कभी कभी ऐसा होता है कि बातें काम नहीं करतीं और कविता अपना काम कर जाती है | इन दिनों जो कुछ भी चल रहा है ब्लॉग जगत में वह सब जानते हैं | मुझे एक मित्र ने सलाह दी कि आप चुप क्यों हैं आप को भी कुछ कहना चाहिये | मैं ठहरा एक सीधा-सादा कवि , मैं क्या कहूँ और क्यों कहूँ ? ऐसा भी नहीं कि मैने कुछ कहा नहीं ,जहाँ कहना चाहिये और जितना कहना चाहिये वह तो मैंने कहा ही है | आज इस बारे में सोचते हुए अचानक कवि केदारनाथ सिंह की यह कविता दिखाई दे गई सो उद्धृत कर रहा हूँ । इसे पढिये इसके ध्वन्यार्थ निकालिये और इस कविता में जो सवाल है उसके बारे में सोचिये |
दो लोग
तुमने अकेले आदमी को पहाड़ से उतरते देखा है
मैं कहूँगा - एक कविता
एक शानदार कविता
मगर उन्हे तुम क्या कहोगे
वे दो लोग जो उस पेड़ के नीचे बैठे हैं
महज दो लोग
कितने घन्टो कितने दिन कितनी शताब्दियॉ से
वहाँ बैठे है दो लोग
क्या तुम बता सकते हो ?
दो लोग ज़रा देर बाद उठेंगे
और समूचे शहर को अपनी पीठ पर लादकर
किसी नदी या पहाड़ की तरफ़ चल देंगे दो लोग
दो लोग क्या करेंगे इस दुनिया का
तुम कुछ नहीं कह सकते !
दो लोग फ़िर लौटेंगे
किसी भरी दोपहरी में सड़क के किनारे
तुम्हे अचानक मिल जायेंगे दो लोग
मगर क्यों दो लोग
और हमेशा दो लोग
क्या 1 को तोड़ने से बन जाते हैं 2 लोग
दो लोग तुम्हारी भाषा में ले आते हैं
कितने शहरों की धूल और उच्चारण
क्या तुम जानते हो
दो लोग
सड़क के किनारे महज चुपचाप चलते हुए दो लोग
तुम्हारे शहर को कितना अनंत बना देते हैं
तुमने कभी सोचा है ?
केदारनाथ सिंह
( चित्र में - दो लोग , केदार जी और शरद कोकास ,शरद कोकास के घर में )
शरद और मैं भोपाल के रीजनल कॉलेज में साथ साथ थे । कविता लिखने की शुरुआत के साथ साथ बहुत सारी बदमस्तियाँ हमने कीं । मैं सोच रहा था इस बार फिर उसकी किसी शरारत के बारे में लिखूंगा लेकिन मैं सिर्फ सोचता रहा और कुछ लिख नहीं पाया । सो उसकी यह एक प्रेम कविता जो उसने अपनी अस्थायी नौकरी के शुरुआती दिनो में लिखी थी । शरद आज ही के दिन हमसे बिछुड़ गया था । उसकी इस कविता में और अन्य कविताओं में भी जितने बिम्ब हैं वे सब हम दोस्तों के जाने पहचाने हैं इसलिये यह कवितायें हमें बहुत अच्छी लगती हैं लेकिन कुछ ऐसे बिम्ब भी होते हैं जो एक खास उम्र में सभी को अपने से लगते हैं ..शरद बिल्लोरे की कविता की यही ख़ासियत है कि उसकी कविता सभी को अपनी ही दास्तान लगती है ।बहुत सहजता के साथ वह बड़ी- बड़ी बातें कविता में लिख जाता था ।
शरद ने बाद के दिनों मे अपनी दाढ़ी बढ़ा ली थी ,ऐसा उसने किसी के कहने पर किया था हम उसकी दाढ़ी कटवाने के पीछे पड़े रहते थे और वह हँसता था । फिर सब अपने अपने शहरों और गाँवों को लौट गये । शरद चिठ्ठियाँ लिखता रहा और फिर एक दिन अरुणाचल प्रदेश में उसे नौकरी मिली और वह चला गया । पहली ही छुट्टियों में घर लौटते हुए कटनी स्टेशन पर ट्रेन में उसे लू लगी और अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया । बाद में उसकी कविताओं का संग्रह मित्रों के प्रयास से प्रगतिशील लेखक संघ ने प्रकाशित किया ।
अब जबकि तुम इस शहर में नहीं हो
हफ्ते भर से चल रहे हैं
जेब में सात रुपये
और शरीर पर एक जोड़ कपड़े
एक पूरा चार सौ पृष्ठों का उपन्यास
कल ही पूरा पढ़ा
और कल ही अफसर ने
मेरे काम की तारीफ की
दोस्तों को मैंने उनकी चिठ्ठियों के
लम्बे लम्बे उत्तर लिखे
और माँ को लिखा
कि मुझे उसकी खूब खूब याद आती है
संवादों के
अपमान की हद पार करने पर भी
मुझे मारपीट जितना
गुस्सा नहीं आया
और बरसात में
सड़क पार करती लड़कियों को
घूरते हुए मैं झिझका नहीं
तुम्हे मेरी दाढ़ी अच्छी लगती है
और जबकि तुम
इस शहर में नहीं हो
मैं
दाढ़ी कटवाने के बारे में सोच रहा हूँ ।
- शरद बिल्लोरे
शरद को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.. यही सोचता हूँ कि वह आज होता तो देश का एक बड़ा कवि होता । क्या कहूँ उसे याद करते हुए आँखों के साथ साथ मन भीग जाता है..। आज कुछ मित्रों के साथ शरद की स्मृतियों को शेयर किया और आज ही मुझे पता चला कि जिसे उसकी दाढ़ी अच्छी लगती थी वह इन दिनो कनाडा में है । शरद पर न सही उसकी कविता पर कुछ तो कहिये - शरद कोकास
चित्र 1 -शरद बिल्लोरे के कविता संग्रह का मुखपृष्ठ चित्र 2 - रीजनल कॉलेज भोपाल
मई 1984 में जबलपुर में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कविता रचना शिविर हुआ था । दस दिनों तक कविता पर लगातार बातचीत होती रही । हम सभी शिविरार्थी युवा थे 22-24 साल की उम्र ,सवाल तो इस तरह करते थे जैसे क्लास में बैठे हों । और जवाब देने वालों में भी साहित्य के बड़े बड़े महारथी थे ।जब मज़दूरों पर कविता लिखने की बात आई तो एक युवा साथी ने सवाल किया .. मज़दूर मेहनत करता है लेकिन कारखाने का मालिक मुनाफा कैसे कमाता है ? उत्तर मिला .. सीधी सी बात है वह 20 रुपये का काम एक दिन मे करता है और उसकी मजदूरी 10 रुपये तय की जाती है । इस तरह उसे मजदूरी देने के बाद मालिक के एक दिन मे दस रुपये बच जाते है । अब उसके कारखाने मे 1000 मजदूर है तो उसके एक दिन मे 10000 रुपये बच जाते हैं । महीने में 30 x 10000 = 300000 और साल में 12 x300000 = 36,00000 .. | अब छत्तीस लाख में नयी फैक्टरी तो डाली जा सकती है ना ।
बहरहाल , अब मजदूर ने तो अर्थशास्त्र पढा नही है न ही उसे यह गणित आता है । उसे तो बस काम करना आता है , वह करता है । उसे तो यह भी नहीं पता होता कि उसका शोषण हो रहा है । लेकिन जो पढ़े लिखे है वे तो जानते हैं ।
आज मजदूर दिवस पर जाने कितने मजदूर उसी तरह मजदूरी मे लगे होंगे और उन्हे पता भी नही होगा कि आज मजदूर दिवस है । हमे पता है इसलिये हम मजदूरों के पक्ष में लिख रहे हैं ..भले ही वे न पढ़ पायें लेकिन हाँ उन मजदूरों को हम यह ज़रूर बतायें कि हम क्या लिख रहे है और क्यों लिख रहे हैं । इन्हे कमज़ोर मत समझिये जिस दिन ये समझ जायेंगे उस दिन अपना छीना हुआ हिस्सा मांग लेंगे ... मशहूर शायर फैज़ अहमद "फैज़" ने कहा है ..
“हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे
एक खेत नहीं एक गाँव नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे “
उस शिविर में मजदूरो पर कविता लिखने की पारी में मैने भी एक कविता लिखी थी । मुझे पंक्ति मिली थी ..”कल का दिन बिगड़ी हुई मशीन सा था “ मैने क्या लिखा था आप भी पढिये ..
कई साल पहले की बात है । ऐसे ही जब ग्रीष्म का आगमन हुआ एक दिन दफ्तर में एक मित्र से बात चल रही थी । वे कहने लगे “ यार गर्मी के दिनों में दफ्तर जाना बहुत अखरता है ।“ मैने कहा “ क्या करोगे भाई नौकरी तो नौकरी है , करनी ही पड़ेगी । आखिर मौसम को भी प्रकृति के दफ्तर में अपनी नौकरी बजानी ही पड़ती है । “ बस इसी बात से उपजा विचार कुछ नये बिम्बों के साथ कविता में ढल गया । इन दिनों फिर गर्मी का मौसम है सो इस कविता की याद आ गई , लीजिये आप भी पढ़िये ..पढ़कर अच्छा लगेगा । हाँ ,एक बात और , यह कविता समर्पित कर रहा हूँ उन तमाम मित्रों को जो इस भीषण गर्मी में भी नौकरी कर रहे हैं , इस दुआ के साथ कि उन्हे कुछ तो राहत मिले ।
ग्रीष्मागमन हो रहा है । किसी दिन नींद से जल्दी जागिये और सुबह सुबह कहीं खेतों की ओर निकल जाइये , ठंडी ठंडी हवा , नींद से जागा हुआ रास्ता , टहलने निकले लोग और इनके बीच किसी अमराई से आती कोयल की कूक , आपको ज़िन्दगी का एक नया अर्थ देती हुई प्रतीत होगी । कोयल जब कूकती है तो लगातार कूकती है और जब आप ध्यान देना बन्द कर देते हैं तो अचानक चुप हो जाती है । मैं बचपन में यह खेल खेलता था ..कोयल की चुप्पी के क्षण गिनने का । कोयल की कूक से भरी सुबह को सुहानी सुबह इसीलिये तो कहते हैं ना कि सुबह सब कुछ भला भला सा लगता है । सुबह सुबह कोई कुविचार हमारे दिमाग़ में नहीं आता, बिलकुल साफ –सुथरी स्लेट की तरह होता है हमारा अवचेतन । हम उमंग और उत्साह से भरे होते हैं ।ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी का असली आनन्द तो यही है ।
लेकिन मैं क्या करूँ .. सुबह सुबह जब कोयल की कूक सुनता हूँ तो किसान की बेबसी याद आती है , रातपाली से लौटते हुए मज़दूर को देखता हूँ तो उसके शोषण का खयाल आता है , गाँव के बच्चों को सुबह सुबह खेलते हुए ,और पढ़ते हुए देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या इनका जीवन भी अपने माता –पिता की तरह ही बीतेगा ? क्या ये भी आगे चलकर किसी ज़मीन्दार, किसी कारखाने के मालिक के शोषण का शिकार बनेंगे ? क्या यह भी भाग्यवाद है कि किसी के पास सब कुछ और किसी के पास कुछ भी नहीं ? चलिये कोयल की कूक सुनते हुए इस बार आप भी मेरी तरह सोचकर देखिये ।
हम सब इज़्ज़तदार लोग हैं .. । हम में से कितने लोग हैं जो इस बात से इंकार करेंगे ? कोई नहीं ना । ग़रीब से ग़रीब आदमी भी कहता है " हमारी भी कुछ इज़्ज़त है । " वैसे पैसे और इज़्ज़त का कोई सम्बन्ध भी नहीं है । फिर भी कहा जाता है कि इज़्ज़त की फिक्र न पैसे वाले को होती है न ग़रीब को । हाँलाकि इज़्ज़त तो इन दोनो की भी होती है । लेकिन इज़्ज़त के नाम से सबसे ज़्यादा घबड़ाता है एक मध्यवर्गीय । अब ले-दे कर एक इज़्ज़त ही तो होती है उसके पास और जो कुछ भी होता है इसी इज़्ज़त को सम्भालने में ही खत्म हो जाता है । अब ऐसे निरीह प्राणि की भी कोई बेइज़्ज़ती कर दे तो ? बस ऐसे ही एक चरित्र को लेकर गढ़ी गई है यह कविता ।
प्रथम दिन से लेकर अब तक इन कवयित्रियों को आपने पढ़ा -प्रथम दिन से लेकर आपने अब तक फातिमा नावूत , विस्वावा शिम्बोर्स्का, अन्ना अख़्मातोवा .गाब्रीएला मिस्त्राल और अज़रा अब्बास , दून्या मिख़ाइल और शीमा काल्बासी और ग्राज़्यनाक्रोस्तोवस्काकी कवितायें पढ़ीं ।
प्रथम दिन से लेकर अब तक इन पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आपने पढ़ीं - इन कविताओं पर जो बातचीत हुई उसमे अपनी सहभागिता दर्ज की अशोक कुमार पाण्डेय ने ,शिरीष कुमार मौर्य ने ,लवली कुमारी ,हरि शर्मा ,पारुल ,राज भाटिया , सुमन , डॉ.टी.एस.दराल , हर्षिता, प्रज्ञा पाण्डेय ,मयंक , हरकीरत “हीर” , के.के.यादव , खुशदीप सहगल , संजय भास्कर ,जे. के. अवधिया , अरविन्द मिश्रा , गिरीश पंकज ., सुशीला पुरी , शोभना चौरे , रश्मि रविजा , रश्मि प्रभा , बबली , वाणी गीत , वन्दना , रचना दीक्षित ,रानी विशाल ,संगीता स्वरूप , सुशील कुमार छौक्कर देवेन्द्र नाथ शर्मा , गिरिजेश राव , समीर लाल , एम.वर्मा ,कुलवंत हैप्पी ,काजल कुमार ,मुनीश ,कृष्ण मुरारी प्रसाद,अपूर्व ,रावेन्द्र कुमार रवि, पंकज उपाध्याय,विनोद कुमार पाण्डेय ,अलबेला खत्री , चन्दन कुमार झा , डॉ.रूपचन्द शास्त्री “ मयंक “,अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, रजनीश परिहार अविनाश वाचस्पति , सिंग एस.डी एम ,ललित शर्मा और अम्बरीश अम्बुज ने । आप सभी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ । जिन लोगों ने फोन और ईमेल के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की उनका भी मैं आभारी हूँ । जिन लोगों ने इसे पढ़ा और प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाये उन्हे भी मैं धन्यवाद देता हूँ ।
प्रथम दिन से लेकर कल तक प्रस्तुत इन कविताओं के पश्चात आज इस श्रंखला की अंतिम कड़ी में प्रस्तुत कर रहा हूँ हालीना पोस्वियातोव्स्का की दो कवितायें इन कविताओं का चयन एवं बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है कबाड़खाना ब्लॉग के श्री अशोक पाण्डेय ने । अशोक जी के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं ।
कवयित्री का परिचय
पोलैंड की रहने वाली हालीना (1934- 1967 )को बचपन में टी.बी. हो गई थी । वह स्कूल नहीं जा सकी । माँ के साथ टीबी सेनिटिरियम के चक्कर लगाते हुए उसकी मुलाकात अडोल्फ नामक एक युवा फिल्म निर्देशक से हुई । अडोल्फ को भी टी बी थी । दोनो ने विवाह कर लिया परंतु अडोल्फ की मृत्यु हो गई । हालीना कवितायें लिखने लगी थी । लेकिन उसका स्वास्थ्य इस कदर बिगड़ा के चिकित्सकों ने उसे अमेरिका ले जाने की सलाह दी ।उसके पास इलाज़ के लिये पैसा नहीं था । पोलैंड के महाकवि चेस्वाव मिवोश और ताद्यूश रोज़ेविच के प्रयासों से उसका इलाज का खर्च निकला ।अमेरिका मे पहला ऑपरेशन सफल रहा । वह पोलैंड विश्वविद्यालय मे दर्शन शास्त्र भी पढ़ाने लगी लेकिन 1967 में दूसरे ऑपरेशन के दौरान 33 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई ।
तब तक उसके तीन कविता संग्रह आ चुके थे । 1968 में चौथा आया । हालीना ने प्रेम और और ऐन्द्रिकता को अपना विषय बनाया था उसे भान था कि कभी भी उसकी मृत्यु हो सकती है ।उसकी कविता में प्रेम की उथल-पुथल के साथ मृत्यु के सामंजस्य का विकट ठहराव देखने को मिलता है ।
जोढिठाईसेघासकेकानमेंफुसफुसातीजातीहै प्रेम, प्रेम वहउठनेनहींदेगीमुझे
औरख़ुदचलदेगी मेरेअभिशप्तख़ालीघरकीओर
हालीना पोस्वियातोव्स्का
नवरात्र में प्रस्तुत विदेशी कवयित्रियों की यह कविता श्रंखला आपको कैसी लगी ? ज़रूर बताइयेगा । इसश्रंखला की कविताओं को उपलब्ध करवाया श्री अशोक पाण्डेय , श्री सिद्धेश्वर . ने । इसके अलावा कुछ कवितायें मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका पहल से भी लीं जिनके अनुवादक हैं श्री गीत चतुर्वेदी ,रजनीकांत शर्मा और सलीम अंसारी । आप सभी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ - शरद कोकास