आज ग्वालियर में पहला “ कविता समय सम्मान “ वरिष्ठ कवि चन्द्रकांत देवताले को दिया जा रहा है । इस सम्मान के लिये चन्द्रकांत देवताले जी को बधाई के साथ प्रस्तुत है इस क़ातिल समय की पहचान कराती 1996 की उनकी एक कविता जो मुझे आज भी प्रासंगिक लगती है ।
कविता ही ज़िन्दगी हो जहाँ ऐसी एक दुनिया है यहाँ...शरद कोकास कोश में पढ़िए शरद कोकास और मित्रों की कविताएँ और लेख
शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011
हमदर्द क़ातिल समय में दोहराते हैं -कुल्हाड़ी तो होगी ? - चन्द्रकांत देवताले
आज ग्वालियर में पहला “ कविता समय सम्मान “ वरिष्ठ कवि चन्द्रकांत देवताले को दिया जा रहा है । इस सम्मान के लिये चन्द्रकांत देवताले जी को बधाई के साथ प्रस्तुत है इस क़ातिल समय की पहचान कराती 1996 की उनकी एक कविता जो मुझे आज भी प्रासंगिक लगती है ।
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शनिवार, फ़रवरी 12, 2011
जिसे बार - बार भूल जाता है अड़तालीस साल का आदमी ।
कल कवि कुमार अम्बुज का फोन आया...” कैसे हो शरद ? बहुत दिनों से तुम्हारा कोई समाचार नहीं मिला ? “ कुमार भाई की इस चिंता ने मुझे द्रवित कर दिया । इस उम्र में जब सब लोग अपनी अपनी चिंता में व्यस्त रहते हैं किसी को इतनी चिंता कहाँ होती है कि पूछे कोई किस हाल में जी रहा है । कुमार अम्बुज जी पिछले दिनों नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी की दूसरी पारी खेलने के लिये कमर कस रहे हैं । लेकिन यह कवि ही हो सकता है जो अपनी चिंता के साथ ज़माने भर की चिंता करे । प्रस्तुत है श्री कुमार अम्बुज की यह कविता उनके संग्रह “ क्रूरता “ से ।
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
बुधवार, फ़रवरी 02, 2011
एक नये रास्ते की सम्भावना भी यहीं से शुरू होती है
मेरे कवि मित्र एकांत श्रीवास्तव ने जब पहली बार यह कविता सुनी थी तो उन्हे यह कविता बहुत पसन्द आई थी .. सो यह कविता एकांत के लिये , और आप सभी के लिये ..जो जीवन की राहों पर चल रहे हैं और सामना कर रहे हैं हर आने वाले मोड़ का ..
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
गुरुवार, जनवरी 20, 2011
इस कविता में ऐसा क्या है ?
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
मंगलवार, जनवरी 11, 2011
सितारों का मोहताज़ होना अब ज़रूरी नहीं
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010
वह सचमुच अभी बच्चा है ।
सर्दियों की रात में अजीब सी खामोशी सब ओर व्याप्त होती है । टी.वी. और कम्प्यूटर और पंखे बंद हो जाने के बाद बिस्तर पर लेटकर कुछ सुनने की कोशिश करता हूँ । हवा का कोई हल्का सा झोंका कानों के पास कुछ गुनगुना जाता है । गली से गुजरता है कोई शख्स गाता हुआ ...आजा मैं हवाओं में उठा के ले चलूँ ..तू ही तो मेरी दोस्त है । मैं सोचता हूँ मेरा दोस्त कौन है ..यह संगीत ही ना जो रात दिन मेरे कानों में गूँजता रहता है । संगीत के दीवानों के लिये दुनिया की हर आवाज़ में शामिल होता है संगीत .. ऐसे ही कभी दीवाने पन में मैंने भी कोशिश की थी इस संगीत को तलाशने की । मेरी वह तलाश इस कविता में मौज़ूद है जो मैंने शायद युद्ध के दिनों में लिखी थी ...
संगीत की तलाश
मैं तलाशता हूँ
संगीत
गली से गुजरते
हुए
तांगे में जुते
घोड़े की टापों में
मैं ढूँढता हूँ
संगीत
घन चलाते हुए
लुहार के गले
से निकली हुंकार में
रातों को किर्र
किर्र करते
झींगुरों की ओर
ताकता हूँ
अन्धेरे में
कोशिश करता हूँ
सुनने की
वे क्या गाते
हैं
टूटे खपरैलों
के नीचे रखे
बर्तनो में
टपकने वाले
पानी की टप-टप
में
तेली के घाने
की चूँ-चूँ चर्र चर्र में
चक्की की खड़-खड़
में
रेलगाड़ी की
आवाज़ में
स्वर मिलाते
हुए
गाता हूँ
गुनगुनाता हूँ
टूट जाता है
मेरा ताल
लय टूट जाती है
जब अचानक आसमान
से
गुजरता है कोई
बमवर्षक
वीभत्स हो उठता
है मेरा संगीत
गोलियाँ चलने
की आवाज़
मेरा बच्चा इन
आवाज़ों को सुनकर
तालियाँ बजाता
है
घर से बाहर
निकलकर
देखता है आसमान
की ओर
खुश होता है
वह सचमुच अभी
बच्चा है ।
-- शरद कोकास
vv
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
रविवार, दिसंबर 12, 2010
दोस्त ! प्रेम के लिये वर्ग दृष्टि ज़रूरी है
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।



