रविवार, अक्टूबर 02, 2011

रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी

1984 की डायरी से यह एक कविता




क्योंकि हम मूलत: भिक्षावृत्ति के खिलाफ हैं


हमारे सामने फैले हुए हाथ पर
चन्द सिक्के रखने की अपेक्षा
हमने रख दी है कोरी सहानुभूति
और उसके फटे हुए झोले में
डाल दिये हैं कुछ उपदेश
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी ग़रीबी पर
बहाए हैं मगरमच्छ के आँसू
और गालियाँ दी हैं अमीरों को
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उसकी फटेहाली पर
व्यक्त किया है क्षोभ
और कोसा है व्यवस्था को
उसकी ओर उंगली दिखाते हुए
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


उससे पूछा है
कोई काम करोगे
उसके काम माँगने पर
उछाल दिया है आश्वासन
नेताओं की तरह
क्योंकि हम मूलत:
भिक्षावृत्ति के खिलाफ़ हैं


फिर हमारी रेल आ जाती है
हम बैठकर चले जाते हैं
चाँवल से भी वज़नी
हमारे उपदेश और सहानुभूति
और आश्वासन
उसके झोले में लगे विवशता
के पैबन्द फाड़ प्लेटफॉर्म पर

जहाँ- तहाँ गिर जाते हैं ।


- शरद कोकास

रविवार, अगस्त 28, 2011

आज जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है ....

अपनी युवावस्था में जगमोहन कोकास 
आज मेरे पिता जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है । आठ वर्ष पूर्व 28 अगस्त 2003
को उन्होंने इस संसार से विदा ली थी ।
जगमोहन कोकास का जन्म मध्यप्रदेश के बैतूल में हुआ था और वे
कवि भवानीप्रसाद मिश्र के शिष्य थे ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने ओवरसीअर की नौकरी त्याग दी थी
और प्रायमरी स्कूल में शिक्षक की नौकरी से
शुरुआत कर अंत में बी एड कॉलेज में
प्राध्यापक बने।
उन्होंने इतिहास व हिन्दी में स्नातकोत्तर के अलावा एम एड और
प्रयाग से साहित्यरत्न भी
किया था ।
वे महाराष्ट्र के भंडारा शहर में रहे
और जीवन भर हिन्दी की सेवा करते रहे ।
यह उनके गुरू का आदेश था ।
आज प्रस्तुत है उनके द्वारा अनुवाद की गई वरवर राव की यह कविता ,
जो मुझे उनके पुराने कागज़ों में मिली ...
इसे पढ़ने के लिये इसे बड़ा करके देखें ...

पिता आज नहीं हैं लेकिन उनकी ढेर सारी तस्वीरेंऔर कुछ लेख मेरे पास हैं ।
इन्हें समय समय पर ब्लॉग पर देता रहूंगा ।
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आज हम लोग यानि मैं , मेरी छोटी बहन सीमा , पत्नी लता और बिटिया कोपल
यहाँ उन्हें याद कर रहे हैं ..

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शनिवार, अगस्त 20, 2011

मुझे विश्वास नहीं है सरकारी आँकड़ों पर

1984 के डिब्बे में तलाश की तो कुछ और कवितायें इसी तेवर की मिलीं । यह एक कविता जो उस वक़्त 1984 के भोपाल गैस कांड के बाद व्यवस्था का असली चेहरा दिखाने के प्रयास में लिखी थी । इसे पढ़िये और बताइये इस कविता का सन्दर्भ उस घटना के अलावा किसी और घटना से भी जुड़ता है क्या ?



2 ज़िन्दा चेहरों की तलाश


मेरे सामने है एक अखबार
जिसमें इर्द - गिर्द बिखरीं हैं
कई खबरें
लाशों की तरह
मेरे हाथों में
एक कैल्कुलेटर
जिस पर मैं कर रहा हूँ
मौत का हिसाब
जोड़ रहा हूँ क्रूरता को
घटाते हुए भावनाओं से
गुणा करते हुए बर्बरता से



मुझे विश्वास नहीं है
सरकारी आँकड़ों पर
मैं लेना चाहता हूँ जायज़ा
उन परिस्थितियों का
जिनमें मौत भी काँप उठी थी
उन दरवाज़ों पर
जहाँ धुआँ था
लाशों की गन्ध थी
संतोष का भाव लिये
अनभिज्ञता की नकाब ओढे
कुछ चेहरे
छुपे हुए मज़बूत दीवारों के भीतर
जहाँ माथे का फैला हुआ सिन्दूर था
जहाँ थी कुरआन
गीता और बाइबिल
लुढकी हुई दूध की बोतल
और उन सबके पीछे
अट्टहास करता हुआ
एक घिनौना चेहरा



कैलकुलेटर
केवल मुर्दा चेहरों का
हिसाब बता सकता है
ज़िन्दा चेहरों का नहीं

मुझे तलाश है ज़िन्दा चेहरों की
जो आज व्यवस्था की आड़ लेकर
हमारी परिधि से बाहर हैं


कैलकुलेटर
कल तुम्हारे हाथ में होगा
और तुम लगाओगे
उन चेहरों का हिसाब
जो कल ज़िन्दा नहीं बचेंगे ।


---- शरद कोकास

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

हमें जो कहनी है वह बात अभी बाकी है

कल हमारे एक मित्र मिले कहने लगे यार आजकल आँदोलन का माहौल चल रहा है ,तुम्हारी वह कुत्ते वाली कविता याद आ रही है । हमें याद आया 1984 में जबलपुर के कविता रचना शिविर में , किसान और मजदूरों के आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में वह कविता लिखी थी । और मंच पर बहुत जोश से उस कविता का पाठ भी करते थे । डॉ.कमला प्रसाद को भी मेरी उम्र और इस कविता के तेवर की वज़ह से उस समय यह कविता अच्छी लगी थी । पुरानी ही सही आप भी पढ़ लीजिये इसे ।



हमारे हाथ अभी बाकी हैं


कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे
सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है


1984 में एक आन्दोलन में झंडा उठाए कवि

उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है


हम भी शायद कुत्ते हो गये हैं
इसलिये खड़े हैं उनके दरवाजों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द
उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिये
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिये
उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिये
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है


ज़ुबाने कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं


लेकिन हम आदमी हैं कुत्ते नहीं
आओ उठे दौड़ें
और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर
हमारे हाथ अभी बाकी हैं


हमारे हाथ अभी बाकी हैं ।


- शरद कोकास


शनिवार, अगस्त 06, 2011

बुखार में प्रेम कवितायें

वैसे तो सबसे कम झमेला इस बात में है कि बीमार हुआ ही न जाये.. लेकिन इस कम्बख़्त वायरस का क्या करें , लाख बचना चाहा लेकिन बुखार आ ही गया ... और बुखार के साथ याद आई अपनी यह तीन पुरानी बुखार कवितायें ,हमारे एक मित्र ने इन्हे नाम दिया है , बुखार में प्रेम कवितायें , लीजिये आप भी पढ़िये ....


बुखार-एक

बवंडर भीतर ही भीतर
घुमड़ता हुआ
लेता हुआ रोटी की जगह
पानी को स्थानापन्न करता
रगों में खून नहीं ज्यों पानी
शरीर से उड़ता हुआ ।

 बुखार-दो

बुखार
आग का दरिया
पैर की छिंगुली से लेकर
माथे तक उफनकर बहता हुआ

छूटती कँपकपी सी
बदल जाता चीज़ों कास्वाद
साँसों का तापमान
जीभ खुश्क हो जाती
उतर जाता बुखार
माथे पर तुम्हारा हाथ पड़ते ही ।

बुखार –तीन

अछा लगता है
गिरती हुई बर्फ में खड़े
पेड़ की तरह काँपना
 जड़ों से आग लेना
शीत का मुकाबला करना
अच्छा लगता है
ठिठुरते हुए मुसाफिर का
गर्म पानी के चश्मे की खोज  में
यात्रा जारी रखना  । 

                        शरद कोकास

                      

बुधवार, जुलाई 06, 2011

मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी ?


यह बात हम सभी जानते हैं कि जिस तरह जीवन एक सत्य है ,मृत्यु भी उसी तरह एक सत्य है । फिर भी जब किसी की मृत्यु होती है हम उसे उस तरह स्वीकार नहीं कर पाते जिस तरह जीवन को स्वीकार करते हैं । ऐसा शायद इसलिये होता है कि हमने उस व्यक्ति के अस्तित्व को अपने जीवन में महसूस किया होता है और उसका विछोह हमें दुख देता है । विगत  8 जून को मुम्बई में मेरे चाचाजी का निधन हुआ । वहाँ से लौटा ही था कि समाचार प्राप्त हुआ कि 28 जून को एक और चाचा गुजर गए । परिवार के लिये यह शोक का समय है । पता है कि यह समय भी गुजर जाएगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा । फिर भी जो चला जाता है उसकी कमी तो महसूस होती है । इन दिनों बार बार याद आ रही है अपनी यह कविता जो मैंने 1995 में लिखी थी । हो सकता है मेरी तरह यह सवाल भी कभी आपके मन में आया हो ।


मरने के बाद कहाँ जाता है आदमी

यह तय है कि
स्वर्ग तो नहीं जाता
नर्क भी नही जाता है आदमी
 
मरने के बाद
यह भी तय है कि
किसी दूसरी देह में
नहीं समा जाती है
आदमी की रूह

और यह तो बिलकुल तय है कि
भूत नहीं बन जाता
अधूरी इच्छायें लिये
मर जाने वाला आदमी

आओ पृथ्वी
आओ आकाश
आओ अग्नि
आओ वायु
आओ जल

सच सच बताओ
मरने के बाद
कहाँ जाता है आदमी ? 

                   - शरद कोकास

शुक्रवार, जून 03, 2011

भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सबा अंजुम के बहाने एक कविता

          
सबा अंजुम जब नन्ही सी थी जब वह हमारे घर के सामने से केलाबाड़ी स्थित सुराना कॉलेज के पीछे वाले मैदान में हॉकी खेलने जाया करती थी । उसके कोच तनवीर अक़ील अपने साथ मोहल्ले के तमाम लड़के लड़कियों को लेकर सुबह सुबह मैदान में पहुँच जाते और लगभग नौ बजे तक वे खिलाड़ियों से प्रैक्टिस करवाते । उन बच्चों को देखकर लगता ही नहीं था कि दुर्ग जैसे एक छोटे से शहर के मोहल्ले की टीम की तरह खेलने वाले इन्ही बच्चों में भविष्य की भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान भी हो सकती है ।
छठवीं कक्षा में वह मोहल्ले के हिन्दी माध्यम के शासकीय आदर्श कन्या शाला में भरती हो गई । उसके बाद वह आगे ही बढ़ती गई । जब भी वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी टीम के साथ स्वर्ण पदक लेकर लौटती उसका स्वागत बहुत ज़ोर शोर से होता । हम लोगों के लिए तो वह मोहल्ले की बेटी ही है और उसकी शिक्षिका श्रीमती लता कोकास के लिये एक प्रिय छात्रा । वह विदेश से लौटती तो मोहल्ले भर में सारे लोगों से मिलती । हमारे घर भी आती ।  ऐसे ही एक बार उसके लिए मैंने यह कविता लिखी थी सन 2002 में , दर असल सिर्फ उसके लिये नहीं बल्कि उसके जैसी तमाम बेटियों के लिये जिनमें प्रतिभा तो होती है लेकिन इस समाज में वह प्रतिभा परवान नहीं चढ़ पाती । आज उसके भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बनने पर उसकी टीचर लता कोकास के आग्रह पर यह कविता … 
आज के अखबार नई दुनिया मेँ छपी खबर 



स्वण॔पदक जीत कर लाने वाली बेटियाँ



घर में उसका आना

आने से पहले जाने में नहीं हो सका

इसलिए होने में रह गया

अपने होने में वह उसी तरह बड़ी हुई

जैसे कि और लड़कियाँ बड़ी होती हैं



अब वह बड़ी हुई तो घर से निकली

स्कूल से निकली

खेल के मैदान से निकली

और जब देश से निकली

तो स्वण॔पदक लेकर ही घर लौटी



यह  पूरा चक्र उसके पिता के चेहरे पर

इस अभिमान से स्थापित  हुआ

सबा के पहले कोच तनवीर अक़ील 
कि विश्वास ही नहीं होता था पहले कभी

वहाँ अपने आप के लिए धिक्कार था

और यह चक्र जो उसके पीछे

ठीक प्रभामंडल की तरह दिखाई देता था

उसके मित्र सहपाठी गुरुजन पड़ोसी

सभी के लिए गर्व का मुखौटा बन गया


और छोटे शहर के अखबारों के लिए

जहाँ एक छोटी सी खबर भी

बहुत दिनों तक बिका करती थी

यह सब कुछ एक बम्पर ऑफर की तरह ही था



जैसा कि उसके छोटे शहर में घट रहा था

अपनी स्थानीयता में एक उपलब्धि लिये

देश के कुछ और शहरों में घट रहा था

ऐसा इसलिये कि वह ऐसे खेल में नहीं थी

जिसमें कोई राष्ट्रीय किस्म का पागलपन शामिल हो

और युद्ध से लेकर चुनावों तक

जिसके अंतर्राष्ट्रीय उपयोग की संभावना हो



बस यहीं तक कहानी है

लता कोकास व सबा अंजुम 

एक असाधारण लड़की के इस किस्से में

और भविष्य के बखान में साधारणीकरण का खतरा है

फिर भी कथ्य के निर्वाह के लिये

यह बतलाना ज़रूरी है

कि यह दहलीज़ उसकी अंतिम दहलीज़ नहीं थी

या कि वह इस दहलीज़ से निकली तो

फिर दूसरी से नहीं निकल पाई

कोई उल्लेखनीय गोल भी नहीं कर पाई

और उसने जीवन भर सहे अत्याचार

इस समाज रूपी रेफरी के इशारों पर



वह चलती रही उसके जैसी अन्य बेटियों की तरह

भारतीय महिला हॉकी टीम 
धीरे धीरे तब्दील होती गई

माँ ,चाची .फूफी और दादी में

खेल भावना से सहती रही जीवन भर हार

लड़ती रही पुरुष के पारम्परिक दम्भ से

जिनके गिरने में ही उसका उठना और

उठने में गिर जाना था

और हौसला सिर्फ बच्चों को समझाने लायक शेष था



फिर कोई ग्लैमर नहीं रहा ज़िन्दगी में

सोने से कीमती औरतपन की कोई कीमत नहीं रही

पदक पुरस्कार ममता के तराजू पर तौले जाते रहे

जीवन भर चलती रही ज़द्दोज़हद

एक अच्छी बहू अच्छी पत्नी अच्छी माँ का

प्रमाणपत्र पाने के लिये ।

                  
                              -  शरद कोकास 




( समाचार , अखबार नई दुनिया रायपुर से साभार )