मकता , सीधी सरल भाषा , आत्मपरक कहन शैली और लाउड हो जाने से बचने का सचेत आत्म - अनुशासन इस संग्रह की कविताओं की कुछ अन्य खूबियां हैं जो इसे रेखांकित करने योग्य बनाती हैं. प्रस्तुत हैं उनकी यह कविता जिसका अनुवाद किया है सिद्धेश्वर सिंह ने  :
          
          
अनंत जीवन
                                               
रानी जयचंद्रन
घाटी की ढलानों पर                                                 
ऐश्वर्य के मुकुट की तरह       
फिर खिला है कुरिन्जी*
बारह बरस के बाद.
नर्म - नाजुक फुहार और
मंद - मंथर हवा के सानिध्य में
डोल रही हैं
जामुनी- नीले रंग के फूल की चपल आँखें.

खूब गहरे तक धँसकर
पंखुड़ियों को चूमती हैं सूरज की किरणें
और उनमें भर देती हैं सुर्ख रंगत की सजावट .
चंद्रमा की रोशनी से नहाई हुई रात में
फैलता ही जा रहा है
ढलानों पर धीर धरी धरती का खिंचाव.

प्रेम की ऊष्मा से छलछलाती हवा
फुसफुसाहटों में करती आ रही है कोई बात
ठगी ठिठकी गंभीर हो ठहर जाती है
देर तक इस जगह.
और शान्त तैरता हुआ बादल
गाने लगता है
एक अकेले दिवस का
सिद्धेश्वर सिंह
कभी न खत्म होने वाला गौरवगान .

बारह बरस के बाद.
फिर खिला है कुरिन्जी
मंद - मंथर हवा के सानिध्य में
डोल रही हैं
जामुनी - नीले रंग के फूल की चपल आँखें.

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कविता - रानी जयचंद्रन 
अनुवाद - सिद्धेश्वर सिंह

रविवार, अप्रैल 03, 2011

नवरात्र कविता उत्सव २०११

इस बार की थीम - भारतीय कवयित्रियों की अंग्रेजी कविताओं के हिंदी अनुवाद

सिद्धेश्वर सिंह और शरद कोकास काम में व्यस्त
 कल दिनांक ४ अप्रेल से चैत्र का नवरात्र प्रारंभ  हो रहा है . पिछले नवरात्र के समय श्री सिद्धेश्वर सिंह जी ने और मैंने मिलकर यह तय किया था की इस नवरात्र में भारतीय कवयित्रियों की अंग्रेजी कविताओं के हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किये जायेंगे . 

समय इतनी तेज़ गति से बीता की पता ही नहीं चला . मेरी भी व्यस्तताएं रहीं . अपनी लम्बी कविता ' पुरातत्ववेत्ता ' पर डॉ . विजया के लिखे समीक्षा ग्रन्थ के विमोचन में मुंबई का दौरा , फिर कविता संग्रह की तैयारी . फिर कुछ यहाँ वहां के काम . 

आज सिद्धेश्वर जी को फोन किया तो उन्होंने कहा .. शरद भाई देर तो हो गई  लेकिन कोशिश करता हूं.. और उन्होंने दोपहर तक तीन कवयित्रियों की कविताये भेज भी दी . 

मुझे तो लगा रहा था ..अपने आलस्य और गैरजिम्मेदारी  के चलते इस बार यह क्रम टूट जाएगा . सिद्धेश्वर जी से मैंने अपना यह भय प्रकट किया तो उन्होंने कहा ..." नहीं शरद भाई , कविताएं तो पोस्ट होंगी ही , इसलिए की ब्लॉग  जगत में अब अच्छी कविता के पाठको की संख्या में वृद्धि हुई है . बहरहाल सिद्धेश्वर जी ने भरोसा दिलाया है तो यह हिम्मत कर पा रहा हूँ . देखिये नौ दिन तक नौ कवितायें दे पाते है या नहीं .

कुछ मदद की गुजारिश आप लोगों से भी है , यदि आपको कहीं भारतीय भाषा की कवयित्रियों की अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद मिले तो मुझे मेल करे .

तो चलिए कल मिलते है .. रानी जयचंद्रन की एक बेहद ख़ूबसूरत कविता के साथ .

इस नवरात्रि कविता उत्सव की जानकारी . मेल से , फोन से , एस एम एस से अपने मित्रों को भी दें . 

  आपका - शरद कोकास 




मंगलवार, मार्च 01, 2011

कवियों की उम्र और मित्रता वर्षॉं मे नहीं नापी जाती - नरेश चन्द्रकर



 नरेश चन्द्रकर से मेरी मित्रता को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ है । लेकिन कवियों की मित्रता वर्षों में नापी नहीं जाती न ही इसे किसी कालखण्ड में बान्धा जा सकता है । नरेश का कविता संग्रह " बहुत नर्म चादर थी जल से बुनी " जब परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रहा था तो उसने कहा , " शरद यह कविता संग्रह तुम्हे समर्पित कर रहा हूँ । " मैं चौंका .. " यार अभी समर्पण करने लायक उम्र तक नहीं पहुँचा हूँ मैं । " नरेश ने एक कहकहा लगाया और कहा .पागल ...उम्र से नहीं काम से नापी जाती है कवियों की उम्र । तुम्हारी लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " तुम्हे लम्बी उम्र दे चुकी है । 
आज एक मार्च नरेश चन्द्रकर का जन्मदिन है । ढेर सारी बधाई और प्यार के साथ नरेश की यह कविता उनके इसी संग्रह से । 
 
 बातचीत



यह आयातीत चीज़ नहीं है

इसे किसी की मिल्कियत में शुमार न करें
इसके पेटेण्ट होने के खतरे भी नहीं हैं

इसे कौन चुरा ले जा सकता है सात समुन्दर पार
किसकी मजाल जो हमें बोलने से रोके
यह तो तिलिस्मी पुड़िया है
इसे खोलें



जज़्बातों की लगाम टूट जाएगी

इसमें जीने की हज़ार नेमतें मिलेंगी

राह न सूझती हों , तो सूझेंगी

हज़ार दुश्वारियाँ हों , सुलझेंगी


इसे छोटी बात न समझें


हमारे वक़्त को इतना ख़राब बताने वाले
ज्ञानरंजन जी व नरेश चन्द्रकर की बातचीत 
ख़ुद ख़ौफ़ज़दा हैं


हमारे मिलने - मिलाने को लेकर !!


- नरेश चन्द्रकर  


( सभी चित्र शरद कोकास के कैमरे से ) 

शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

हमदर्द क़ातिल समय में दोहराते हैं -कुल्हाड़ी तो होगी ? - चन्द्रकांत देवताले


आज ग्वालियर में पहला “ कविता समय सम्मान “ वरिष्ठ कवि चन्द्रकांत देवताले को दिया जा रहा है । इस सम्मान के लिये चन्द्रकांत देवताले जी को बधाई के साथ प्रस्तुत है इस क़ातिल समय की पहचान कराती  1996 की उनकी एक  कविता जो मुझे आज भी प्रासंगिक लगती है ।  

कुल्हाड़ी

“ तुम्हारे घर में क्या कुछ है बचाव के लिए ?”
” मैं समझा नहीं किसलिये ।“
” आत्मरक्षा के लिए , जैसे बन्दूक ...”
 चौंककर कहता हूँ , “ नहीं ।“
” तलवार - फरसा - धारिया जैसा कुछ है ? “
“ नहीं । “
” तो लठ्ठ तो होगा ही ? “
” नहीं यह भी नहीं ।“
” तो मारे जाओगे बिना पहचान । “

समझाते हैं ऐसा बताते हैं वक़्त के भविष्यवक्ता शुभचिंतक
मैं दूसरा ही पचड़ा ले बैठता हूँ
गँदले पानी , मच्छर , चूहों और गन्दगी के बारे में
वे हँसते हैं और मानवीय लहजे में जगाते हैं
गोया मेरे भीतर सोया हो मध्ययुगीन योद्धा कोई गहरी नींद
फिर पूछते हैं - “ कुल्हाड़ी ? “
और मैं चालीस बरस पहले की अपनी
प्रिय कुल्हाड़ी की याद में डूबने लगता हूँ
जिससे चीरा करता था ईंधन के लिए धावड़े के डूँड
यादों के गहरे पानी से खींच लाते हैं
हमदर्द क़ातिल समय में दोहराते हैं -
” कुल्हाड़ी तो होगी ? “

उस एक क्षण में भटक जाता हूँ शहर - दर- शहर
जगह जगह ढूँढ आता हूँ एकदम निराश
अब इन्हें कैसे बताऊँ उस कुल्हाड़ी के बारे में
जो न जाने कब विस्थापित हो गई
हमारे घर की ज़रूरत और सरहद से

वे चले जाते हैं कुछ नाराज़ी
और थोड़ी उपेक्षा के साथ
पर मैं जैसे अहसानमन्द उनका बैठा रह जाता हूँ
याद करते हत्था उस कुल्हाड़ी का
जिसे चमकाने , चिकना सुन्दर बनाने में
एक बार कितने खुरदरे गट्टेदार हो गये थे मेरे हाथ ।

-- चन्द्रकांत देवताले 

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

जिसे बार - बार भूल जाता है अड़तालीस साल का आदमी ।



कल कवि कुमार अम्बुज का फोन आया...”  कैसे हो शरद ? बहुत दिनों से तुम्हारा कोई समाचार नहीं मिला ? “ कुमार भाई की इस चिंता ने मुझे द्रवित कर दिया । इस उम्र में जब सब लोग अपनी अपनी चिंता में व्यस्त रहते हैं किसी को इतनी चिंता कहाँ होती है कि पूछे कोई किस  हाल में जी रहा है । कुमार अम्बुज जी पिछले दिनों नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी की दूसरी पारी खेलने के लिये कमर कस रहे हैं । लेकिन यह कवि ही हो सकता है जो अपनी चिंता के साथ ज़माने भर की चिंता करे । प्रस्तुत है श्री कुमार अम्बुज की यह कविता उनके संग्रह “ क्रूरता “ से ।

अड़तालीस साल का आदमी

अपनी सबसे छोटी लड़की के हाथ से
पानी का गिलास लेते हुए
वह उसका बढ़ता हुआ कद देखता है
और अपनी सबसे बड़ी लड़की की चिंता में डूब जाता है

नाइट लैम्प की नीली रोशनी में
वह देखता है सोई हुई बयालीस की पत्नी की तरफ
जैसे तमाम किए- अनकिए की क्षमा माँगता है

नौकरी के शेष नौ - दस साल
उसे चिड़चिड़ा और जल्दबाज़ बनाते हैं
किसी अदृश्य की प्रत्यक्ष घबराहट में घिरा हुआ वह
भूल जाता है अपने विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ

अड़तालीस का आदमी
घूम- फिर कर घुसता है नाते - बिरादरी में
मिलता है उन्ही कन्दराओं उन्हीं सुरंगों में
जिनमें से एक लम्बे युद्ध के बाद
वह बमुश्किल आया था बाहर

इस तरह अड़तालीस का न होना चुनौती है एक
जिसे बार - बार भूल जाता है
अड़तालीस साल का आदमी ।  

                   -- कुमार अम्बुज