मनुष्य ने इस धरा पर जन्म लेने के उपरांत अपने श्रम से इसे रहने लायक बनाया । वहीं जब उसने निर्माण और संहार के देवताओं से परिचय प्राप्त किया तब श्रम के देवता के रूप में विश्वकर्मा को अपना आराध्य बनाया । कालांतर में श्रम का यह मिथक कुछ विशिष्ट जनों ने हस्तगत कर लिया और इस आधार पर जातियाँ बन गईं । पत्थर की यदि ज़ुबान होती तो हम जान पाते कि हमारे ही गढ़े गए देवताओं के दुख क्या हैं । मैने "विश्वकर्मा " को इसी सन्दर्भ में देखा है .।. कुन्दनलाल सहगल का गाया गीत सुन रहा था एक दिन ..चन्दन का जंगला, सोने का बंगला ,विश्वकर्मा ने बनाया .. तब इस कविता ने जन्म लिया ..। आज विश्वकर्मा जयंती पर इसका प्रथम प्रकाशन कर रहा हूँ । इन पंक्तियों के अनेक ध्वन्यार्थ हैं.. ध्यान से पढ़ने के निवेदन के साथ .-शरद कोकासकविता ही ज़िन्दगी हो जहाँ ऐसी एक दुनिया है यहाँ...शरद कोकास कोश में पढ़िए शरद कोकास और मित्रों की कविताएँ और लेख
गुरुवार, सितंबर 17, 2009
विश्वकर्मा पर विश्व की एकमात्र समकालीन कविता
मनुष्य ने इस धरा पर जन्म लेने के उपरांत अपने श्रम से इसे रहने लायक बनाया । वहीं जब उसने निर्माण और संहार के देवताओं से परिचय प्राप्त किया तब श्रम के देवता के रूप में विश्वकर्मा को अपना आराध्य बनाया । कालांतर में श्रम का यह मिथक कुछ विशिष्ट जनों ने हस्तगत कर लिया और इस आधार पर जातियाँ बन गईं । पत्थर की यदि ज़ुबान होती तो हम जान पाते कि हमारे ही गढ़े गए देवताओं के दुख क्या हैं । मैने "विश्वकर्मा " को इसी सन्दर्भ में देखा है .।. कुन्दनलाल सहगल का गाया गीत सुन रहा था एक दिन ..चन्दन का जंगला, सोने का बंगला ,विश्वकर्मा ने बनाया .. तब इस कविता ने जन्म लिया ..। आज विश्वकर्मा जयंती पर इसका प्रथम प्रकाशन कर रहा हूँ । इन पंक्तियों के अनेक ध्वन्यार्थ हैं.. ध्यान से पढ़ने के निवेदन के साथ .-शरद कोकास
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
मंगलवार, सितंबर 08, 2009
पढ़े-लिखों से एक सवाल
जिनकी साक्षरता के लिये प्रयास किये जा रहे हैं उनमे से नब्बे प्रतिशत को नहीं पता होगा कि आज अंत
पढ़े-लिखों से एक सवाल
रहते हुए आपके क्यों बुझी मशाल है
आप हैं पढ़े लिखे आपसे सवाल है
ज्ञान को ढोते हुए आप यहाँ आ गये
सुख से भरी दुनिया में अपना मकाँ पा गये
अब भी क्यों अनपढ़ो का जीना मुहाल है
आप हैं पढ़े लिखे आपसे सवाल है
संस्कार जिस से लिये शब्द और भाषा के
उस समाज को क्या दिया सिवाय निराशा के
प्रतिदान के प्रश्न पर क्यों उठ रहा बवाल है
आप हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है
बेटे और बेटियाँ हैं आपके पढ़े-लिखे
नौनिहाल देश के विवशता के हाथों बिके
है कर्तव्य आपका या फकत खयाल है
आप हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है
सुविधायें ज़िन्दगी में जो आपकी जुटाते है
ज़िन्दगी में खुद की वो मुसीबतें उठाते हैं
रक्त का खौलना क्या क्षणिक उबाल है
आप हैं पढ़े -लिखे आपसे सवाल है
-- शरद कोकास
(छवि गूगल से साभार )
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
मंगलवार, सितंबर 01, 2009
यह नहीं सोचा होगा आपने गणेश जी के दर्शन करते हुए ?
गणेशोत्सव अपने चरम पर है । शोर-शराबे,पूजा-पाठ,नृत्य- गायन और उत्सवधर्मिता में डूबे जनमा
नस के लिये यह सोचना कठिन है कि गणेशजी की इस प्रतिमा को जिसने बनाया है वह मूर्तिकार किस हाल में जी रहा है। गणेशोत्सव की चकाचौन्ध कर देने वाली रोशनियों के बीच कवि नरेश चन्द्रकर पलट रहें हैं संस्कृति की इस पुस्तक के अनछुए पृष्ठ अपनी कविता “ संस्कृति के संवाहक “ में ।
संस्कृति के संवाहक
मूर्तियों में ढलने से पूर्व
थैला भर प्लास्टर थे गणेशजी
सरिये थे जूट के गठ्ठल थे
भरे ड्रम के गन्दले जल में निराकार पड़े थे
कौन जानता था
किनके हाथों बिकेंगे टेम्पो में चढ़ेंगे
कौन ले जायेगा उन्हे अपने पूजा पंडाल में
कितनी रेज़गारी बटोरेंगे उनके पंडाल-आयोजक
कितने भोग चढ़ेंगे
कितने में नीलाम होंगे उनके हाथ के मोदक
सब कुछ धीरे धीरे तय हुआ
आत्मकथा रची गई
प्लास्टर की थैली खुलते खुलते
ढलते सँवरते रचते चले गये
वे टाट के बने डेरे में
टाट के वे डेरे जबकि मूर्तिकारों के घर थे
आयोजकों के घर नहीं
पुरोहितों के नहीं
चन्दे की नींव पर बने पण्डाल जैसे भी नहीं
वे अन्धेरे ,मिट्टी और गन्दले जल से निर्मित थे
वे कालोनियों के सभ्रांत इलाकों से परे थे
पटरों पर बने थे
देवमूर्तियों से अँटे थे
पर फिर भी पाताल में गड़े थे
डेरों की परवाह किसे थी
उनके लिये उत्सव के दिन कहाँ थे
उनके लिये समितियाँ कहाँ थीं
उनके लिये चन्दे की रकम कहाँ थी
उनके लिये भीड़ कहाँ थी
उन पर हेलोजन लाइट कहाँ थी
वे आँखों की पुतलियों में कहाँ थे
उनकी उपमा तो ढेलों से होती थी
वे गलते थे बारिश में
धूप में खिण्ड जाते थे हवा से
सभ्य जन की परिधि सिकुड़ती थी उन तक पहुँचते हुए
डेरों के लिये चैनेल कहाँ थे
कैमरे के लेंस
पंडाल की रोशनी के बाहर आते ही तड़क जाते थे
मूर्तिकार कहाँ थे मूर्तियों के निर्माण के बाद
गणेशजी ही गणेशजी थे
वे ही थे
जैसे संस्कृति के सच्चे संवाहक !!
- नरेश चंद्रकर
सच बताईये, मूर्तियों के दर्शन करते हुए क्षण भर के लिये भी कभी आपके मन में यह खयाल आया ? अगली बार जब आप दर्शन के लिये जायें तो इन विपन्न मूर्तिकारों को याद कीजियेगा .. कवि की कविता तभी सार्थक होगी । पर्व की शुभकामनाओं सहित – शरद कोकास
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
रविवार, अगस्त 23, 2009
मास्क पहने आदमी से मैने पूछा कैसा लग रहा है ?
मिल कर इस घुटन से लड़ें.. आपका शरद कोकास
घुटन
दम घोंट देने की शक्ति शेष है
बन्द हैं ताज़ी हवा के तमाम रास्ते
उमस भरे कमरे में लटका है
उदास हवा का एक पोर्ट्रेट
बताया जा रहा है इन दिनों
बहुत मुश्किल काम है
तेज़ हवाओं में साँस लेना
विज्ञान के गारे से
धर्म की ईटें जोड़कर
खड़ी की जा रही हैं चारदीवारियाँ
घुटन से मरने वालों के लिये
आबाद किये जा रहे हैं कब्रस्तान
नौजवानों को अफसोस है
अपने पैदा होने पर
माएँ खुद घोंट रही हैं
पैदा होने से पहले बेटियों का गला
बूढ़े ईर्ष्या कर रहे हैं
भीष्म को प्राप्त वरदान पर
इधर कसाव बढता जा रहा है
घुटन की उंगलियों का
छटपटा रहे हैं बुद्धिजीवी
छुपा रहे हैं शर्म के दाग
सुविधाओं के रंग-रोगन से
आसमान की ओर उठी
अनगिनत आँखों में
बादलों का कोई अक्स नहीं है
आंखों व कानों तक
पहुंचाई जा रही है
घुटन दूर हो जाने की अफवाह
गूंज रहे हैं मंजीरों के साथ
मन्दिरों में
दुनियावी दुखों से मुक्ति के उपाय
इधर मौत की खबर को
आत्महत्या का रंग दिया जा रहा है
अब घुटन
दरारों और झरोखों से निकलकर
सारी दुनिया पर छाने की कोशिश में है
दरवाज़ा तोड़कर बाहर निकलना चाहता हूँ
तेज़ हवा पर सवार धूल से
लडना चाहता हूँ
घुटन के हाथों मारे जाने से बेहतर है
ताज़ी हवा की खोज में
वास्कोडिगामा हो जाना ।
- शरद कोकास
(सभी चित्र गूगल से साभार)
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शुक्रवार, अगस्त 14, 2009
14 अगस्त 1947 की रात में लिखी शील की कविता
देश में नयी भोर है नयी भोर का समारोह है
कवि शील का जन्म 15 अगस्त 1914 ई. में कानपुर ज़िले के पाली गाँव में हुआ । शील जी सनेही स्कूल के कवि हैं वे आज़ादी के आन्दोलन में कई बार जेल गये । गान्धीजी के प्रभाव मे “चर्खाशाला” लम्बी कविता लिखी । व्यक्तिगत सत्याग्रह से मतभेद होने के कारण गान्धी का मार्ग छोड़ा तथा भारतीय कम्यूनिस्टपार्टी में शामिल हुए । “मज़दूर की झोपड़ी” कविता रेडियो पर पढ़ने के कारण लखनऊ रेडियो की नौकरी छोड़नी पड़ी ।चर्खाशाला,अंगड़ाई,एक पग, उदय पथ,लावा और फूल , कर्मवाची शब्द आपकी काव्य रचनायें है तथा तीन दिन तीन घर,किसान,हवा कारुख,नदी और आदमी,रिहर्सल,रोशनी के फूल,पोस्टर चिपकाओ आदि आपके नाटक हैं ।उनके कई नाटकों को पृथ्वी थियेटर द्वारा खेला गया यहाँ तक कि रशिया में भी उनके शो हुए तथा राजकपूर ने उनमें अभिनय किया । यह कविता उन्होने 14 अगस्त 1947 की रात को लिखी थी जिसे ठीक 62 वर्ष बाद उसी समय मै यहाँ ब्लॉग पर उतार रहा हूँ ।-- शरद कोकास
15 अगस्त 1947
आज देश मे नयी भोर है-
नयी भोर का समारोह है
आज सिन्धु-गर्वित प्राणों में
उमड़ रहा उत्साह
मचल रहा है
नये सृजन के लक्ष्य बिन्दु पर
कवि के मुक्त छन्द-चरणों का
एक नया इतिहास ।
आज देश ने ली स्वंत्रतता
आज गगन मुस्काया ।
आज हिमालय हिला
पवन पुलके
सुनहली प्यारी-प्यारी धूप ।
आज देश की मिट्टी में बल
उर्वर साहस-
आज देश के कण कण ने ली
स्वतंत्रता की साँस ।
युग-युग के अवढर योगी की
टूटी आज समाधि
आज देश की आत्मा बदली
न्याय नीति संस्कृति शासन पर
चल न सकेंगे-
अब धूमायित-कलुषित पर संकेत
एकत्रित अब कर न सकेंगे ,श्रम का सोना
अर्थ व्यूह रचना के स्वामी
पूंजी के रथ जोत ।
आज यूनियन जैक नहीं
अब है राष्ट्रीय निशान
लहराओ फहराओ इसको
पूजो-पूजो- पूजो इसको
यह बलिदानों की श्रद्धा है
यह अपमानों का प्रतिशोध
कोटि-कोटि सृष्टा बन्धुओं को
यह सुहाग सिन्दूर ।
यह स्वतंत्रता के संगर का पहला अस्त्र अमोध
आज देश जय-घोष कर रहा
महलों से बाँसों की छत पर नयी चेतना आई
स्वतंत्रता के प्रथम सूर्य का है अभिनंदन-वन्दन
अब न देश फूटी आँखों भी देखेगा जन-क्रन्दन
अब न भूख का ज्वार-ज्वार में लाशें
लाशों में स्वर्ण के निर्मित होंगे गेह
अब ना देश में चल पायेगा लोहू का व्यापार
आज शहीदों की मज़ार पर
स्वतंत्रता के फूल चढ़ाकर कौल करो
दास-देश के कौतुक –करकट को बुहार कर
कौल करो ।
आज देश में नयी भोर है
नयी भोर का समारोह है ।
(रात्रि 14 अगस्त 1947 )
--जनकवि शील
(हिन्दी की प्रगतिशील कवितायें-सं-राजीव सक्सेना से साभार )
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शनिवार, अगस्त 08, 2009
माँ नहीं कर पायेगी अमेरिका के अफगान हमले का ज़िक्र
8 अगस्त 2001 मेरी ज़िन्दगी का एक ऐसा दिन है जिसे मेरे स्मृति पटल से कोई नहीं मिटा सकता । इस दिन माँ हमे छोड़ कर चली गई थी । यह जीवन का एक ऐसा सत्य है जो एक हर एक के जीवन में घटित होता है और हम अपनी आखरी साँस तक उस घटना की तारीख को याद रखते हैं । जन्म-मृत्यु , शादी-ब्याह ,सुख-दुख ,बीमारी, आदि की तिथियों को याद रखने का हमारा अपना तरीका होता है । आज हमारे पास केलेण्डर,कम्प्यूटर जैसी आधुनिक सुविधायें हैं लेकिन पहले के लोगों के पास उनके अपने तरीके थे. जैसे फलाने की शादी तब हुई थी जब फलाने के घर बेटा हुआ था ,या अकाल उस साल पड़ा था ,या पार्टीशन तब हुआ था जब मुन्ना गोद में था । पारिवारिक घटनाओं की तिथियों के सामाजिक सरोकार भी होते थे । हमारे इतिहास के निर्माण में इस परम्परा का भी योगदान है । माँ की स्मृति को इसी परम्परा के साथ जोड़ते हुए यह कविता मैने 2001 में लिखी थी । आज उनकी पुण्य तिथि पर उनके पुण्य स्मरण के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ – शरद कोकास
याद
माँ जिस तरह याद रखती थी तारीखें
वैसे कहाँ याद रखता है कोई
माँ कहती थी
जिस साल देश आज़ाद हुआ
उस साल तुम्हारे नाना गुजरे थे
हम समझ जाते
वह सन उन्नीस सौ सैंतालीस रहा होगा
माँ बताती थी
जिस साल पाकिस्तान से लड़ाई हुई थी
उसी बरस तुम्हारे बाबा स्वर्ग सिधारे थे
हम समझ जाते
वह सन उन्नीस सौ पैंसठ रहा होगा
माँ कभी नहीं कर पायेगी
अमेरिका के अफ़गान हमले काज़िक्र
हम याद करेंगे
जिस साल ऐसा हुआ था
उस साल माँ नहीं रही थी
मुश्किल नहीं होगा समझना
वह सन दो हज़ार एक रहा होगा ।
-- शरद कोकास
( शरद कोकास की कविता “आकंठ” से व चित्र गूगल से साभार )
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
सोमवार, अगस्त 03, 2009
रामकुमार तिवारी की कविता
उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं.

नवीन सागर पर केन्द्रित "कथादेश" के विशेषांक के वे अतिथि सम्पादक रहे हैं.
जीवन के सौन्दर्य और मनुष्य की जिजीविषा में उनकी आस्था है .
उनकी कविताओं के चाक्षुस दृष्य शब्दों के अर्थ को नया विस्तार देते हैं.
प्रस्तुत है उनकी कविता..
ठीक ठीक कितने वर्ष का था
धरती की आयु के बारे में सोचता
सडक पर जा रहा था
सडक से हटकर कुछ ही दूरी पर
सत्तर की आयु का एक बूढा
बही-कटी धरती को देखता
चल रहा था
पेड काटते आदमी से आयु पूछी
पेड की आयु पता नहीं चली
चहकती फुदकती चिडिया की आयु का प्रश्न उठे
इससे पहले वह उड गई
भुतहे कुओं में
डरते-डरते झाँका और
उसकी आयु के बारे में सोचता-सोचता
दूर निकल गया
नदी से उसकी आयु पूछना भूल
रेत से भरे ट्रक में बैठकर
शहर आ गया
शहर की आयु पूछी तो
कारखाने की आयु पता चली
सुस्ताने के लिये बाग में गया
बाग़ में प्रेम करते स्त्री-पुरुष ने
गुलाब के दो फूल तोडे
प्रेम और फूल की आयु के बारे में सोचता हुआ
बाग से निकल गया ...
- रामकुमार तिवारी
(कविता वसुधा अक्तू.1996 से तथा दृष्य गूगल से साभार - शरद कोकास )
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।




