मंगलवार, सितंबर 22, 2009

मुझे एक बलात्कारी से गर्भ धारण करना है

नवरात्रि पर्व पर विशेष कविता श्रंखला -समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें-चौथा दिन


नीलेश रघुवंशी की कविता “हंडा” के विषय में अशोक कुमार पाण्डेय कहते हैं “औरत के पूरे सामाजिक आर्थिक परिवेश में स्थान तलाशने की जद्दोज़ेहद कविता के पूरे सौष्ठव में उपस्थित है।वहीं अजय कुमार झा का कहना है “कवयित्री ने हंडे में नारी जीवन का सारा सारांश समेट कर रख दिया है । “शोभना चौरे और निर्मला कपिला इसे ग्रामीण महिला का जीवन दर्शन मानती है ।लोकेन्द्र इस हंडे में पूरा नारित्व देखते हैं । हेम पाण्डेय का कहना है “यह स्थिति के बदलाव हेतु सार्थक शुरुआत है । चन्द्र कुमार जैन का कहना है “यह प्रस्तुति कविता में बची हुई गंध जैसी प्रतीत हो रही है । “ मुकेश कुमार तिवारी ने कहा “कविता हंडे में रचे बसे हुये संसार में स्त्री देहमुक्त हो अपने वुजूद को तलाशती विवश है।“ ललित शर्मा ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे छत्तीसगढ़ी में हंडे की की नियति बताते हुए कहा है कि ” शरद भाई,अब जमाना बदल गे भाई पहिली जैसे नई ये कड़हा,रहे के कनवा रहय सबे बेचा जाये। “ अमलेन्दु अस्थाना,योगेश स्वप्न और राज भाटिया जी को जहाँ यह कविता पसन्द आई है वहीं रवि रतलामी जी ने पहली बार मेरे इस ब्लॉग पर कदम रखकर मेरे ब्लॉग बुखार को नियंत्रित करने के लिये मुझे आवश्यक तकनीकी सलाह दी है । मै उनके प्रति आभारी हूँ ।

आज नवरात्र के चौथे दिन प्रस्तुत है कवयित्री शुभा की यह कविता जो मैने अनामिका द्वारा सम्पादित संकलन “ कहती हैं औरतें “ से ली है । साभार – शरद कोकास



मै
हूँ एक स्त्री
मै हूँ एक स्त्री

कौन कह सकता है मैं शर-विध्या सीखना चाहती हूँ
मैं उस धूर्त और दयनीय ब्राह्मण दोणाचार्य की मूर्ति भी नहीं बना सकती
क्योंकि वह पर पुरुष है

मैं एकलव्य नहीं बन सकती
मेरा अंगूठा है मेरे पति का

मैं शम्बूक भी नहीं बन सकती
क्योंकि मुझे एक बलात्कारी से गर्भ धारण करना है

एकलव्य और शम्बूक मैं तुम्हारे एकांत से
ईर्ष्या करती हूँ
क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ और ब्राह्मणों की दुनिया
भंग करना चाहती हूँ

शुभा

सोमवार, सितंबर 21, 2009

मैने तो ऎसी नारियाँ भी देखी है कि मर्द को बेच खाये


नवरात्रि पर्व पर 
विशेष कविता श्रंखला -समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें  -तीसरा दिन           

कात्यायनी की कविता पर द्विवेदी जी ने कहा “यहाँ स्त्री अभिव्यक्त नहीं हो रही है। अपितु वह पुरुष अभिव्यक्त हो रहा है जो अपने लिए एक खास औरत चाहता है। उसे स्त्री के जीवन से कोई मतलब नहीं है। वह अपने लिए स्त्री को उपकरण समझता है । शोभना चौरे जी ने कहा यह पुरुष के दोगलेपन को प्रकट करती है ।गिरीश पंकज जी कात्यायनी को जुझारू और सामाजिक परिवर्तन के लिये प्रतिबद्ध मानते हैं लेकिन इसके विपरीत अशोक कुमार पाण्डेय जी को अनामिका की कविता और इस कविता में मूल अंतर नज़र आया कि जहां अनामिका ने कविता रची है कात्यायनी ने गढी है। यह स्वाभाविक गुस्से या समर्थन की उपज नही लगती। राज भाटिया जी तो बेहद नाराज़ हैं वे कहते हैं पुरुषों की ओर से मैं अभी अभी शर्मिन्दा होकर लौटा हूँ, कदापि नही, मैं तो ऎसा हरगिज नही सोचता, कविता पसंद आई, लेकिन सभी नारियां इतनी भी बेचारी नही कि पुरुषों को शर्मिंदा होना पडे, मैने तो ऎसी नारियाँ भी देखी है कि मर्द को बेच खाये लेकिन उनका मानना है सिर्फ़ नारी होने से कोई महान या कमजोर या दया का पात्र नही होता , नारी महान वो ही है जो महान काम करती है, वही पुजी जाती है, ओर मर्द भी बही महान है जो अच्छा काम करे । अपूर्व ने कहा “कात्यायनी की कविताएं वैसे भी मुझे ढ़ोंगी और हिपोक्रिट समाज के गाल पर तमाचा जैसी लगती हैं..वह समाज जिसका हिस्सा मैं भी हूँ..।“ डॉ. दराल का मानना है कविता में आक्रोश झलकता है, लेकिन आज की नारी इतनी दुर्बल नहीं है.। पारुल तो पढ़ने के बाद मन में उपजी खीज को चुपचाप पी लेना चाह्ती हैं उसे टिप्पणी कर के कम नही करना चाह्ती । बबली ने शिक्षा पर ज़ोर देते हुए कहा कि आजकल की औरते मर्दों से एक कदम आगे है! चाहे कोई भी काम हो औरते पीछे नहीं हटती और पूरे लगन के साथ उस काम को अंजाम देती हैं! एम.ए.शर्मा सेहर ने कहा ये कविता औरत को झकझोरतीहुयी कहती है - उठो पहचानो अपने आप को.... अपनी शक्ति को !
तो आज तीसरे दिन प्रस्तुत है युवा कवयित्री नीलेश रघुवंशी की यह चर्चित कविता “ हंडा "                                
                                                                    हंडा                                                                                          

एक पुराना और सुन्दर हंडा
भरा रहता जिसमे अनाज
कभी भरा जाता पानी 
भरे थे इससे पहले सपने

वह हंडा
एक युवती लाई अपने साथ दहेज में
देखती रही होगी रास्ते भर
उसमें घर का दरवाज़ा
बचपन उसमें अटाटूट भरा था
भरे थे तारों से डूबे हुए दिन

नहीं रही युवती 
नहीं रहे तारों से भरे दिन 
बच नही सके उमंग से भरे सपने
हंडा है आज भी
जीवित है उसमें
ससुराल और मायके का जीवन 
बची है उसमें अभी
जीने की गन्ध
बची है स्त्री की पुकार
दर्ज है उसमें 
किस तरह सहेजती रही वह घर

टूटे न कोई 
बिखरे न कोई 
बचे रह सकें मासूम सपने
इसी उधेड़बुन में 
सारे घर में लुढ़कता फिरता है हंडा      

-नीलेश रघुवंशी

रविवार, सितंबर 20, 2009

पुरुषों की ओर से मैं अभी अभी शर्मिन्दा होकर लौटा हूँ


नवरात्रि पर्व पर
विशेष कविता श्रंखला -समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें 


नवरात्रि के प्रथम दिन प्रस्तुत अनामिका जी की कविता "स्त्रियाँ " दिनेश राय द्विवेदी जी को बहुत पसन्द आई उन्होने कहा  "सदियों से जिस तरह नारी को समाज में दमन का सामना करना पड़ा है और करना पड़ रहा है उस से अधिकांश नारियों में का इंसान होने का अहसास ही गुम हो गया है। यह अहसास पैदा हो जाए बहुत है। बाकी काम तो नारियाँ खुद निपटा लेंगी।" अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा "यह कविता इतनी प्रभावशाली है कि कई बार पढी गयी होने के बावजूद पढ़वा ले जाती है । "निर्मला कपिला ने कहा " बहुत सुन्दर रचना है नारी के सच का सच "। अलबेला खत्री ने इस प्रस्तुति पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा "शरद जी आप नारी तो नहीं हो..परन्तु नारी के स्वाभिमान व सम्मान ही नहीं उसके अन्तर की वेदना व संवेदना से भी भलीभांति परिचित हो और नारी के मार्ग में आने वाले कंटकों को सदैव दूर करने का प्रयास करते हो । " मीनू खरे ने कहा "अनामिका जी की अभिव्यक्ति अद्भुत लगी.। " डॉ. टी.एस. दराल ने कहा " नारी के कोमल अहसास का बहुत सुन्दर चित्रण. है । "विनोद कुमार पाण्डेय ,समयचक्र ,हेमंत कुमार,राज भाटिया तथा मिथिलेश दुबे को यह रचना पसन्द आई ।अनामिका जी की पंक्तियाँ " बेकार बेचैन और आवारा महिलाओं का ही शगल है यह  कहानियाँ और कविताएँ " पर टिप्पणी करते हुए नन्ही कोपल ने कहा " आजकल स्त्रियाँ आजकल कहानी कविताये ही नही बल्कि बहुत सुंदर सुंदर विचारयुक्त ब्लोग भी लिख रही है । इसी तरह आगे भी लिखती रहेगी ।"भूतनाथ जी ने कवि राजेश जोशी के "मैं हिन्दू होने पर शर्मिन्दा हूँ " की तर्ज़ पर कहा कि "  पुरुषों की ओर से मैं अभी अभी शर्मिन्दा होकर लौटा हूँ ।"गिरीश पंकज जी ने कहा " अनामिका जी की कविता समकालीन पुरुष प्रवृत्तियों का पोस्टमार्टम करती है ,आशा है ऐसी ही श्रेष्ठ रचनायें पढ़ने को मिलेंगी ।
                              इस कड़ी मे आज दूसरे दिन प्रस्तुत है "सात भाईयों के बीच " कविता संग्रह के लिये प्रसिद्ध एक्टिविस्ट कवयित्री कात्यायनी की यह कविता ।                                                                          


नहीं हो सकता तेरा भला  



बेवकूफ जाहिल औरत
कैसे कोई करेगा तेरा भला
अमृता शेरगिल का तूने
नाम तक नहीं सुना
बमुश्किल तमाम बस इतना ही
जान सकी हो
इन्दिरा गान्धी इस मुल्क की रानी थी
(फिर भी तो तुम्हारे भीतर कोई प्रेरणा का संचार नहीं होता )
रह गई तू निपट गंवार की गंवार ।
पी.टी.उषा को तो जानती तक नहीं
माग्ररेट अल्वा एक अजूबा है
तुम्हारे लिये ।
“क ख ग घ” आता नहीं
’मानुषी ‘ कैसे पढ़ेगी भला –
कैसे होगा तुम्हारा भला -
मैं तो परेशान हो उठता हूँ !
आजिज आ गया हूँ तुमसे
क्या करूँ मै तुम्हारा ?
हे ईश्वर !
मुझे ऐसी औरत क्यों नहीं दी
जिसका कुछ तो भला किया जा सकता
यह औरत तो बस भात रान्ध सकती है
और बच्चे जन सकती है
इसे भला कैसे मुक्त किया जा सकता है ?

                        कात्यायनी                                                                                              


( यह आवाज़ पुरुष के उस मन से आ रही है जो हमेशा अप्रकट रहता है इसी यथार्थ को बेनकाब किया है कवयित्री कात्यायनी ने - क्या सोचते हैं आप - शरद कोकास )                                                      

शनिवार, सितंबर 19, 2009

औरतों को डर नहीं लगता कुछ भी कह जाने में



नवरात्रि पर्व पर
विशेष कविता श्रंखला -समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कवितायें   



            दुर्गा की प्रतिमाओं को ठेलों ,ट्रैक्टर ट्रालियों में सहेजकर लाते हुए देखा तो विचार आया कितनी सुन्दर और भव्य प्रतिमायें हैं लेकिन कितनी नाज़ुक , केवल मिट्टी और पानी से बनी हुई .. ज़रा सी ठोकर लग जाये तो टूट जायें । लेकिन हम इन्ही प्रतिमाओं को शक्ति का प्रतीक मानकर इनकी उपासना करते हैं इनसे शक्ति प्राप्त करते हैं । इस द्वन्द्व पर विचार करते हुए  सुविख्यात कवयित्री अनामिका  द्वारा सम्पादित पचास कवयित्रियों की कविताओं का संकलन “ कहती हैं औरतें “ के पन्ने पलट ही रहा था कि आमुख में उद्धृत  अनामिका जी की कविता पर नज़र पड़ी .. “ औरतों को डर नहीं लगता / कुछ भी कह जाने में / उनको नहीं होती शर्मिन्दगी मानने में / कि उनमें पानी भी है मिट्टी भी / पानी और मिट्टी : इन दोनो में से किसीका / कोई ओर छोर नहीं होता / लिखती हैं औरतें इसी से धारावाहिक चिठ्ठियाँ पानी और मिट्टी / खुद एक धारावाहिक चिठ्ठी ही तो हैं / ईश्वर की – हम सबके नाम । “
            मुझे लगा यह स्त्री तो सचमुच दुर्गा की जीती जागती प्रतिमा है मिट्टी और पानी से बनी हुई लेकिन पुरुष न उसे सहेजना जानता है न उसके भीतर की ताकत को पहचानता है ..फिर शक्ति की उपासना का दिखावा क्यों ? मैने सुबह सुबह अनामिका जी को फोन लगाया और अनुमति ली कि मै इस संकलन से पूरे नवरात्र तक प्रतिदिन एक कवयित्री की कविता प्रस्तुत करना चाहता हूँ । उन्होने कहा “ मातृशक्ति की उपासना  एक कवि इसी तरह से ही तो कर सकता है । “
            प्रस्तुत है क्वाँर माह की इस प्रतिपदा पर नवरात्र के प्रथम दिन अनामिका जी की यह कविता “ स्त्रियाँ” – शरद कोकास  

                                    स्त्रियाँ

पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज़
बच्चों की फटी कॉपियों का
चनाजोरगरम के लिफाफे बनाने के पहले !
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनीदे
देखी जाती है अलार्म घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद


सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने  
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में


भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के
दुख की तरह
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसा हैं -
हमें कायदे से पढ़ो एक - एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी ए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग !

सुनो हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई – नई सीखी हुई भाषा !


इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीखती हुई चीं – चीं
‘ दुश्चरित्र महिलायें ,दुश्चरित्र महिलायें –
किन्ही सरपरस्तों के दम पर फूली फैली
अगरधत्त जंगली लतायें !
खाती –पीती सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन , आवारा महिलाओं का ही
शगल है ये कहानियाँ और कवितायें ..!
फिर ये उन्होंने थोड़े ही लिखी हैं । ‘
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी )
बाकी कहानी बस कनखी है।


हे परमपिताओं,
परमपुरुषों -
बख्शो ,बख्शो, अब हमें बख्शो !

                        -अनामिका

(आधी आबादी की आवाज़, इन कविताओं में प्रतिदिन अवश्य पढ़ें यह निवेदन । आपका – शरद कोकास )



  

गुरुवार, सितंबर 17, 2009

विश्वकर्मा पर विश्व की एकमात्र समकालीन कविता

मनुष्य ने इस धरा पर जन्म लेने के उपरांत अपने श्रम से इसे रहने लायक बनाया । वहीं जब उसने निर्माण और संहार के देवताओं से परिचय प्राप्त किया तब श्रम के देवता के रूप में  विश्वकर्मा को अपना आराध्य बनाया । कालांतर में श्रम का यह मिथक कुछ विशिष्ट जनों ने हस्तगत कर लिया और इस आधार पर जातियाँ बन गईं । पत्थर की यदि ज़ुबान होती तो हम जान पाते कि हमारे ही गढ़े गए देवताओं के दुख क्या हैं । मैने "विश्वकर्मा " को इसी सन्दर्भ में देखा है .।. कुन्दनलाल सहगल का गाया गीत सुन रहा था एक दिन ..चन्दन का जंगला, सोने का बंगला ,विश्वकर्मा ने बनाया .. तब इस कविता ने जन्म लिया ..। आज विश्वकर्मा जयंती पर इसका प्रथम प्रकाशन कर रहा हूँ । इन पंक्तियों के अनेक ध्वन्यार्थ हैं.. ध्यान से पढ़ने के निवेदन के साथ  .-शरद कोकास


2003/400

विश्वकर्मा


सोने का बंगला चन्दन का जंगला
विश्वकर्मा ने बनाया था
कुछ बरस पहले आरज़ू साहब का यह गीत 
फिलिम प्रेसिडेंट में सहगल साहब ने गाया था

प्रजापति के मिथक में विश्वनिर्माता था विश्वकर्मा
उसकी पीठ पर बहते पसीने में बहती थी नदियाँ
पहाड़ उसके माथे पर पड़े हुए बल थे
हवाओं में पेड़ यूँ झूमते मानो उसके रोम लहराते हों
उसकी फटी बिवाईयों में कराहते मनुष्य के दुख
उसके सृजन के सुख में गूंजती संतोष की हँसी

स्वर्ग की कल्पना से पहले महज मिट्टी थी यह धरती
खौलते समुद्रों से उठकर आती थीं ज़हरीली हवाएँ
लावा उगलते थे धरती की छाती पर खड़े पर्वत
आग बरसती थी अबूझ आसमान से
जीवन के इस वैपरीत्य में भी उसने
जीने  के लिये रास्ते बनाये
पहला श्रमजीवी था वह धरती का पहला मज़दूर
अपने औज़ारों से जिसने स्वप्नों के शिल्प गढ़े
नवजात पृथ्वी की नग्न देह ढाँकने के लिये
सभ्यता की शक्ल में निर्मित किये वस्त्राभूषण

जन्मना नहीं था वह अपनी देह में
न ही देह से बाहर कहीं था उसका अस्तित्व
भविष्य का मनुष्य ढूँढ रहा था उसे पुराण कथाओं में
महल से झोपड़ी तक चप्पे-चप्पे में मौज़ूद था उसका श्रम
जिसकी महत्ता स्थापित करने के लिये वह
मनुष्य के मन में आकार ले रहा था

अद्भुत पर आस्था के उस अन्धेरे समय में
जहाँ मनुष्यों के बीच देवता बनने की जंग जारी थी
वर्ण की चौखट में बन्द कर दिया उसे मनुष्यों ने
छीन लिये उसके औज़ार बाँट लिये आपस में
उसके सृजन का सम्मान किया
और चुरा ली उससे रचने की ताकत
मन्दिरों में स्थापित कर दिया उसे
और रोली चन्दन फूलों के ढेर में छुपा दिये
उसके मेहनती हाथ

एक श्रमिक को ईश्वर बनाने का यह ऐसा षड़यंत्र था
जिसकी आड़ में अकर्मण्यता का अनिर्वचनीय सुख था
अंतत: मनुष्यों ने अपना ली उसकी कला
और उसके अविष्कारों को खुद का बताकर
अपने नाम से पेटेंट कर दिया
शिल्प के सर्वाधिकार प्राप्त किये
तय किया श्रम का बाज़ार भाव
उसके नाम पर स्थापित किये समाज और संगठन
और स्वयम्भू हो गये

घंटी, आरती और भजन के शोर में चुपचाप
जाने कब निकला वह मनुष्य की नज़रें बचाकर
समा गया कुदाल-फावड़ों ,आरी-बसूलों और छेनी-हथौड़ों में ।

                                   
                                                शरद कोकास


(छवि गूगल से साभार )
                                     



मंगलवार, सितंबर 08, 2009

पढ़े-लिखों से एक सवाल


जिनकी साक्षरता के लिये प्रयास किये जा रहे हैं उनमे से नब्बे प्रतिशत को नहीं पता होगा कि आज अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस है । पढ़े-लिखों में से भी कितनों को पता है !! टी.वी पर कुछ आ गया तो देख लिया वरना हम अपनी ज़िन्दगी में चैन से हैं हमे क्या करना है । कभी सोचा है हमने दिन भर में कितने निरक्षरों से हमें काम पड़ता है ? कामवाली बाई, धोबी,दूधवाला, मोची,पंचरवाला ,साफ सफाई करने वाला । हम कभी पूछते हैं उनसे भैया स्कूल क्यों नहीं गये ,और पूछ भी लेते हैं तो क्या कर देते हैं इनके लिये । आप मुझसे भी पूछ सकते हैं यह सवाल लेकिन मेरे पास इसका उत्तर है । मैने दुर्ग ज़िले के साक्षरता अभियान मे 5-6 वर्षों तक सक्रिय भागीदारी की है और एक अक्षर सैनिक से लेकर मुख्य स्त्रोत व्यक्ति तक का काम किया है । 90 से 95 तक का वह दौर जब सरकारी प्रयासों से अलग एक आन्दोलन की तरह यह अभियान हमारे दिमागों मे पलता था ,दिन भर और देर रात तक काम करने के बाद नींद में भी कई प्रश्न मचलते थे और कई बार कविता बनक कागज़ पर उतर आते थे । उसी दौर की एक कोंच-कविता जो जन गीत के शिल्प में है यहाँ दे रहा हूँ उन तमाम पढ़े-लिखे लोगों को याद करते हुए जो उस समय मेरे साथ थे और सफदर हाशमी, हरजीतसिंह हुन्दल और ऐसे ही कई कवियों की कविताओं के संग इसे भी गाया करते थे ।

पढ़े-लिखों से एक सवाल

रहते हुए आपके क्यों बुझी मशाल है
आप
हैं पढ़े लिखे आपसे सवाल है

ज्ञान
को ढोते हुए आप यहाँ गये
सुख
से भरी दुनिया में अपना मकाँ पा गये
अब भी क्यों अनपढ़ो का जीना मुहाल है
आप
हैं पढ़े लिखे आपसे सवाल है

संस्कार
जिस से लिये शब्द और भाषा के
उस
समाज को क्या दिया सिवाय निराशा के
प्रतिदान
के प्रश्न पर क्यों उठ रहा बवाल है
आप हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है

बेटे
और बेटियाँ हैं आपके पढ़े-लिखे
नौनिहाल देश के विवशता के हाथों बिके
है
कर्तव्य आपका या फकत खयाल है
आप
हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है

सुविधायें
ज़िन्दगी में जो आपकी जुटाते है
ज़िन्दगी में खुद की वो मुसीबतें उठाते हैं
रक्त का खौलना क्या क्षणिक उबाल है
आप
हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है

-- शरद कोकास

(छवि गूगल से साभार )

मंगलवार, सितंबर 01, 2009

यह नहीं सोचा होगा आपने गणेश जी के दर्शन करते हुए ?


गणेशोत्सव
अपने चरम पर है । शोर-शराबे,पूजा-पाठ,नृत्य- गायन और उत्सवधर्मिता में डूबे जनमा

नस के लिये यह सोचना कठिन है कि गणेशजी की इस प्रतिमा को जिसने बनाया है वह मूर्तिकार किस हाल में जी रहा है। गणेशोत्सव की चकाचौन्ध कर देने वाली रोशनियों के बीच कवि नरेश चन्द्रकर पलट रहें हैं संस्कृति की इस पुस्तक के अनछुए पृष्ठ अपनी कविता “ संस्कृति के संवाहक “ में ।


संस्कृति के संवाहक


मूर्तियों में ढलने से पूर्व

थैला भर प्लास्टर थे गणेशजी

सरिये थे जूट के गठ्ठल थे

भरे ड्रम के गन्दले जल में निराकार पड़े थे


कौन जानता था

किस रंग आभा आकार में ढलेंगे

किनके हाथों बिकेंगे टेम्पो में चढ़ेंगे

कौन ले जायेगा उन्हे अपने पूजा पंडाल में

कितनी रेज़गारी बटोरेंगे उनके पंडाल-आयोजक

कितने भोग चढ़ेंगे

कितने में नीलाम होंगे उनके हाथ के मोदक


सब कुछ धीरे धीरे तय हुआ

आत्मकथा रची गई

प्लास्टर की थैली खुलते खुलते

ढलते सँवरते रचते चले गये

वे टाट के बने डेरे में


टाट के वे डेरे जबकि मूर्तिकारों के घर थे

आयोजकों के घर नहीं

पुरोहितों के नहीं

चन्दे की नींव पर बने पण्डाल जैसे भी नहीं

वे अन्धेरे ,मिट्टी और गन्दले जल से निर्मित थे


वे कालोनियों के सभ्रांत इलाकों से परे थे

पटरों पर बने थे

देवमूर्तियों से अँटे थे

पर फिर भी पाताल में गड़े थे


डेरों की परवाह किसे थी

उनके लिये उत्सव के दिन कहाँ थे

उनके लिये समितियाँ कहाँ थीं

उनके लिये चन्दे की रकम कहाँ थी

उनके लिये भीड़ कहाँ थी

उन पर हेलोजन लाइट कहाँ थी

वे रोशनी में नहाते कहाँ थे

वे आँखों की पुतलियों में कहाँ थे


उनकी उपमा तो ढेलों से होती थी

वे गलते थे बारिश में

धूप में खिण्ड जाते थे हवा से

सभ्य जन की परिधि सिकुड़ती थी उन तक पहुँचते हुए


डेरों के लिये चैनेल कहाँ थे

कैमरे के लेंस

पंडाल की रोशनी के बाहर आते ही तड़क जाते थे


मूर्तिकार कहाँ थे मूर्तियों के निर्माण के बाद

गणेशजी ही गणेशजी थे

वे ही थे

जैसे संस्कृति के सच्चे संवाहक !!


- नरेश चंद्रकर


सच बताईये, मूर्तियों के दर्शन करते हुए क्षण भर के लिये भी कभी आपके मन में यह खयाल आया ? अगली बार जब आप दर्शन के लिये जायें तो इन विपन्न मूर्तिकारों को याद कीजियेगा .. कवि की कविता तभी सार्थक होगी पर्व की शुभकामनाओं सहितशरद कोकास